देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर किसी भी समुदाय को निशाना बनाना संविधान की भावना के खिलाफ है और जब ऐसा करने वाला कोई ऊँचे संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति हो, तो यह उल्लंघन और गंभीर हो जाता है। यह टिप्पणी जस्टिस उज्जल भुयान ने ओटीटी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ से जुड़ी याचिका के संदर्भ में की, लेकिन इसका दायरा कहीं व्यापक है। दो जजों की पीठ- जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस भुयान ने भले ही निर्माताओं द्वारा शीर्षक बदलने की सहमति के बाद मामला बंद कर दिया हो, पर जस्टिस भुयान ने जो संवैधानिक सिद्धांत दोहराए, वे मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक माहौल में गूंजते सवाल छोड़ते हैं।
‘भाईचारा’ बनाम ‘उकसावे की राजनीति’संविधान की प्रस्तावना में ‘भाईचारा’ (Fraternity) केवल एक शब्द नहीं, बल्कि भारतीय गणराज्य की आत्मा है। अनुच्छेद 51A(ई) हर नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य तय करता है कि वह धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं से ऊपर उठकर सद्भाव को बढ़ावा दे। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
अदालत ने साफ़ कहा कि भाषण, मीम, कार्टून या विजुअल आर्ट किसी भी माध्यम से किसी समुदाय को अपमानित करना असंवैधानिक है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह सिद्धांत केवल न्यायिक टिप्पणियों तक सीमित रहेगा? या सार्वजनिक जीवन में बैठे लोग इसे आचरण का हिस्सा भी बनाएंगे? आज राजनीतिक भाषणों में ‘हम’ और ‘वे’ की रेखाएँ अधिक तीखी हो चुकी हैं। चुनावी मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक, पहचान की राजनीति का स्वर ऊँचा है। ऐसे में अदालत की यह टिप्पणी एक नैतिक और संवैधानिक चेतावनी की तरह है। सत्ता में बैठे लोग संविधान की रक्षा की शपथ लेते हैं, न कि किसी विशेष पहचान की श्रेष्ठता साबित करने की।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: सीमाएँ और संतुलन
अदालत ने अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी दृढ़ता से पुष्टि की। यह कहा गया कि कुछ समूहों की आपत्ति या संभावित अव्यवस्था के डर से कला और अभिव्यक्ति को बंधक नहीं बनाया जा सकता। फिल्मों का मूल्यांकन ‘सामान्य और विवेकशील दर्शक’ के दृष्टिकोण से होना चाहिए, न कि अतिसंवेदनशील नजरिए से। यह संतुलन महत्वपूर्ण है कि एक ओर समुदाय की गरिमा, दूसरी ओर रचनात्मक स्वतंत्रता। अदालत ने यह भी कहा कि 75 साल पुराने गणराज्य को किसी कविता या कॉमेडी शो से खतरा महसूस नहीं होना चाहिए। यह परिपक्व लोकतंत्र का संकेत है। लेकिन सवाल वही: पहले क्या हुआ? यहीं से असली विश्लेषण शुरू होता है।
यह पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च अदालत ने नफरत भरे भाषण (हेट स्पीच) या मॉब लिंचिंग पर कड़े शब्दों में टिप्पणी की हो। 2018 में मॉब लिंचिंग के मामलों पर विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए गए थे, नोडल अधिकारियों की नियुक्ति, त्वरित एफआईआर, समयबद्ध जांच, और पीड़ितों के लिए मुआवज़े जैसी व्यवस्थाएँ सुझाई गई थीं। अदालत ने इसे “भीड़तंत्र” के खिलाफ संविधान की रक्षा का सवाल बताया था।
लेकिन क्या उन निर्देशों का ज़मीनी स्तर पर प्रभावी पालन हुआ? बीते वर्षों में मॉब लिंचिंग और सांप्रदायिक उकसावे की घटनाएँ पूरी तरह थमीं, ऐसा दावा करना मुश्किल है। हेट स्पीच को लेकर भी अदालतें समय-समय पर सख्त टिप्पणियाँ करती रही हैं, पर मुकदमे लंबित रहते हैं, कार्रवाई अक्सर धीमी होती है, और राजनीतिक जवाबदेही लगभग नदारद दिखती है। अब जब अदालत फिर कह रही है कि ऊँचे संवैधानिक पदों पर बैठे लोग धर्म या जाति के आधार पर समुदायों को निशाना न बनाएं, तो स्वाभाविक सवाल उठता है कि क्या इस बार कुछ बदलेगा?
न्यायिक चेतावनी बनाम राजनीतिक इच्छाशक्ति
न्यायपालिका दिशा दिखा सकती है, सिद्धांत स्पष्ट कर सकती है, पर क्रियान्वयन कार्यपालिका और प्रशासन के हाथ में है। जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति स्पष्ट न हो, तब तक अदालत की टिप्पणियाँ नैतिक दस्तावेज बनकर रह जाने का खतरा रहता है। हाल ही में असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ कथित हेट स्पीच पर एफआईआर की मांग वाली याचिकाओं पर सीधे हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अदालत ने उच्च न्यायालय का रुख करने को कहा। यह न्यायिक मर्यादा का पालन था, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट होता है कि संवैधानिक सिद्धांतों को लागू कराने की राह लंबी और जटिल है।
सुप्रीम कोर्ट का यह संदेश दो स्तरों पर महत्वपूर्ण है
सार्वजनिक पदाधिकारियों के लिए। सत्ता का उपयोग विभाजनकारी भाषण के लिए नहीं, बल्कि समावेशी संवाद के लिए होना चाहिए। नागरिकों के लिए – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ जुड़ी है; यह किसी समुदाय की सामूहिक गरिमा को ठेस पहुँचाने का लाइसेंस नहीं। लेकिन यदि अतीत की तरह इन सिद्धांतों पर अमल ढीला रहा, तो संवैधानिक आदर्श और सामाजिक यथार्थ के बीच की दूरी और बढ़ेगी।
अंततः सवाल अदालत से ज़्यादा समाज और राजनीति से है- क्या हम ‘भाईचारे’ को प्रस्तावना की पंक्तियों में सीमित रखेंगे, या उसे सार्वजनिक जीवन का आचरण बनाएंगे? अगर पिछले सख्त आदेशों के बाद भी ज़मीनी बदलाव सीमित रहा है, तो अब असली परीक्षा यह है कि क्या इस बार संवैधानिक चेतावनी को केवल उद्धृत किया जाएगा, या सचमुच लागू भी किया जाएगा।