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Home»लेख विचार

बढ़ती नफरत के बीच उम्मीद की किरणें

adminBy adminMarch 19, 2026 लेख विचार No Comments7 Mins Read
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-राम पुनियानी

फिरकापरस्ती से उपजी नफरत लोगों को बांटने का सबसे मुकम्मल हथियार है. मोटे तौर पर हम यह कह सकते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा कितनी भयावह होगी और कितनी लम्बी चलेगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि समाज में नफरत कितनी गहरी और व्यापक है. हिंसा के नतीजे में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है और विभिन्न समुदाय अपने-अपने दायरों में सिमट जाते हैं. पिछले कुछ दशकों में हम इस प्रवृत्ति को तेजी से बढ़ता देख रहे हैं. एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

इन हालातों में धार्मिक अल्पसंख्यक भयग्रस्त हो जाते हैं और खुद को असहाय और हाशिए पर पड़ा हुआ महसूस करने लगते हैं. भारत में मुसलमानों के खिलाफ नफरत का माहौल गाय, लव जिहाद, मुस्लिम राजाओं के दानवीकरण और कुछ अन्य तरीकों से बनाया गया है.

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेकुलरिज्म (सीएसएसएस), मुंबई के एक हालिया अध्ययन, जो इरफान इंजीनियर, नेहा दाभाड़े और दीया पाडलकर द्वारा किया गया था, में नफरती भाषणों का विवरण दिया गया है और उनके विभिन्न प्रकारों और आयामों पर प्रकाश डाला गया है. इस अध्ययन के अनुसार 2024 की तुलना में 2025 में ऐसे भाषणों की संख्या में गिरावट आई. लेकिन रपट में यह स्पष्ट किया गया है कि जहाँ सीएसएसएस द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़ों के अनुसार ऐसे भाषणों की संख्या घटी है किंतु आंकड़ों के अन्य स्त्रोत भी हो सकते हैं जिन तक पहुंचना आसान न हो.

इस रिपोर्ट से साफ जाहिर है कि नफरती भाषणों की शुरूआत शीर्ष स्तर से होती है. रिपोर्ट कहती है कि “सन 2025 में सबसे अधिक (10) नफरती भाषण महाराष्ट्र सरकार के मछलीपालन एवं बंदरगाह विकास मंत्री नीतेश राणे ने किये. इसके बाद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (6) और असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह (5-5) का नंबर है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीन नफरती भाषण दिए‘‘.

शीर्ष स्तर से इन भाषणों की शुरूआत और फिर निचले स्तरों पर और अधिक आक्रामक स्वरुप में इनकी पुनरावृत्ति की इस पृष्ठभूमि के बावजूद हाल में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनसे यह संकेत मिलता है कि हवा में फैले नफरत के जहर और धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति अपशब्दों के प्रयोग के आम हो जाने के बावजूद समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं जो सभी के प्रति मोहब्बत और बंधुत्व का भाव रखते हैं.

जहां एक ओर अल्पसंख्यकों के दानवीकरण की कोशिशों में इजाफा हुआ है वहीं दूसरी ओर बहुत से लोग प्यार और भाईचारे के मूल्यों पर कायम हैं और अब भी यह मानते हैं कि हमारे बहुधर्मी समाज में मूलभूत एकता है. उनके लिए गंगा जमुनी तहजीब और सभी धार्मिक समुदायों का सम्मान आज भी महत्वपूर्ण है. उत्तराखंड के कोटद्वार की जिस घटना की चर्चा हमने पिछले एक लेख में की थी, उसके बारे में अब हमें जो नई बातें पता लगी हैं, उनसे हम इस घटना को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं. दीपक कुमार इस कहानी के नायक हैं. वे एक जिम का संचालन करते हैं.

जब उन्होंने देखा कि बजरंग दल के कार्यकर्ता वकील अहमद को डरा-धमका रहे हैं तो वे हस्तक्षेप करने के लिए आगे बढ़े. सत्तर वर्षीय वकील अहमद ‘बाबा स्कूल ड्रेस‘ नाम की एक दुकान पिछले 30 सालों से चला रहे हैं. गुंडों ने उनसे कहा कि उन्हें उनकी दुकान के नाम में बाबा शब्द का इस्तेमाल करने की हिम्मत कैसे हुई. इस शब्द का इस्तेमाल करने का अधिकार सिर्फ हिन्दुओं को है. इनकी जहालत पर सिर्फ तरस खाया जा सकता है क्योंकि वे यह नहीं जानते कि बाबा एक फारसी शब्द है जिसका उपयोग हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के संतों के लिए किया जाता है.

दीपक कुमार ने उन्हें करारा जवाब देते हुए कहा कि यह दुकान के मालिक का अधिकार है कि वह अपनी दुकान का क्या नाम रखे. जब बजरंगियों ने दीपक से उनका नाम पूछा तो उन्होंने भारत की साँझा परंपराओं के मुताबिक कहा मोहम्मद दीपक. जब इस घटना का प्रचार-प्रसार हुआ तो राहुल गांधी ने उन्हें आमंत्रित किया और बधाई दी. दीपक कुमार एक यात्रा आयोजित करने की योजना बना रहे हैं जिसका नाम ‘इंसानियत यात्रा‘ होगा और जो अमन का संदेश देगी.

