भारत का संविधान किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का दस्तावेज़ है। लेकिन जब कोई बहुसंख्यक संगठन खुलेआम यह तय करने लगे कि कौन-सा त्योहार कौन मनाएगा, कौन क्या खयेगा और कौन-सा बोर्ड कौन लगाएगा और कौन-सी सजावट ‘अनुचित’ है, तब सवाल केवल क्रिसमस का नहीं रह जाता—सवाल नागरिक स्वतंत्रता और बंधुत्व का हो जाता है।
विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने ताज़ा अपील की है कि हिंदू समाज क्रिसमस न मनाए। पहली नज़र में तो यह एक ‘सांस्कृतिक आग्रह’ लग सकता है। लेकिन जब यही अपील दुकानदारों, मॉल्स और स्कूलों तक फैलाई जा रही हो, और जब इसके साथ खरीदारी न करने पर विचार जैसी बातें जुड़ जाती हैं, तब यह आग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक आचरण को नियंत्रित करने की कोशिश बन जाता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
‘धर्मांतरण’ का डर, लेकिन सबूत कहां है?
विहिप अपनी इस अपील को ‘धर्मांतरण के खतरे’ से जोड़कर बता रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या क्रिसमस मनाना धर्मांतरण है? क्या ‘हैप्पी क्रिसमस’ लिखना नागरिकता और आस्था के लिए खतरा है? और अगर खतरा है, तो उसके ठोस, न्यायिक रूप से सिद्ध प्रमाण कहां हैं?
भारत में ईसाइयों की आबादी महज़ 2.3 प्रतिशत है। दिल्ली जैसे महानगर में यह संख्या डेढ़ लाख के आसपास है। इसके बावजूद, अगर बहुसंख्यक समाज को उनसे ‘सांस्कृतिक खतरा’ महसूस होने लगे, तो यह डर आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है, न कि सांस्कृतिक सजगता को।
संविधान और सांस्कृतिक सीमांकन
सुप्रीम कोर्ट के वकील शाहरुख आलम का तर्क इस पूरे विवाद का केंद्र है। वह साफ़ कहते हैं कि यह अपील संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘बंधुत्व’ (Fraternity) के सिद्धांत के विरुद्ध है। संविधान केवल पूजा की आज़ादी नहीं देता, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि समाज डर, बहिष्कार और दबाव से मुक्त रहे।
जब एक राजनीतिक–सामाजिक रूप से शक्तिशाली संगठन यह कहता है कि कौन-सा त्योहार मनाना ‘गलत’ है, तो भले ही वह ज़बरदस्ती न करे, उसका प्रभाव ज़बरदस्ती जैसा ही होता है। सुप्रीम कोर्ट ने पृथ्वीराज चौहान मामला (2018), हिजाब फैसला (2022) और कांवड़ यात्रा से जुड़े मामलों में साफ़ कहा है कि सार्वजनिक जीवन में पहचान की जांच और सांस्कृतिक छंटनी संविधान की आत्मा के खिलाफ़ है।
बाज़ार, स्कूल और ‘संस्कृति की पुलिसिंग’
यह अपील केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आर्थिक और शैक्षिक स्पेस में भी की गई है। दुकानदारों से कहा जा रहा है कि वे ‘हैप्पी क्रिसमस’ न लिखें। मॉल्स और स्कूलों को चेताया जा रहा है कि वे सजावट न करें। और व्यापारियों से कहा जा रहा है कि वे ऐसी अपीलों पर ‘विचार’ करें। यह वही रास्ता है, जहां विचार, दबाव, बहिष्कार, विजिलांटिज़्म बन जाता है। इतिहास गवाह है कि ऐसे ‘शांतिपूर्ण आग्रह’ अक्सर ज़मीनी स्तर पर हिंसा में बदल जाते हैं।
इतिहास की अनदेखी
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. शम्सुल इस्लाम का स्मरण दिलाना महत्वपूर्ण है। 1997 में गुजरात के डांग ज़िले में क्रिसमस को रोके जाने, चर्च जलाए जाने और स्कूलों पर कब्ज़े की घटनाएं कोई मिथक नहीं हैं, वे दर्ज इतिहास हैं। और यह भी एक तथ्य है कि, लाखों भारतीय ईसाई-बहुल देशों में दीपावली, होली और मंदिर उत्सव मनाते हैं। शिकागो में दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है। अबू धाबी जैसे मुस्लिम देश में भव्य मंदिर है। तो फिर भारत में ईसाइयों के त्योहार से असहजता क्यों?
भाजपा काल और डर का माहौल
यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के आंकड़े बताते हैं कि 2014 के बाद सिर्फ मुसलमानों ही नहीं ईसाइयों के खिलाफ़ भी हिंसा में लगभग 500% की वृद्धि हुई है। लगभग हर घटना में धमकी, निगरानी और भीड़ के दबाव का एक-सा पैटर्न सामने आया है। ऐसे माहौल में, जब कोई बड़ा संगठन कहता है कि “क्रिसमस मत मनाइए”, तो वह एक सामान्य सलाह नहीं रहती, वह संदेश बन जाती है।
सवाल यह नहीं है कि हिंदू क्रिसमस मनाएं या न मनाएं। सवाल यह है कि क्या किसी बहुसंख्यक संगठन को यह तय करने का अधिकार है? क्या ‘सांस्कृतिक गर्व’ का अर्थ दूसरों की संस्कृति से दूरी और संदेह है? और क्या भारत को सचमुच उस दिशा में ले जाया जा रहा है, जहां त्योहार भी पहचान- परीक्षा बन जाएं? संविधान हमें यह सिखाता और अधिकार देता है कि आत्मविश्वासी संस्कृति कभी डरती नहीं। जो संस्कृति दूसरे के उत्सव से हिल जाए, वह मजबूत नहीं, असुरक्षित होती है।
आज क्रिसमस निशाने पर है। कल सवाल किसी और त्योहार का होगा। और तब शायद सवाल यह नहीं रहेगा कि “कौन क्या मनाए” बल्कि यह होगा कि कौन बचेगा, और किस शर्त पर।