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बांग्लादेश के विशेष अपराध ट्रिब्यूनल द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ का दोषी ठहराते हुए फांसी की सज़ा सुनाया जाना सिर्फ एक न्यायिक फैसला नहीं बल्कि यह दक्षिण एशिया के राजनीतिक मानचित्र को हिला देने वाली घटना है। 2024 के विरोध प्रदर्शनों में सैकड़ों छात्रों की मौत, हजारों घायल, और राज्य-समर्थित हिंसा के आरोपों ने बांग्लादेश को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया जहाँ सत्ता परिवर्तन तो हुआ, पर अब न्याय का चक्र सबसे ऊँची कुर्सी तक पहुँच चुका है। लेकिन इस फैसले के बीच एक अहम सवाल भारत में भी उठ रहा है। क्या भारत…

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भारत में चुनाव प्रक्रिया को दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक मशीनरी कहा जाता है। हर वर्ष लाखों अधिकारी, शिक्षक, कर्मचारी और अस्थायी स्टाफ इस मशीनरी को चलाने में अपनी भूमिका निभाते हैं। ऐसे में बीएलओ बूथ लेवल ऑफिसर लोकतांत्रिक ढांचे का सबसे निचला और सबसे महत्वपूर्ण पहिया हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों में केरल, राजस्थान और बिहार से जिस तरह बीएलओ की आत्महत्याओं की खबरें आई हैं, उसने इस तंत्र की वास्तविकता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें क्या वाकई यह सिर्फ “रूटीन” प्रशासनिक काम है? प्रशासन की…

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बिहार चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की evm में धांदलियों के बाद प्रचंड जीत के ठीक बाद, असम के स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल द्वारा पोस्ट की गई फूलगोभी के खेत की एक तस्वीर ने भारतीय राजनीति की दिशा, भाषा और जिम्मेदारियों पर एक बार फिर कड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यह कोई मासूम कृषि-चित्र नहीं था; यह 1989 के भागलपुर मुस्लिम नरसंहार के सबसे भयावह प्रतीक की सीधी ओर इशारा करता है, जहाँ 110 से अधिक मुस्लिम ग्रामीणों को मारकर उसी खेत में दफना दिया गया था, और ऊपर गोभी के पौधे बो दिए गए थे। जब कोई…

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मो­हम्मद अखलाक की बिसाहड़ा लिंचिंग (2015) की सालगिरह दरअसल सिर्फ एक दुखद घटना नहीं है, बल्कि हमारे लोकतंत्र की चिंताजनक प्रवृत्तियों का लगातार रीप्ले का प्रमाण बन गई है। अब, करीब एक दशक बाद, यूपी सरकार ने उन दस आरोपियों के खिलाफ मामले वापस लेने की मांग की है जिन पर हत्या, चोट पहुँचाने, धमकी और अपमान जैसे संगीन आरोप थे। यह वही राज्य है जहाँ ‘गौरक्षा’ के नाम पर हिंसा का एक नेटवर्क धीरे-धीरे अपनी पकड़ बना रहा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें source : huffingtonpost.com न्याय की मांग या राजनीति का…

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Image Source : map(shutterstock.com) बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने देश की राजनीति में उतनी हलचल पैदा नहीं की जितनी उनसे जुड़े विवादों ने की है। चुनावी नतीजे आते ही विपक्ष, कई मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, चुनाव पर्यवेक्षक और नागरिक समूह—सभी ने एक स्वर में जिस तरह सवाल उठाने शुरू किए, उससे यह साफ है कि यह मुद्दा सिर्फ हार-जीत का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसे का है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें एक्ज़िट पोल एक दिशा में तो नतीजे दूसरी दिशा में जब लगभग सभी बड़े एक्ज़िट पोल बिहार में INDIA गठबंधन को…

