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Home»भारत

अगर ‘वोट चोरी’ नहीं रुकी तो लोकतंत्र चुनाव कराता रहेगा, लेकिन जनता के बिना

adminBy adminDecember 17, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित कांग्रेस की ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ महारैली सिर्फ़ एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की मौजूदा हालत पर एक खुला आरोपपत्र थी। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी समेत कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने जिस आक्रामक भाषा में चुनाव आयोग, भाजपा और आरएसएस को कटघरे में खड़ा किया, उससे यह साफ़ हुआ कि विपक्ष अब चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को देश की सबसे बड़ी लड़ाई के रूप में पेश करना चाहता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

राहुल गांधी का यह कहना कि “चुनाव आयुक्त देश के हैं, मोदी के नहीं”, सीधे-सीधे संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल है। उनका आरोप है कि कानून बदलकर चुनाव आयोग को सरकार के नियंत्रण में लाया गया और उसी का नतीजा है कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ियां, वोट कटने-जुड़ने और संदिग्ध मतदान की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार जैसे राज्यों के उदाहरण देकर राहुल गांधी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि यह समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं, बल्कि एक सुनियोजित पैटर्न है।

संविधान और सत्ता की राजनीति

रैली में बार-बार संविधान और सत्य का ज़िक्र हुआ। राहुल गांधी ने आरएसएस की विचारधारा को ‘सत्य’ के विपरीत ‘शक्ति’ पर आधारित बताया और मनुस्मृति बनाम संविधान की बहस को फिर से केंद्र में ला दिया। मल्लिकार्जुन खरगे ने इसे गरीबों और वंचितों के वोट के अधिकार से जोड़ते हुए कहा कि अगर वोट का अधिकार ही छीन लिया गया, तो लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा। प्रियंका गांधी ने मीडिया, न्यायपालिका और जांच एजेंसियों पर दबाव का मुद्दा उठाकर यह रेखांकित किया कि संस्थागत संतुलन कैसे कमजोर किया गया है।

लेकिन सवाल सिर्फ़ आरोपों का नहीं है इस पूरी रैली के बावजूद एक असहज सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि विपक्ष अब तक भाजपा पर लग रहे ‘वोट चोरी’ के आरोपों को रोकने में व्यावहारिक रूप से नाकाम दिखा है। संसद के भीतर सवाल उठे, सड़कों पर रैलियां हुईं, प्रेस कॉन्फ्रेंस हुईं, लेकिन चुनावी नतीजों और प्रक्रियाओं में कोई ठोस बदलाव नहीं दिखा। हर हार के बाद आरोप तेज़ होते हैं, हर जीत के बाद सत्ता पक्ष उन्हें खारिज कर देता है, और व्यवस्था जस की तस बनी रहती है। यह स्थिति विपक्ष की रणनीतिक सीमा को भी उजागर करती है।

केवल मंचों से भाषण, आरोप और प्रतीकात्मक विरोध उस मशीनरी को नहीं रोक पा रहे हैं, जिस पर कब्ज़े का आरोप है। अगर चुनाव आयोग, प्रशासन और मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता के साथ खड़ा है, तो सवाल उठता है कि विपक्ष के पास वास्तविक दबाव बनाने का कौन-सा रास्ता बचता है?

लोकतंत्र | चुनाव |

लोकतंत्र की आख़िरी ढाल

यहीं पर यह बहस एक निर्णायक मोड़ लेती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब संस्थाएं कमजोर पड़ी हैं, तब-तब लोकतंत्र को बचाने का काम जनता ने किया है। सिर्फ़ विपक्षी दलों के भरोसे लोकतंत्र नहीं बचता। अगर जनता खुद यह मानने लगे कि उसका वोट, उसकी आवाज़ और उसका अधिकार छीना जा रहा है, तभी सत्ता पर वास्तविक दबाव बनेगा।

आज स्थिति यह है कि विपक्ष भाजपा पर वोट चोरी का आरोप तो लगा रहा है, लेकिन उसे रोकने की ताकत अकेले उसके पास नहीं दिखती। ऐसे में लोकतंत्र को बचाने का एक ही रास्ता बचता है, जनता का सड़क पर उतरना। जब तक देश की जनता खुद संगठित होकर, शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ संघर्ष के जरिए इस कथित ‘वोट चोरी’ के खिलाफ खड़ी नहीं होगी, तब तक किसी भी रैली या भाषण से व्यवस्था बदलने की उम्मीद कम ही है।

रामलीला मैदान की रैली ने लोकतंत्र पर मंडराते खतरे की ओर ध्यान जरूर खींचा है, लेकिन यह भी साफ़ कर दिया है कि लड़ाई केवल विपक्ष बनाम भाजपा की नहीं रही। यह लड़ाई अब जनता बनाम व्यवस्था की बनती जा रही है। अगर वोट सचमुच लोकतंत्र की आत्मा है, तो उसकी रक्षा के लिए सबसे आगे जनता को ही आना होगा। वरना खतरा यह है कि लोकतंत्र चुनाव तो कराता रहेगा, लेकिन जनता के बिना।

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