एक दूसरी आशा जगाने वाली बड़ी घटना लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई. विश्वविद्यालय के परिसर में लाल बारादरी मस्जिद है जिसमें परिसर में रहने वाले मुसलमान नमाज पढ़ते हैं. चूंकि यह मस्जिद बहुत पुरानी है और जर्जर स्थिति में है इसलिए इसके दरवाजे पर ताला लगा दिया गया है और नमाज मस्जिद के बाहर पढ़ी जाती है.

जब रमजान के इस महीने में कुछ मुस्लिम छात्र नमाज पढ़ने मस्जिद के पास पहुंचे तो उन्हें दक्षिणपंथी छात्रों द्वारा  नमाज पढ़ने से रोका गया. इसके बाद जो हुआ वह महत्वपूर्ण है. एनएसयूआई और एआईएसए से जुड़े कुछ अन्य छात्रों ने नमाजियों की मदद की. उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थाम कर घेरा बनाया और नमाज़ियों से कहा कि वे घेरे के अन्दर नमाज़ अदा करें.  

एक अन्य घटना तेलंगाना के यदादरी भुवनगिरी जिले के बोमालारामाराम मंडल के जलापुर गांव में 15 फरवरी को हुई. वहां कुछ अज्ञात लोग जामा मस्जिद में घुसे और उसके एक हिस्से को नुकसान पहुंचाया. अगली सुबह जब लोग नमाज पढने वहां पहुंचे तो उन्हें इसका पता लगा. मस्जिद कमेटी के सदस्यों ने निरीक्षण करने पर पाया कि मस्जिद के कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचाया गया है और शौचालय के दरवाजों और माइक्रोफोन सिस्टम में तोड़फोड़ की गई है. वहां बीयर की बोतलें भी पाई गईं. पवित्र कुरान की कई प्रतियां भी परिसर में बिखरी पड़ीं थीं.

जब कुछ हिन्दू व्यापारियों को इस तोड़फोड़ की जानकारी मिली तो वे वहां पहुंचे और उन्होंने अपने खर्चे पर मस्जिद की मरम्मत करवाने का फैसला किया! एक तकलीफदेह घटना राजस्थान के टोंक जिले के करेडा गांव में घटीः भाजपा के पूर्व सांसद सुखबीर सिंह जौनपुरिया वहां कंबल वितरित कर  रहे थे.

इस दौरान उन्होंने एक बुजुर्ग महिला से उसका नाम पूछा. वह महिला मुस्लिम थी. यह पता लगने पर उन्होंने उससे कंबल यह कहते हुए वापिस ले लिया कि हम मोदी को गाली देने वालों को कबंल नहीं देते. तीन अन्य मुस्लिम महिलाओं ने भी कंबल वापिस कर दिए. इस अपमानजनक हरकत से अन्य लोग भी आक्रोशित हुए. बाद में अन्य राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने न केवल पूर्व सांसद की निंदा की बल्कि उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के बीच कंबलों का वितरण भी  किया.

रिद्धीमा शर्मा नामक एक हिंदू महिला, जो अपने आपको हिन्दू शेरनी कहती है, राजस्थान के गोगावीर मंदिर (जिसे गोगामेढ़ी भी कहते हैं) पहुंची. वहां उसने एक पुजारी को देखा जिसका नाम हुसैन था. महिला ने जोर से चिल्लाते हुए पुजारी से कहा कि उसकी जिहाद करने के लिए मंदिर में आने की हिम्मत कैसे हुई. अन्य श्रद्धालुओं ने महिला की हरकत पर आपत्ति करते हुए बताया कि इस मंदिर में मुस्लिम पुजारी रखे जाने की परंपरा है!

नफरत के माहौल के बीच प्यार और बंधुत्व भरी ये घटनाएं तसल्ली पहुँचाने वाली हैं. ये घटनाएं क्या दिखाती हैं? ये बताते हैं कि भले ही नफरत फैलाने वालों का बोलबाला है और उनका कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि उन्हें राज्य का संरक्षण हासिल है मगर प्यार और एकता का भारतीय संस्कार अभी भी बहुत हद तक कायम है, चाहे वह साफ नजर न भी आये.

मौजूदा माहौल में नफरत फैलाने वालों को राज्य का संरक्षण इस हद तक हासिल है कि केन्द्र सरकार ने हाल में सनातन राष्ट्र शंखनाद की भारत मंडपम में आयोजित बैठक के लिए 63 लाख रूपये की वित्तीय सहायता दी. इस कार्यक्रम में मुसलमानों के खिलाफ भाषण दिए गए और कार्यक्रम की मुख्य विषयवस्तु थी हिन्दू राष्ट्र की मांग! लेकिन यह भी साफ़ है कि भारतीय संस्कारों में विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूती से खड़े रहने की कितनी जबरदस्त क्षमता है. इन नफरती अभियानों के बावजूद भारतीय संस्कार अपना वजूद कायम रखे हुए हैं!  (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)

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