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एनडीए की जीत और उठते सवाल बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे आए हैं और उनमें एक मजबूत एनडीए जीत दिख रही है। लेकिन कईविश्लेषकों, विपक्षी पार्टियों और नागरिकों के बीच यह गहरी चिंता है कि इन नतीजों और exit-poll के अनुमानों मेंबड़ा फर्क नज़र आरहा है, और इस दूरी को देखते हुए लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। Exit-poll अनुमान vs वास्तविक नतीजे कई exit-polls ने पहले ही एनडीए को स्पष्ट बहुमत देने का अनुमान लगाया था। लेकिन विपक्ष और विश्लेषक यह तर्कदे रहे हैं कि नतीजे और अनुमान के बीच “कहानी में कुछ गड़बड़ है”:…

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बिहार विधानसभा चुनाव में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने कुल 25 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से 23 मुस्लिम उम्मीदवार थे, जिनमें से पाँच ने जीत हासिल की है। राष्ट्रीय जनता दल ने 18, कांग्रेस ने 10 और जनता दल यूनाइटेड ने चार मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे।बीजेपी ने किसी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया था। आइए देखते हैं कि मुस्लिम उम्मीदवारों को किन सीटों पर जीत मिली। 1. ओसामा शहाब – रघुनाथपूर सिवान की रघुनाथपूर सीट से बाहुबली नेता और राष्ट्रीय जनता दल से सांसद रहे मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब ने जेडीयू के विकास कुमार…

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क्या बढ़ती नफरत और सत्ताई मौन ने युवाओं को अंधेरी राहों पर धकेला है? नई दिल्ली में हाल ही में हुए धमाकों ने न केवल राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, बल्कि शुरुवाती जांच से जो नाम सामने आए हैं अगर वाक़ई पढ़े लिखे और डॉक्टर मुस्लिम इसमें मुलव्विस हैं तो जहाँ एक ओर समाज के उलेमाओं और बुद्धिजीवियों खुलकर यह कहना होगा कि “जो हिंसा करे, वह मुसलमान नहीं हो सकता।” यह ज़रूरी है कि मज़हबी नेतृत्व अपने मंचों से ऐसे तत्वों की ख़ुली निंदा करे, क्योंकि चुप रहना, अपराधियों को मौन समर्थन देना है। वहीँ दूसरी…

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मोहन भागवत ने हाल ही में यह दावा किया कि संघ ने स्थापना के बाद से “राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा)” का सम्मान, संरक्षण और सशक्त समर्थन किया है। लेकिन इस दावे के सामने कई ऐतिहासिक दस्तावेज, संगठन की आदतें और सार्वजनिक बयानों की श्रृंखला ऐसी है जो इस दावे को चुनौती देती है। संघ का तिरंगे के प्रति व्यवहार और इतिहास तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज घोषित करने के बाद भी, संघ अपने मुख्यालय (नागपुर) में लंबे समय तक तिरंगा फहराने का क्रम नियमित रूप से नहीं अपनाया। उदाहरण के लिए, यह कहा गया कि तिरंगा लगभग 52 वर्ष तक संघ के…

