प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा बीते दस वर्षों में 6,312 मामले दर्ज किए गए, लेकिन इसी अवधि में सिर्फ 120 मामलों में दोषसिद्धि हो सकी, यह आंकड़ा खुद केंद्र सरकार ने संसद में दिया है। अब सवाल यह नहीं है कि आंकड़े क्या कहते हैं, सवाल यह है कि ये आंकड़े देश की जांच प्रणाली, न्याय प्रक्रिया और एजेंसी की भूमिका पर क्या संकेत देते हैं? क्या ईडी की बढ़ती शक्तियाँ उसकी जवाबदेही की कीमत पर आई हैं?
2014 के बाद मामलों की बाढ़: सक्रियता या आक्रामकता?
2014 से पहले ईडी हर साल मुश्किल से 200 से कम मामले दर्ज करती थी। लेकिन 2019 के बाद यह संख्या अचानक कई गुना बढ़कर सालाना 1,000 से अधिक तक पहुँच गई। यह वृद्धि क्या बताती है? क्या देश में अपराध अचानक इतना बढ़ गया? या फिर एजेंसी को मिले नए कानूनी अधिकारों ने उसे अधिक सक्रिय या अधिक आक्रामक बना दिया? या यह संख्या बताती है कि एजेंसी अब पहले से ज़्यादा लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, लेकिन मजबूत सबूत जुटाने में पिछड़ रही है? जब कार्रवाई हजारों में और दोषसिद्धि सैकड़ों में भी नहीं तो सवाल उठना लाज़मी है कि क्या जांच की गुणवत्ता गिर रही है?
93 क्लोज़र रिपोर्ट और 1,185 पुराने बंद मामले: क्या शुरुआती कार्रवाई जल्दबाज़ी में हुई?
संसद में बताया गया कि: 2019 के बाद 93 मामलों में क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल की गई क्योंकि “मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध नहीं बनता था”। 2019 से पहले 1,185 मामलों को बंद किया गया क्योंकि उनमें भी मनी लॉन्ड्रिंग का कोई आधार नहीं मिला। यहाँ गम्भीर प्रश्न खड़े होते हैं: क्या इतने मामलों में कार्रवाई बिना पर्याप्त आधार के शुरू की गई थी? यदि जांच के बाद खुद एजेंसी को अपराध नहीं मिला, तो क्या इन मामलों ने लोगों की प्रतिष्ठा, आजीविका और राजनीतिक करियर को नुकसान पहुँचाया? और अगर आरोपी निर्दोष साबित हुए, तो क्या एजेंसी पर कोई जवाबदेही तय होती है?
क्या कुछ मामलों में कार्रवाई का उद्देश्य कानूनी था या राजनीतिक?
यह तथ्य कि कई मामलों में अपराध साबित नहीं हो पाया, और कई मामलों को खुद एजेंसी ने बंद किया यह प्रश्न उठाता है कि अगर आरोप ही नहीं टिक पाए, तो कार्रवाई किस आधार पर शुरू की गई थी? यहाँ समाज, मीडिया और संसद में कई तरह की आशंकाएँ उठती हैं:
- क्या कार्रवाई राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव में शुरू हुई? क्योंकि मुकदमे तो खुले, मगर अदालत तक पहुँचते-पहुँचते मामला ही नहीं बचा।
- क्या कुछ कार्रवाइयाँ लोगों को डराने या चुप कराने के लिए हुईं? क्योंकि कई विपक्षी नेताओं ने कहा है कि ईडी की कार्रवाई के बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता घटी, संगठन कमजोर पड़े, चुनावी नतीजों पर असर पड़ा।
- क्या यह ‘जांच’ कम और ‘संदेश’ ज़्यादा देने की रणनीति थी? क्योंकि मामला शुरू होते ही छापे पड़ते हैं, सुर्खियाँ बनती हैं लेकिन अंत में सजा लगभग न के बराबर।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता भी यही है कि केस बहुत, सजा कम
इस साल सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने भी पूछा था कि जब ईडी इतने मामले दर्ज कर रही है, तो दोषसिद्धि इतनी कम क्यों है? यह सीधे-सीधे जांच की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है।
दोषी न ठहराने से यह भी साबित होता है कि जब किसी आरोपी पर आरोप सिद्ध न हो पाए, तो दो बातें साफ़ होती हैं: पहली या तो मामला शुरू से ही कमज़ोर आधार पर हुआ था। या जिस उद्देश्य के लिए कार्रवाई की गई थी, वह मुकदमे से ज़्यादा प्रभावशाली था। जैसे दबाव बनाना, राजनीतिक असर पैदा करना, मीडिया ट्रायल, या विरोधी आवाज़ों को शांत करना।
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति यही होती है जब जांच के नाम पर अभियोजन नहीं, बल्कि दबाव का उपकरण बन जाए। और इसलिए ऐसी कार्रवाइयों पर निगरानी और जवाबदेही दोनों जरूरी हैं।
शक्ति और जवाबदेही का असंतुलन: क्या सुधार की ज़रूरत है?
जांच एजेंसियों को अधिक शक्तियाँ मिली हैं, लेकिन जवाबदेही और पारदर्शिता उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। कानून में यह भी है कि आरोपी को ही अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी यह भारतीय न्याय व्यवस्था के पारंपरिक सिद्धांत “presumption of innocence” से उलट है। जब शक्ति बढ़े और जवाबदेही न बढ़े तब हर एजेंसी का दुरुपयोग संभव है, चाहे वह किसी भी सरकार के दौर में हो।
निष्कर्ष: क्या यह अपराध से लड़ाई है या राजनीतिक लड़ाई का नया तरीका?
6,312 मामलों में से सिर्फ़ 120 दोषसिद्धि। 93 क्लोज़र रिपोर्ट। 1,185 बंद किए गए मामले, ये सिर्फ़ आंकड़े नहीं हैं ये प्रश्न हैं। और ये प्रश्न सिर्फ़ सरकार से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से पूछने की ज़रूरत है: क्या जांच एजेंसियाँ आज़ाद हैं? क्या वे राजनीतिक रूप से निष्पक्ष हैं? क्या जिन लोगों पर कार्रवाई हुई और बाद में निर्दोष निकले उनका नुकसान कौन भरेगा? क्या यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने वाली प्रवृत्ति नहीं है?
क्योंकि अगर जांच के नाम पर कार्रवाई हो और न्याय के नाम पर नतीजा न मिले तो यह केवल मामलों की संख्या नहीं बढ़ाता, यह लोकतंत्र में अविश्वास भी बढ़ाता है।
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