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Home»महाराष्ट्र

चुनाव से ठीक पहले ‘लाड़की बहिन’ की किस्तें और एआई का शोर

adminBy adminJanuary 12, 2026 महाराष्ट्र No Comments3 Mins Read
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image credit : ndtv
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महाराष्ट्र में नगर निकाय चुनावों से ठीक पहले सरकार द्वारा मुख्यमंत्री–माझी लाड़की बहिन योजना की दो किश्तें
एक साथ जारी करने का फैसला सिर्फ़ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कसौटी पर खड़ा
एक गंभीर राजनीतिक प्रश्न है।
14 जनवरी को — मतदान से महज़ 24 घंटे पहले — एक करोड़ से अधिक महिला लाभार्थियों के खातों में 3,000 रुपये
ट्रांसफर करने की घोषणा ने इस सवाल को और तीखा बना दिया है कि क्या यह कल्याण है या वोटों में तब्दील की जा
रही सरकारी तिजोरी?


कल्याण की आड़ में चुनावी टाइमिंग का खेल

कांग्रेस ने इसे ‘सामूहिक सरकारी रिश्वत’ कहा है — और यह आरोप
हल्का नहीं है। आदर्श आचार संहिता का मूल भाव यही है कि चुनाव के समय सत्ता का दुरुपयोग न हो, ताकि मतदाता
स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय ले सके। यदि योजना इतनी ही “सतत” और “नियमित” थी, तो किश्तें चुनाव से ठीक
पहले ही क्यों? क्यों दिसंबर और जनवरी की राशि एक साथ, और वह भी मतदान की पूर्व संध्या पर?
राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले का यह तर्क कि “पूरे राज्य की महिलाओं को चुनाव के कारण लाभ से वंचित नहीं
किया जा सकता”, अपने आप में अधूरा है। असल सवाल यह नहीं कि योजना दी जाए या नहीं —सवाल यह है कि
चुनावी समय-सारणी के साथ उसका तालमेल क्यों बैठाया गया? लोकतंत्र में नीयत भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है
जितना नियम।


महिलाओं के नाम पर राजनीति, लेकिन जवाबदेही ग़ायब:- लाड़की बहिन योजना को महिला सशक्तिकरण का
प्रतीक बताया जा रहा है, लेकिन यह भी सच है कि महिलाओं को राजनीतिक ‘लाभार्थी समूह’ में तब्दील करना सत्ता
की पुरानी रणनीति रही है। योजना पर सवाल उठाने को “महिलाओं के ख़िलाफ़” बताना, असल मुद्दे से ध्यान हटाने
का तरीका है। कांग्रेस की मांग सीधी है —मतदान तक भुगतान रोका जाए। यह कोई योजना खत्म करने की मांग
नहीं, बल्कि चुनावी निष्पक्षता बनाए रखने की अपील है।


एआई, अप्रवासी और डर की राजनीति

इसी चुनावी माहौल में भाजपा–महायुति का घोषणापत्र सामने आता है,
जिसमें एक बार फिर ‘अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या’ को चुनावी मुद्दा बना दिया गया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस
का यह कहना कि आईआईटी की मदद से एआई टूल बनाकर बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान की जाएगी, तकनीक
से ज़्यादा राजनीतिक संदेश देता है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है: कितने बांग्लादेशी? कितने रोहिंग्या? कितनों को कब, कहां से निकाला गया? और
क्या इस प्रक्रिया में निर्दोष नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे? अब तक कोई सार्वजनिक आंकड़ा नहीं, कोई
श्वेतपत्र नहीं — सिर्फ़ बयान।


डर बनाम डेटा

कांग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत का हमला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह भावनात्मक नारे नहीं,
तथ्य मांग रहे हैं। जब सरकार दावा करती है कि उसने बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों को चिन्हित किया है, तो डेटा
सार्वजनिक करना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है — न कि रहस्य। ‘एआई टूल’ का नाम लेकर भय पैदा करना आसान है,
लेकिन एआई भी सवाल नहीं सुलझा सकता, अगर नीयत राजनीतिक ध्रुवीकरण की हो।


चुनावी लोकतंत्र की असली परीक्षा

महाराष्ट्र का यह निकाय चुनाव सिर्फ़ स्थानीय निकायों का चुनाव नहीं है। यह
परीक्षा है: क्या कल्याण योजनाएं वोट हथियार बनेंगी?

क्या तकनीक समाधान बनेगी या डर का औज़ार? और क्या चुनाव आयोग लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रख पाएगा?
लाड़की बहिन की किश्तें और एआई का शोर —दोनों मिलकर यह दिखाते हैं कि आज की राजनीति में कल्याण और
भय, दोनों का इस्तेमाल सत्ता साधने के लिए किया जा रहा है।लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं —खामोशी
ज़्यादा ख़तरनाक होती है।

Also Read: लातूर महानगरपालिका चुनाव: सीधी लड़ाई, बिखरा जनादेश और ‘किंगमेकर’ की तलाश

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