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राम पुनियानी भाजपा की वाशिंग मशीन में धुल चुके असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा अब एक आक्रामक दक्षिणपंथी हैं। वे समय समय पर मुस्लिम समुदाय को अपमानित करने वाले वक्तव्य देते रहते हैं। यह समुदाय असम में जबरदस्त उपेक्षा झेल रहा है। हाल में असम में कांग्रेस की एक बैठक में एक कांग्रेसी ने ‘आमार सोनार बांग्ला’ गीत गाया। सरमा ने अपनी पुलिस को बांग्लादेश का राष्ट्रगान गाने के लिए उस व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा। शायद सरमा को इस गाने का इतिहास, जिन हालातों में वह रचा गया और उसके भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से रिश्ते के बारे में जरा भी जानकारी नहीं है यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि मूल ‘आमार सोनार’ गीत की केवल शुरूआती 10 पंक्तियों को बांग्लादेश का राष्ट्रगान  बनाया गया। अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के मुताबिक अंग्रेजों ने सन् 1905 में बंगाल का पश्चिम बंगाल और पूर्व बंगाल में विभाजन कर दिया जाहिर तौर पर इसका कारण प्रशासनिक बताया गया लेकिन उसका असली प्रयोजन स्पष्टतः भारतीयों को धर्म के आधार पर  बांटना था। पश्चिमी बंगाल में हिन्दुओं का बहुमत था और पूर्वी बंगाल में मुसलमानों का इस विभाजन का भारतीयों ने जी जान से विरोध  किया। इसी दौरान गुरूदेव ने बांग्ला गौरव को दर्शाने और बंगभंग का विरोध करने के उद्देश्य से यह गाना लिखा यह गाना बंगाल विभाजन के विरोध की केन्द्रीय धुरी बना गया और आखिरकार अंग्रेजों को बंगाल को दो हिस्सों में बांटने का अपना फैसला वापिस लेना पड़ा। यहां यह बताना दिलचस्प होगा कि बंगभंग के खिलाफ चले इस आंदोलन और हिन्दू-मुस्लिम एकता को मजबूती प्रदान करने के लिए  राखी बांधने-बंधवाने का अभियान भी चला  भारत के बंटवारे की त्रासदी के बाद पूर्वी बंगाल और पश्चिमी पंजाब  पाकिस्तान का हिस्सा बने। पाकिस्तान की सत्ता का केन्द्र पश्चिमी पाकिस्तान था।  आर्थिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से पश्चिमी पाकिस्तान का बोलबाला रहा आया और इसके नतीजे में पूर्वी पाकिस्तान के निवासी उपेक्षित महसूस करने लगे। घाव पर नमक छिड़कते हुए उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया गया। इससे पूर्वी पाकिस्तान के बांग्ला बोलने वाले मुस्लिम निवासियों में अलगाव की भावना में और इजाफा हुआ। उनमें अलग राष्ट्र बनने की इच्छा जागृत हुई और प्रबल होती गई। पूर्वी पाकिस्तान को अलग देश बनाने के लिए चले आंदोलन का नेतृत्व मुजीबुर्रहमान ने किया। इन बंगालियों का  थीम सांग था ‘आमार सोनार’। टैगोर को पूर्वी पाकिस्तान में अत्यंत श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता था। मुक्ति वाहिनी के  आंदोलन और इंदिरा गांधी के दक्ष नेतृत्व में भारतीय सेना के सहयोग से सन 1971 में बांग्लादेश नामक नए राष्ट्र का जन्म हुआ। आमार सोनार गीत की प्रथम दस पंक्तियों को बांग्लादेश के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया।  मेरे एक पत्रकार मित्र ने मुझे बताया था कि जब वे बांग्लादेश के शीर्षस्थ नेता से मिलने गए तो उन्हें यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि  गुरूदेव का चित्र उनके प्रतीक्षा कक्ष में एक प्रमुख स्थान पर लगा हुआ था यह गर्व की बात है कि दो पड़ोसी देशों के  राष्ट्रगान एक ही कवि द्वारा रचित हैं। यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि ‘आमार सोनार’ की धुन रबीन्द्र संगीत पर आधारित है  और इस मनमोहक धुन को संगीत निदेशक समर दास ने तैयार किया था। आमार सोनार के दो बड़े महत्वपूर्ण पहलू हैं।  