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Home»लातुर

लातूर महानगरपालिका चुनाव: सीधी लड़ाई, बिखरा जनादेश और ‘किंगमेकर’ की तलाश

adminBy adminJanuary 12, 2026 लातुर No Comments3 Mins Read
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image credit:india tv
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लातूर महानगरपालिका के मौजूदा चुनाव सिर्फ़ नगर निकाय की सत्ता का सवाल नहीं हैं, बल्कि यह चुनाव महाराष्ट्र
की बदलती राजनीति, गठबंधनों की मजबूरी और क्षेत्रीय दलों की वास्तविक ताक़त का भी आईना बन चुके हैं। 18
वार्डों की कुल 70 सीटों पर हो रहा यह मुकाबला संख्याओं के खेल से कहीं ज़्यादा, सियासी संतुलन की परीक्षा है।
संख्या-गणित: ताक़त और फैलाव:- भारतीय जनता पार्टी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ सभी 70 सीटों पर उम्मीदवार
उतारकर यह साफ़ संकेत दिया है कि वह लातूर में किसी समझौते की राजनीति के मूड में नहीं है। उसके बरक्स
कांग्रेस ने वंचित बहुजन आघाड़ी के साथ तालमेल कर 65+5 का फ़ॉर्मूला अपनाया है—यानी लड़ाई में उतरते हुए भी
बैकअप तैयार रखा गया है।


अजित पवार की एनसीपी ने 60 सीटों पर उम्मीदवार देकर अपनी सांगठनिक मौजूदगी जताई है, जबकि शरद पवार
की एनसीपी केवल 17 उम्मीदवारों तक सिमटकर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या यह पार्टी नगर स्तर पर अपनी
पुरानी पकड़ बचा पाएगी। शिंदे गुट की शिवसेना (11), उद्धव ठाकरे की शिवसेना (9) और AIMIM (9) सीमित संख्या
में सही, लेकिन निर्णायक भूमिका की क्षमता के साथ मैदान में हैं।
कुल मिलाकर 246 पार्टी-समर्थित उम्मीदवार और 300 से ज़्यादा अपक्ष—यह आंकड़ा बताता है कि लातूर में
सियासत केवल पार्टी चिन्हों तक सीमित नहीं, बल्कि स्थानीय समीकरणों, जातिगत-सामाजिक प्रभाव और
व्यक्तिगत पकड़ पर भी टिकी है।


त्रिकोणीय से चौरंगी लड़ाई:

वोटों का बंटवारा:- कई वार्डों में त्रिकोणीय तो कुछ में चौरंगी मुकाबला दिखाई दे रहा है।
इसका सीधा अर्थ है—वोटों का विभाजन। ऐसे में जीत का अंतर बेहद कम रह सकता है और सीटें प्रतिशत से नहीं,
बल्कि रणनीति से तय होंगी। हालांकि ज़मीनी सच्चाई यह है कि मुख्य टक्कर कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही केंद्रित
है। बाकी दल या तो नुकसान-फ़ायदे का संतुलन बिगाड़ेंगे या सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखने की कोशिश करेंगे।


पूर्ण बहुमत नहीं तो क्या?

अगर कांग्रेस या बीजेपी में से किसी को भी पूर्ण बहुमत नहीं मिलता—और मौजूदा
समीकरण यही संकेत दे रहे हैं—तो असली खेल नतीजों के बाद शुरू होगा। यहीं से ‘किंगमेकर’ की भूमिका सामने
आएगी। अजित पवार की एनसीपी: 60 सीटों पर लड़ा जाना इसे सबसे बड़ा संभावित किंगमेकर बनाता है। सत्ता के
साथ जाने का इतिहास और व्यावहारिक राजनीति इसे निर्णायक बना सकती है।
शिंदे गुट की शिवसेना: बीजेपी के लिए स्वाभाविक सहयोगी है लेकिन सीमित संख्या के बावजूद सत्ता संतुलन में
अहम।

उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT): वैचारिक रूप से कांग्रेस के क़रीब, पर संख्या कम, फिर भी गठबंधन में नैतिक
वजन रखती है।
AIMIM: शहरी और अल्पसंख्यक वोटों में प्रभाव, खास वार्डों में निर्णायक।
अपक्ष उम्मीदवार: सबसे अनिश्चित लेकिन सबसे अहम फैक्टर। यही वह समूह है जो नतीजों के बाद सत्ता का रुख
तय कर सकता है।
चुनाव नहीं, शक्ति-संतुलन का इम्तिहान:- लातूर महानगरपालिका चुनाव किसी एक पार्टी की जीत-हार तक सीमित
नहीं हैं। यह चुनाव बताएगा कि क्या बहुमत की राजनीति अभी भी संभव है या महाराष्ट्र अब स्थायी रूप से खंडित
जनादेश के दौर में प्रवेश कर चुका है। अगर सत्ता किसी गठबंधन के सहारे बनती है, तो यह साफ़ होगा कि असली
ताक़त सीटों से ज़्यादा, सौदेबाज़ी और रणनीति में है। नतीजे जो भी हों, एक बात तय है—लातूर का यह चुनाव आने
वाले समय में नगर राजनीति की दिशा ही नहीं, बल्कि राज्य की सियासत के मिज़ाज को भी परिभाषित करेगा।

Also Read: भगवा पहनकर सत्ता स्वीकार्य है, तो हिजाब पहनकर अस्वीकार्य क्यों?

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