गुजरात की महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी में “मोदी तत्व” को समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम में शामिल करने का फैसला केवल एक अकादमिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह शिक्षा के भगवाकरण की उस लंबी परियोजना का हिस्सा है, जिसे संघ-भाजपा वर्षों से योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। विश्वविद्यालय, जो स्वतंत्र चिंतन, आलोचनात्मक विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के केंद्र होने चाहिए, उन्हें धीरे-धीरे राजनीतिक व्यक्तिपूजा और वैचारिक प्रचार के मंच में बदला जा रहा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पढ़ाई होगी या फिर सत्ता की पूजा? अगर मोदी जी पर पाठ पढ़ाया जाएगा, तो क्या उसमें गुजरात 2002 के दंगों का भी जिक्र होगा? क्या छात्रों को बताया जाएगा कि उस दौर में क्या हुआ था, कितनी जानें गई थीं, और देश ने क्या देखा था? क्या मोदी के प्रधानमंत्री काल में महीनों तक जलते रहे Manipur का भी अध्याय होगा? क्या यह भी पढ़ाया जाएगा कि जब एक राज्य हिंसा में डूबा था, तब सत्ता की खामोशी कैसी थी?
क्या उन घटनाओं पर भी चर्चा होगी, जब देश में मॉब लिंचिंग की वारदातें बढ़ीं? जब अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत भरी भीड़ सड़कों पर उतरी? जब बहिष्कार के खुले आह्वान हुए? क्या बुलडोजर की राजनीति को भी समाजशास्त्र का हिस्सा बनाया जाएगा? क्या यह पढ़ाया जाएगा कि किस तरह बिना अदालत, बिना सुनवाई, घरों और धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई हुई?
क्या छात्रों को यह भी बताया जाएगा कि सवाल पूछने वालों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं पर किस तरह जांच एजेंसियों का शिकंजा कसा गया?
क्या Enforcement Directorate और Central Bureau of Investigation के राजनीतिक इस्तेमाल पर भी कोई अध्याय होगा? या फिर सिर्फ एक चमकदार तस्वीर दिखाई जाएगी, जिसमें सवालों के लिए कोई जगह नहीं होगी? समाजशास्त्र का काम महिमामंडन नहीं, विश्लेषण करना है। सत्ता से सवाल पूछना है, उसकी आरती उतारना नहीं। अगर पाठ्यक्रम में मोदी हैं, तो पूरा मोदी होना चाहिए—प्रशंसा भी, आलोचना भी; उपलब्धियां भी, विवाद भी।
वरना यह शिक्षा नहीं, प्रचार होगा। समाजशास्त्र का उद्देश्य सत्ता, समाज और संरचनाओं का आलोचनात्मक विश्लेषण करना होता है। लेकिन जब किसी जीवित प्रधानमंत्री को “तत्व” बनाकर पढ़ाया जाने लगे, तो यह शिक्षा कम और व्यक्तित्व पूजा अधिक लगती है। मैक्स वेबर के करिश्माई नेतृत्व के सिद्धांत की आड़ में नरेंद्र मोदी को अकादमिक वैधता देने की कोशिश वस्तुतः विश्वविद्यालयों को राजनीतिक प्रयोगशाला में बदलने जैसा है।
और यह पहली बार नहीं है। इतिहास गवाह है कि भाजपा और आरएसएस ने शिक्षा को हमेशा अपने वैचारिक एजेंडे का सबसे प्रभावी हथियार माना है। कभी मुगल इतिहास को हाशिये पर धकेला जाता है, कभी गांधी की हत्या के पीछे की वैचारिक सच्चाइयों को धुंधला किया जाता है, तो कभी वैज्ञानिक तथ्यों की जगह पौराणिक दावों को स्थापित करने की कोशिश होती है। अब समाजशास्त्र में भी यही प्रयोग शुरू हो गया है।
आरएसएस को “सामाजिक संवाद” और “जमीनी संगठन” के मॉडल के रूप में प्रस्तुत करना भी बेहद चिंताजनक है। वही आरएसएस, जिसकी विचारधारा ने दशकों से देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा दी है, उसे एक आदर्श सामाजिक संस्था के रूप में पढ़ाना शिक्षा के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर सीधा हमला है। यह छात्रों को आलोचनात्मक सोच नहीं, बल्कि वैचारिक अनुरूपता सिखाने की कोशिश है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालय अब विचारों के स्वतंत्र बाजार रहेंगे, या सत्ताधारी दल के प्रचार विभाग में बदल जाएंगे? क्या कल को “योगी तत्व”, “शाह सिद्धांत” या “गोडसे दर्शन” भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बना दिए जाएंगे? जब शिक्षा सत्ता की प्रशस्ति गाने लगे, तब लोकतंत्र का भविष्य खतरे में पड़ जाता है।
भारत का संविधान वैज्ञानिक सोच, बहुलता और धर्मनिरपेक्षता की बात करता है। लेकिन भाजपा की राजनीति शिक्षा को एकरंगी बनाने पर तुली हुई है। यह केवल पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के मानस को नियंत्रित करने की कवायद है। देश को समाजशास्त्र चाहिए, सत्ता-शास्त्र नहीं। विश्वविद्यालयों को विचारों का अखाड़ा बनाइए, व्यक्तिपूजा का मंदिर नहीं। वरना आने वाली पीढ़ियां सवाल पूछना भूल जाएंगी और सिर्फ जयकार करना सीखेंगी।
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