पहला यह कि यह अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के खिलाफ एक मुख्य थीम सांग था और दूसरा यह कि इसकी शुरूआती दस पंक्तियों को बांग्लादेश का राष्ट्रगान बनाया गया। टैगोर ने अपने इस योगदान से भारत को गौरवान्वित किया है और इसकी  ऐतिहासिक प्रासंगिकता के चलते इसका गायन किसी भी तरह से राष्ट्रविरोधी नहीं माना जा सकता। गुरूदेव का दूसरा महत्वपूर्ण योगदान है जन गण मन, जिसे भारत के राष्ट्रगान के रूप में चुना गया। भारत का एक राष्ट्रगीत भी है – वंदे मातरम। कुछ दक्षिणपंथी पूरे वंदे मातरम गीत को राष्ट्रगीत बनवाना चाहते थे  इसमें समस्या यह थी कि इसमें हिन्दू धार्मिक  छवियां थीं और शुरूआती दो छंदों के बाद इसमें राष्ट्र को हिंदू देवी दुर्गा के रूप में देखा गया था। यह राष्ट्रीय आंदोलन के धर्मनिरपेक्ष  राष्ट्र के निर्माण के सपने के खिलाफ होता।  साथ ही मूलतः यह बंकिमचन्द्र चटर्जी के उपन्यास आनंद मठ का हिस्सा है। उपन्यास के मूल संस्करण में एक मुस्लिम शासक  के खिलाफ विद्रोह दर्शाया गया है और इस विद्रोह की सफलता के फलस्वरूप अंग्रेजों का राज स्थापित होता है।कांग्रेस के नेतृत्व  वाले राष्ट्रीय आंदोलन की गीत समिति को सर मोहम्मद इकबाल रचित ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा’, वंदे मातरम और जन गण मन इन तीनों में से एक का चयन करना था।  सारे जहां से अच्छा को इसलिए छोड़ दिया गया क्योंकि इसके रचयिता मोहम्मद इकबाल स्वयं पाकिस्तान चले गए थे। वंदे मातरम को संशोधित करके राष्ट्रगीत बना दिया गया और जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में चुना गया क्योंकि यह भारत की धर्मनिरपेक्ष विविधता को प्रतिबिंबित करता है ये आरोप भी लगाए गए कि जन गण मन ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम की स्तुति में लिखा गया  था यह मीडिया में दी गई गलत खबरों के कारण हुआ जार्ज पंचम द्वारा बंग भंग के फैसले को पलटने का स्वागत करने के दौरान एक ही दिन दो गीत गाए गए थे पहला था रामानुज चौधरी द्वारा लिखित गीत जो जार्ज पंचम के बंगभंग के फैसले को पलटने की प्रशंसा में था और दूसरा था जन गण मन एंग्लो इंडियन मीडिया ने यह गलत खबर दी कि जन गण मन जार्ज पंचम की शान में गाया गया था। एक आरोप यह भी है कि इसमें ‘अधिनायक’ शब्द का प्रयोग जार्ज पंचम के लिए किया गया है टैगोर ने यह स्पष्ट किया था कि अधिनायक से आशय है ‘युगों युगों से मनुष्य की नियति का महान सारथी’ और यह किसी भी तरह से जार्ज पंचम, जार्ज षष्ठम या कोई भी जार्ज नहीं हो सकता भाषाई मीडिया ने इसका समाचार सही ढंग से दिया था और टैगोर को ठीक से समझने वाले अध्येताओं ने भी इसकी  ऐसी ही व्याख्या की।  राष्ट्रगान भारत का सच्चा प्रतिबिंब है दक्षिणपंथी तत्व पूरे वंदे मातरम गीत को गाने पर जोर देते हैं और इसे राष्ट्रगान पर प्राथमिकता देते हैं मुझे याद है कि 1992-93 की मुंबई हिंसा के बाद जब शांति मार्च निकाले जा रहे थे, तब इन जुलूसों को हूट करने वाले चिल्ला रहे थे  ‘इस देश में रहना है तो  वंदे मातरम कहना होगा’ शुक्र है कि भारत की गीत समिति ने जन गण मन और वंदे मातरम के बीच एक  बेहतरीन संतुलन कायम किया। सरमा जैसे व्यक्ति आज भी लोगों को डराने-धमकाने के लिए बहानों की खोज करते रहते हैं।  उन्हें उन गौरवशाली आंदोलनों के बारे में कुछ भी पता नहीं है जिनसे आमार सोनार जैसे गीत निकले। (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया। लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)

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