महाराष्ट्र में अगर किसी आईएएस अधिकारी का नाम ईमानदारी, सख्ती और बेखौफ कार्रवाई के लिए सबसे पहले लिया जाता है, तो वह नाम है तुकाराम मुंढे। अपने 21 साल के प्रशासनिक जीवन में 25 से अधिक तबादले झेलने वाले इस अधिकारी ने जहां भी जिम्मेदारी संभाली, वहां व्यवस्था को नियमों के अनुसार चलाने की कोशिश की। आज खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के आयुक्त के रूप में वे मिलावटी दूध, नकली दवाओं, मिलावटी खाद्य पदार्थों और गुटखा माफियाओं के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रहे हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
लेकिन सवाल यह है कि क्या ईमानदारी की यही सजा है? जब कोई अधिकारी भ्रष्टाचारियों, मिलावटखोरों और माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई करता है, तो सबसे ज्यादा परेशानी आखिर किसे होती है? जाहिर है, उन्हीं लोगों को जिनकी करोड़ों की अवैध कमाई बंद होने लगती है। इसीलिए ऐसे अधिकारियों के खिलाफ विरोध भी होता है, दबाव भी बनाया जाता है और कई बार उनका तबादला भी चर्चा का विषय बन जाता है।
सबसे बड़ा सवाल जनता से है-आज अगर कोई अधिकारी आपकी थाली में ज़हर बनने वाली मिलावट रोकने की कोशिश कर रहा है… अगर कोई नकली दवाओं के कारोबार पर कार्रवाई कर रहा है… अगर कोई गुटखा माफियाओं के करोड़ों के धंधे पर चोट कर रहा है… तो क्या ऐसे अधिकारी का साथ देना समाज की जिम्मेदारी नहीं है? क्योंकि अगर ऐसे लोग भी अकेले छोड़ दिए गए, तो फिर ईमानदारी से काम करने की हिम्मत कौन करेगा? कड़वा सच क्या है?-देश का आम आदमी जानता है कि सरकारी व्यवस्था पर सवाल सिर्फ इसलिए नहीं उठते कि कुछ कर्मचारी भ्रष्ट हैं, बल्कि इसलिए कि कई मामलों में कानून का पालन समान रूप से होता हुआ दिखाई नहीं देता।
लोगों के बीच यह धारणा अक्सर सुनाई देती है कि अवैध शराब, सट्टा, गुटखा या दूसरे गैरकानूनी कारोबार लंबे समय तक बिना स्थानीय संरक्षण के चल पाना मुश्किल है। यह एक गंभीर धारणा है, और यदि कहीं ऐसी शिकायतें हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। अगर कानून सचमुच बराबर है…तो फिर सवाल उठते हैं। अगर पुलिस और प्रशासन पूरी सख्ती से कार्रवाई करे तो क्या अवैध शराब और प्रतिबंधित गुटखे का कारोबार इतनी आसानी से चल सकता है? अगर रोज़ निगरानी हो, तो क्या खुलेआम प्रतिबंधित सामान बिक सकता है? अगर जवाब “नहीं” है…तो फिर यह कारोबार आखिर चलता कैसे है? इन सवालों का जवाब केवल जनता नहीं, व्यवस्था को भी देना होगा।
जांच सिर्फ छोटे दुकानदार की क्यों?
अक्सर छापेमारी की खबरें आती हैं। माल ज़ब्त होता है। एफआईआर दर्ज होती है। लेकिन क्या कभी यह पता लगाया जाता है कि पूरा नेटवर्क कौन चला रहा था? कौन संरक्षण दे रहा था? पैसा कहाँ तक पहुँच रहा था? अगर हर मामले में केवल नीचे के लोगों पर कार्रवाई होगी और बड़े लोग बचते रहेंगे, तो अवैध कारोबार खत्म कैसे होगा?
ईमानदार अफसरों को सिस्टम का साथ चाहिए
तुकाराम मुंढे जैसे अधिकारी यह साबित करते हैं कि अगर नीयत साफ हो तो कार्रवाई संभव है। लेकिन एक अधिकारी अकेले पूरे सिस्टम को नहीं बदल सकता। उसे सरकार का सहयोग चाहिए…प्रशासन का सहयोग चाहिए…और सबसे बढ़कर जनता का सहयोग चाहिए। अगर हर बार ईमानदार अफसर ही दबाव में आएंगे और माफिया मजबूत होते जाएंगे, तो नुकसान किसी नेता का नहीं, आम जनता का होगा। मिलावटी दूध आपके घर आएगा…नकली दवा आपके मरीज तक पहुंचेगी…और ज़हरीला गुटखा आपके बच्चों तक।
कार्रवाई केवल माफियाओं पर नहीं, संरक्षण देने वालों पर भी हो
अगर सरकार सचमुच मिलावट और अवैध कारोबार खत्म करना चाहती है, तो कार्रवाई केवल फैक्ट्री मालिकों या छोटे विक्रेताओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जहां कहीं भी भ्रष्टाचार, मिलीभगत या संरक्षण के आरोप हों, वहां निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि किसी सरकारी कर्मचारी, पुलिस अधिकारी या अन्य जिम्मेदार व्यक्ति पर ऐसे आरोप साबित होते हैं, तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
साथ ही, ऐसे अधिकारियों की संपत्ति, आय के स्रोत और जीवनशैली की पारदर्शी जांच की व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि ईमानदार अधिकारी सम्मानित हों और दोषी कानून के दायरे में आएं। तुकाराम मुंढे का मुद्दा किसी एक अधिकारी का नहीं है। यह उस लड़ाई का प्रतीक है जिसमें एक तरफ कानून का राज है और दूसरी तरफ अवैध कमाई का साम्राज्य। आज फैसला महाराष्ट्र की जनता को करना है कि क्या हम मिलावटखोरों और माफियाओं के खिलाफ खड़े होने वाले अधिकारियों का साथ देंगे? या फिर उन्हें अकेला छोड़ देंगे, ताकि भ्रष्ट व्यवस्था पहले की तरह चलती रहे? याद रखिए…जब ईमानदार अधिकारी हारता है, तो सिर्फ एक अफसर नहीं हारता बल्कि हारती है पूरी जनता।
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