सोशल मीडिया खोलते ही आजकल इंसान को ज्ञान, संवेदना और भाईचारे से जुड़ी बातें कम, जबकि नफ़रत, झूठ और ज़हर से भरी पोस्ट ज़्यादा दिखाई देती हैं। खासतौर पर इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ सुनियोजित तरीके से ऐसे वीडियो, पोस्ट और कथित “खुलासे” परोसे जाते हैं, जिनका सच से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। एडिटेड वीडियो, झूठे दावे, फर्जी आंकड़े और उकसाने वाली भाषा, यही आज नफ़रत के कारोबार का सबसे बड़ा हथियार बन चुके हैं। दुर्भाग्य यह है कि आम लोग, विशेषकर वे जो हर जानकारी की जांच नहीं कर पाते, इन झूठों को सच मान बैठते हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
धीरे-धीरे उनके मन में मुसलमानों के प्रति अविश्वास, घृणा और हिंसा का ज़हर भर दिया जाता है। महाराष्ट्र के यवतमाल में दो ट्रक ड्राइवरों पर हुआ बर्बर हमला इसी जहरीले माहौल की खौफनाक उपज है। फल लेकर जा रहे दो मेहनतकश ड्राइवर-एल्विन और मोहम्मद नदाफ निसार कुरैशी को किस अपराध की सज़ा दी गई? क्या इसलिए कि वे दक्षिण भारत से थे? क्या इसलिए कि उनका नाम और पहनावा कुछ लोगों की नफ़रत की राजनीति के लिए पर्याप्त था?
या इसलिए कि भीड़ को अब कानून, संविधान और इंसानियत से कोई डर नहीं रहा? 20 से 30 किलोमीटर तक पीछा करना, हथियारों से लैस होकर ट्रक को रोकना, और फिर जानलेवा हमला करना, यह कोई साधारण “रोड रेज” नहीं हो सकता। यह एक सुनियोजित हमला था, जिसमें नफ़रत साफ़ झलकती है। लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है कि पुलिस ने पहले 24 घंटे तक एफआईआर दर्ज नहीं की और बाद में मामले को “रोड रेज” बताकर उसकी गंभीरता को कम करने की कोशिश की।
जब एक व्यक्ति आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा हो, कई सर्जरी की आवश्यकता हो, तब हल्की धाराएं लगाना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि न्याय के साथ क्रूर मज़ाक है। हालांकि इसे दरोडा और लूट मार की केस बनाना चाहिए था। रोड रेज? क्या कोई रोड रेज में 30 किलोमीटर तक पीछा करता है? क्या कोई रोड रेज में हथियार लेकर घूमता है? सच तो यह है कि उत्तर भारत की तरह अब महाराष्ट्र की सड़कों पर भी कुछ स्वयंभू “गौरक्षक” और “निगरानी दल” लंबे समय से कानून को अपने हाथ में लेते आ रहे हैं। वे न तो पुलिस हैं, न किसी अदालत ने उन्हें अधिकार दिया है।
फिर भी वे खुलेआम वाहनों को रोकते हैं, तलाशी लेते हैं, धमकाते हैं और कई बार हत्या तक कर देते हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि उस सामाजिक बीमारी का लक्षण है जिसे वर्षों से नफ़रत की राजनीति ने पोषित किया है। जब नेताओं के भाषणों में विभाजन हो, जब टीवी स्टूडियो अदालत बन जाएं, और जब सोशल मीडिया झूठ की फैक्ट्री में बदल जाए, तब सड़कों पर भीड़ का हिंसक होना तय है। एल्विन का यह कहना कि “हम रात में महाराष्ट्र की सड़कों पर चलने से बचते हैं” किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।
सोचिए, अपने ही देश में नागरिकों को अपने नाम, अपनी शक्ल और अपने धर्म के कारण डरकर सफर करना पड़े तो इससे बड़ा लोकतांत्रिक पतन क्या हो सकता है? आज सवाल केवल एल्विन और कुरैशी का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत में कानून का राज रहेगा या भीड़ का? क्या सड़कें सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित रहेंगी या पहचान देखकर न्याय और सुरक्षा तय होगी? नफ़रत की राजनीति चुनाव जिता सकती है, लेकिन समाज हार जाता है।
और जब समाज हारता है, तब सबसे पहले इंसानियत मरती है।यह समय है कि सरकार, पुलिस और न्यायपालिका ऐसे गिरोहों पर कठोरतम कार्रवाई करे। वरना वह दिन दूर नहीं जब हर सड़क, हर हाईवे और हर मोहल्ला भीड़तंत्र का अड्डा बन जाएगा। भारत की आत्मा उसकी विविधता, सहिष्णुता और भाईचारे में बसती है। अगर नफ़रत के सौदागर इसे नष्ट करने में सफल हो गए, तो हार केवल मुसलमानों की नहीं होगी, हार पूरे भारत की होगी। ऐसी घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं।
हाल ही में महाराष्ट्र में ही एक ट्रक चालक ने, जब कथित गौरक्षकों की भीड़ ने उसकी गाड़ी को घेरने और जबरन रोकने की कोशिश की, तो अपनी जान बचाने के लिए ट्रक आगे बढ़ा दिया, जिसमें हमलावरों को चोटें आईं। इसी तरह मार्च 2026 में, ‘फरसा बाबा’ के नाम से मशहूर गौरक्षक चंद्रशेखर की मथुरा में एक ट्रक की चपेट में आने से मौत हो गई थी, शुरुआती खबरों में इसे हत्या बताया गया, लेकिन पुलिस जांच और बाद की खबरों में इसे घने कोहरे के कारण हुआ एक सड़क हादसा माना गया।
इससे पहले दादरी लिंचिंग, पहलू खान लिंचिंग और रकबर खान लिंचिंग जैसी घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया था, जहां भीड़ ने कानून को अपने हाथ में लेकर निर्दोष लोगों की जान ले ली। जब राज्य नागरिकों को सुरक्षा देने में विफल होता है और हमलावरों को राजनीतिक संरक्षण मिलता दिखाई देता है, तब आम आदमी के सामने आत्मरक्षा के अलावा क्या विकल्प बचता है? यदि यही हाल रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब हर ट्रक ड्राइवर, हर व्यापारी और हर मुसाफिर अपनी सुरक्षा के लिए कानून नहीं, बल्कि अपनी गाड़ी और अपनी हिम्मत पर भरोसा करने को मजबूर होगा। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
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