चार साल की एक मासूम बच्ची… गर्मी की छुट्टियां बिताने अपनी नानी के घर आई थी। उसे क्या पता था कि इंसानी चेहरे में छिपा एक दरिंदा उसकी जिंदगी छीन लेगा। पूणे के भोर तहसील में 65 साल के भीमराव कांबले ने इस मासूम को बहला-फुसलाकर अपने तबेले में ले गया। वहां उसने पहले बच्ची के साथ रेप किया, फिर पत्थर से कुचलकर उसकी बेरहमी से हत्या कर दी। जब बच्ची देर तक घर नहीं लौटी, तो परिजनों ने उसे ढूंढना शुरू किया।
कुछ देर बाद तबेले से उसकी लाश मिली। सीसीटीवी फुटेज में आरोपी बच्ची को अपने साथ ले जाता साफ दिखाई दे रहा है। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन सवाल सिर्फ इस एक दरिंदे या इस एक आरोपी का नहीं है। सवाल उस कानून का है, जहां नाबालिग बच्चियों के साथ हैवानियत करने वाले कई आरोपी जमानत पर बाहर आ जाते हैं। और फिर, वही दरिंदे किसी दूसरी मासूम की जिंदगी बर्बाद कर देते हैं। देश में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जहां रेप के आरोपी बेल पर छूटे और फिर दोबारा अपराध किया।
आखिर कब तक? कब आएगा वक्त इस कानून को बदलने का ? नाबालिग बच्चियों से रेप और हत्या जैसे मामलों में, अपराध साबित होते ही सीधे फांसी की सजा होनी चाहिए। जब तक अदालत अंतिम फैसला न दे दे, ऐसे आरोपियों को किसी भी हालत में जमानत नहीं मिलनी चाहिए। और सिर्फ अपराधी ही नहीं-जो लोग ऐसे दरिंदों को बचाने की कोशिश करें, सबूत मिटाएं, गवाहों को डराएं, या राजनीतिक दबाव बनाएं, उन पर भी सख्त मुकदमा चलना चाहिए। क्योंकि जो दरिंदे को बचाता है, वह भी उस अपराध में बराबर का भागीदार है।
महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने और फांसी की मांग करने की बात कही है। लेकिन देश की हर बेटी के लिए यही कानून बनना चाहिए, सिर्फ एक मामले के लिए नहीं। मासूम बच्चियों की सुरक्षा पर राजनीति नहीं, निर्णायक कानून चाहिए। दरिंदों के लिए रहम नहीं, सिर्फ सख्त सजा। ताकि अगली बार कोई हैवान किसी मासूम की तरफ देखने से पहले सौ बार सोचे।
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