भीड़ की हिंसा अब केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं
भारत में भीड़ की हिंसा अब केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रही। यह एक राजनीतिक-सांस्कृतिक परियोजना का रूप ले चुकी है, जहां हिंसा करने वाले खुद को अपराधी नहीं, बल्कि “सही पक्ष” का सिपाही समझते हैं। बिहार के नवादा में मोहम्मद अथर हुसैन की हत्या और पश्चिम बंगाल में हमलावरों का सार्वजनिक सम्मान, इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखना अब अनिवार्य हो गया है।
सार्वजनिक संदेश के रूप में एक हत्या
बिहार के नवादा में एक फेरीवाले से पहले उसका नाम पूछा गया, फिर उसकी पहचान देख कर उसके बाद जो हुआ, वह किसी सभ्य समाज में कल्पना से परे होना चाहिए। उंगलियां तोड़ी गईं, लोहे की रॉड से पीटा गया, जलाने की कोशिश हुई। यह हत्या नहीं थी, यह सार्वजनिक संदेश के साथ दिया गया दंड था: “गलत पहचान की कीमत जान से चुकानी होगी।”
अपराध को मिलती वैधता
कुछ समय तक यह भ्रम बना रहा कि ऐसी घटनाएं कम हो रही हैं। लेकिन यह शांति नहीं थी यह सिर्फ़ राजनीतिक संकेतों के इंतज़ार में रुकी हुई हिंसा थी। जैसे ही उत्तर प्रदेश में अख़लाक़ हत्याकांड से जुड़े दोषियों के मामलों को वापस लेने की ख़बरें आईं, संदेश नीचे तक साफ़ पहुंच गया: कुछ हत्याएं माफ़ की जा सकती हैं। कानून में नहीं, संविधान में नहीं लेकिन सत्ता की नैतिकता में।
बंगाल: हिंसा का उत्सव
इसी नैतिक पतन का दूसरा चेहरा पश्चिम बंगाल में दिखा। कोलकाता में चिकन पैटी बेचने वाले दो लोगों पर हमले के आरोप में ज़मानत पर छूटे व्यक्तियों को न केवल बधाई दी गई, बल्कि उन्हें सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया गया। यह काम किसी सड़कछाप संगठन ने नहीं, बल्कि राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने किया। यह कोई मामूली राजनीतिक घटना नहीं है। यह पीड़ित के ख़िलाफ़ और अपराधी के पक्ष में खड़े होने की औपचारिक घोषणा है। नतीजा यह है कि पीड़ित खुले तौर पर कह रहे हैं कि वे डरे हुए हैं। भारत के लोकतंत्र में अब यही नया संतुलन बन रहा है। आरोपी निडर, पीड़ित भयभीत।
पीछे हटता राज्य
जब राज्य अपराध पर शर्मिंदा होने के बजाय उसे वैचारिक ढाल देता है, तो भीड़ को रोकना असंभव हो जाता है। बिहार हो या बंगाल, उत्तर प्रदेश हो या कहीं और, हर जगह पैटर्न एक जैसा है। पहले अफ़वाह, फिर पहचान, फिर हिंसा, और अंत में राजनीतिक चुप्पी या समर्थन। यह स्थिति अल्पसंख्यकों के लिए ही नहीं, पूरे समाज के लिए खतरनाक है। क्योंकि आज जिस पहचान को निशाना बनाया जा रहा है, कल वह दायरा और फैलेगा। भीड़ कभी रुकती नहीं, उसे सिर्फ़ नया लक्ष्य चाहिए।
टूटते भरोसे का दुष्परिणाम
लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता, वह न्याय के भरोसे से चलता है। जब यह भरोसा टूटता है, तो समाज एक खतरनाक मोड़ पर पहुंचता है, जहां लोग यह सोचने लगते हैं कि क्या राज्य सचमुच उनकी रक्षा करेगा।
अगर यह धारणा गहरी होती गई, तो कानून-व्यवस्था का संकट केवल पुलिस की नाकामी नहीं रहेगा, बल्कि राज्य की वैधता का संकट बन जाएगा। यह वह बिंदु होता है जहां हिंसा व्यक्तिगत नहीं रहती, वह सामाजिक प्रतिक्रिया बन जाती है।
एक आखिरी चेतावनी
भीड़ की हिंसा को राजनीतिक संरक्षण देना आग से खेलने जैसा है। यह आग पहले उन्हीं समुदायों को जलाती है जिन्हें “कमज़ोर” समझा जाता है, लेकिन अंततः यह पूरे समाज को चपेट में लेती है। मोहम्मद अथर हुसैन की मौत और कोलकाता के भयभीत विक्रेता हमें आख़िरी चेतावनी दे रहे हैं। या तो राज्य बिना शर्त संविधान के साथ खड़ा हो, या फिर इतिहास में यह दर्ज होगा कि जब हिंसा को रोका जा सकता था, तब सत्ता ने ताली बजाना चुना।
निष्कर्ष: जंगल राज का खतरा
अगर भाजपा सरकारें इसी तरह मॉब लिंचिंग करने वालों और कानून को अपने हाथ में लेने वालों को दंडित करने के बजाए उनकी सराहना करेगी, उनपर तालियां बजाएगी और उनपर दर्ज अपराध वापस लेगी तो मजबूरन जिन लोगों पर अत्याचार हो रहे हैं वो भी अपनी सुरक्षा के लिए कानून अपने हाथ में लेने पर मजबूर हो जाएंगे, जिससे कानून व्यवस्था बाधित होगी और देश में जंगल राज कायम हो जाएगा।
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