जब कोई जांच एजेंसी दावा करे कि उसकी दोषसिद्धि दर 100 प्रतिशत है, तो यह उपलब्धि नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए चेतावनी होनी चाहिए। न्याय व्यवस्था में “परफेक्ट रिकॉर्ड” का मतलब अक्सर यह नहीं होता कि अपराध शून्य संदेह के साथ साबित हुए हैं, बल्कि यह कि प्रक्रिया ने प्रतिरोध की सारी गुंजाइश खत्म कर दी है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का दावा जिसे गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में गर्व के साथ दोहराया, कि 2024 में 100 प्रतिशत दोषसिद्धि हासिल की गई, पहली नज़र में आतंकवाद के ख़िलाफ़ सख़्ती का प्रतीक लगता है। लेकिन जब इस दावे की परतें खोली जाती हैं, तो जो तस्वीर उभरती है, वह न्याय की नहीं, बल्कि लंबी हिरासत, ज़मानत-असम्भवता और हताश स्वीकारोक्ति की है।
मुकदमे से पहले ही सज़ा पूरी
एनआईए और यूएपीए के तहत दर्ज मामलों में आरोपी वर्षों तक जेल में रहते हैं। अक्सर बिना मुकदमा शुरू हुए। दस, बारह, यहां तक कि चौदह साल की हिरासत अब अपवाद नहीं रही। यह अवधि भारतीय क़ानून में आजीवन कारावास के बराबर है। ऐसे में यह पूछना ज़रूरी है कि अगर किसी व्यक्ति ने बिना दोषसिद्धि के ही सज़ा काट ली, तो अदालत में दोष स्वीकार करना क्या सच में ‘स्वैच्छिक’ कहा जा सकता है?
यूएपीए की धारा 43D(5) और वाटाली फ़ैसले ने जमानत को लगभग असंभव बना दिया है। आरोपी को अभियोजन की सामग्री को ही सच मानते हुए यह साबित करना होता है कि आरोप झूठे हैं, जबकि बचाव पक्ष की सामग्री पर अदालत विचार ही नहीं करती। यह न्याय नहीं, संवैधानिक विडंबना है।
स्वीकारोक्ति: न्याय का रास्ता या जेल से निकलने का एकमात्र दरवाज़ा?
द वायर की पड़ताल बताती है कि एनआईए के 40 प्रतिशत से अधिक मामलों में दोषसिद्धि गुनाह कबूलने के ज़रिये हुई। इनमें भारी बहुमत मुस्लिम आरोपियों का है और वह भी सामाजिक रूप से हाशिये पर खड़े तबकों से। यह आंकड़ा संयोग नहीं है। यह उस व्यवस्था का परिणाम है जिसमें आरोपी को साफ़ बता दिया जाता है कि मुकदमा लड़ोगे तो ज़िंदगी जेल में कटेगी, कबूल कर लोगे तो शायद आज़ादी मिल जाए।
यह कोई “प्ली बार्गेनिंग” नहीं है, क्योंकि यूएपीए में इसकी अनुमति ही नहीं है। यह उससे भी ज़्यादा भयावह है। कानूनी दबाव में पैदा हुई आत्मसमर्पण की संस्कृति।
एजेंसी की चुप्पी, अदालतों की औपचारिकता
एनआईए यह कहकर पल्ला झाड़ लेती है कि दोष स्वीकार करना अभियोजन और आरोपी के बीच नहीं, बल्कि अदालत और आरोपी के बीच की प्रक्रिया है। यह तर्क तकनीकी रूप से सुविधाजनक है, लेकिन नैतिक रूप से खोखला। जब एजेंसी की मौजूदगी में, वर्षों की हिरासत के बाद, आरोपी टूटकर अपराध स्वीकार करता है तो यह मान लेना कि अभियोजन की कोई भूमिका नहीं, सच्चाई से मुंह मोड़ना है। इससे भी अधिक चिंताजनक है न्यायपालिका का रवैया।
कई मामलों में दोष स्वीकारोक्ति की अर्जी को बिना यह जांचे स्वीकार कर लिया गया कि वह वास्तव में स्वैच्छिक थी या नहीं। कुछ मामलों में तो दोष स्वीकार करने के बावजूद आजीवन कारावास जैसी सजाएं दी गईं, जिसे बाद में उच्च न्यायालयों ने फटकार के साथ पलट दिया।
परफेक्ट रिकॉर्ड
लोकतंत्र में जांच एजेंसी की सफलता का पैमाना यह नहीं होता कि उसने कितने लोगों को दोषी ठहराया, बल्कि यह होता है कि कितने मामलों में निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध न्याय हुआ। अगर 15 साल में दर्ज 600 से अधिक मामलों में से केवल पांचवां हिस्सा ही फैसले तक पहुंचा हो, अगर वेबसाइट से फैसले हटाए जा रहे हों, अगर ज़्यादातर दोषसिद्धियां स्वीकारोक्ति के ज़रिये हों, तो “100 प्रतिशत दोषसिद्धि” उपलब्धि नहीं, अभियोग है। आतंकवाद से लड़ाई ज़रूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह लड़ाई संविधान को कुचलकर लड़ी जाएगी?
क्या सुरक्षा के नाम पर न्याय को स्थगित कर देना स्वीकार्य है? और क्या एक लोकतांत्रिक राज्य यह मान सकता है कि निर्दोष लोग भी “कुछ साल जेल में रहकर टूट ही जाएंगे”? अगर जवाब हां है, तो फिर आतंकवाद से लड़ाई नहीं,हम न्याय के ख़िलाफ़ युद्ध लड़ रहे हैं। और इस युद्ध में जीत किसी भी एजेंसी की नहीं होगी।