लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल काग़ज़ नहीं होती बल्कि वह सत्ता की चाबी होती है। जब इस सूची की निष्पक्षता पर सवाल उठता है, तो चुनावी प्रक्रिया की आत्मा कटघरे में खड़ी हो जाती है। पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के बाद 58,20,898 मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हटाया जाना सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक सवाल खड़ा करता है।
चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, इन नामों को मृत, लापता, स्थानांतरित, डुप्लीकेट और अन्य कारणों से हटाया गया है, जबकि काग़ज़ पर यह प्रक्रिया ‘शुद्धिकरण’ कही जा सकती है। लेकिन ज़मीनी राजनीति में यही प्रक्रिया चुनावी इंजीनियरिंग के आरोपों को जन्म देती है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सूची के अनुसार 24 लाख से अधिक मतदाता ‘मृत’ घोषित, जबकि 12 लाख से अधिक ‘लापता’ और करीब 20 लाख स्थानांतरित, वहीँ 1.38 लाख डुप्लीकेट बताये गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में ‘मृत’ और ‘लापता’ मतदाता, वह भी एक ऐसे राज्य में जहाँ आंतरिक और बाहरी प्रवासन राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा रहा है, क्या यह केवल संयोग है? या फिर बिहार में सक्सेस फार्मूले को अब बंगाल में अपनाया जा रहा है। बिहार में पहले से सत्ता थी इसलिए वहां 28 लाख नाम हटाने पड़े बंगाल में सत्ता नहीं है इसलिए वहां 28 +28 = 56 लाख नाम हटाए जा रहे हैं ?
बिहार के बाद बंगाल पर छाया?
यह सवाल इसलिए भी और गंभीर हो जाता है क्योंकि बिहार में हाल ही में मतदाता सूची से करीब 28 लाख नाम हटाए गए, और उसके बाद चुनावी नतीजों ने एनडीए को स्पष्ट लाभ पहुँचाया। विपक्ष ने तब आरोप लगाया था कि मतदाता सूची में छेड़छाड़ ने चुनाव की दिशा तय की। अब बंगाल में बिहार से दोगुनी संख्या यानी 58 लाख नाम हटाए जा चुके हैं।
सवाल स्वाभाविक है: क्या यह केवल प्रशासनिक अभ्यास है या फिर वही पैटर्न, वही स्क्रिप्ट? क्या बिहार में 28 लाख नाम हटाकर सत्ता का संतुलन बदला गया और अब बंगाल में 58 लाख नाम हटाकर वही प्रयोग दोहराया जाएगा?
प्रक्रिया है, पर भरोसा नहीं है?
चुनाव आयोग कहता है कि जिनके नाम कटे हैं, वे फॉर्म-6, एनेक्सर-IV, दस्तावेज़ और सुनवाई के ज़रिये दावा कर सकते हैं। लेकिन भारत की जमीनी हकीकत में, कितने ग़रीब, प्रवासी मज़दूर या ग्रामीण मतदाता इस जटिल प्रक्रिया को पूरा कर पाएंगे? और कितने लोग तय समय (यानी 15 जनवरी 2026) तक दस्तावेज़ जुटा सकेंगे? और अगर नागरिकता पर सवाल उठे, तो एफआरआरओ और गृह मंत्रालय के सत्यापन का मतलब महीनों की अनिश्चितता नहीं तो क्या है? प्रक्रिया का होना अलग बात है, और प्रक्रिया तक पहुंच होना बिल्कुल अलग है।
यह लोकतंत्र का असली इम्तिहान है
पश्चिम बंगाल में यह ड्राफ्ट लिस्ट विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आई है। यही वह समय होता है जब मतदाता सूची में छोटे बदलाव भी बड़े राजनीतिक नतीजे पैदा करते हैं। अगर बड़ी संख्या में नाम कटे और वे समय पर वापस नहीं जुड़े, तो यह चुनाव केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि मतदान के अधिकार और सत्ता के नियंत्रण के बीच होगा।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भरोसा लोकतंत्र की बुनियाद है। लेकिन जब एक के बाद एक राज्यों में लाखों नाम कटते हैं और राजनीतिक लाभ भी एक ही दिशा में जाता दिखाई देता है, तो सवाल उठना अस्वाभाविक है। क्या बंगाल में 58 लाख नामों की कटौती केवल संयोग है, या फिर बिहार के बाद बंगाल को भी एनडीए की ओर मोड़ने की एक और कोशिश? इस सवाल का जवाब शायद नतीजों में मिलेगा, लेकिन तब तक लोकतंत्र को सतर्क रहना होगा, क्योंकि जब मतदाता सूची चुपचाप बदलती है, तो इतिहास अक्सर शोर मचाकर बदलता है।
एक ओर तो चुनाव आयोग ये खेल खेलरहा है वहीँ दूसरी ओर योगी जैसे भजपा नेता कह रहे हैं उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जारी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में राज्य की मतदाता सूची से चार करोड़ मतदाता ‘ग़ायब’ हैं और उनमें से ज़्यादातर भाजपा के समर्थक हैं. योगी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि वे एसआईआर के बाकी दिनों में अपने-अपने बूथों पर हर मतदाता तक पहुंचें ताकि उनका नाम दर्ज हो सके, कया देश का ध्यान भटकाने के लिए योगी ऐसे दावे कर रहा है ?