पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने एक ऐसा सवाल उठाया है जिसने भारत की विदेश नीति पर नई बहस छेड़ दी है—क्या भारत किसी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या का समर्थन करता है? और अगर नहीं, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी क्यों? यह सवाल ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामनेई की कथित हत्या के बाद सामने आया, जब अमेरिका–इज़राइल और ईरान के बीच तनाव खतरनाक स्तर तक पहुँच चुका है।
कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी भारत की चुप्पी पर सवाल उठाया। लेकिन असली बहस यह है कि क्या यह ‘चुप्पी’ कूटनीतिक संतुलन है या राजनीतिक सुविधा? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
भारत की पारंपरिक नीति बनाम मौजूदा रणनीति
भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित रही है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर संयुक्त राष्ट्र में शांति और संप्रभुता की वकालत तक, भारत ने हमेशा किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन का विरोध किया है। लेकिन हाल के वर्षों में भारत–इज़राइल संबंध अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। रक्षा सौदे, तकनीकी सहयोग और खुफिया साझेदारी ने दोनों देशों को रणनीतिक साझेदार बना दिया है। प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा और नेतन्याहू के साथ सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित मित्रता ने इस रिश्ते को प्रतीकात्मक रूप से भी मजबूत किया।
सवाल यह है कि क्या इस घनिष्ठता की कीमत भारत अपनी पारंपरिक संतुलित विदेश नीति से चुका रहा है?
चुप्पी के संभावित नुकसान
1. ईरान से रिश्तों पर असर: भारत और ईरान के संबंध केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं। चाबहार बंदरगाह परियोजना, मध्य एशिया तक पहुंच और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में ईरान की भूमिका महत्वपूर्ण है। यदि भारत एकतरफा झुकाव दिखाता है, तो यह रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकता है।
2. खाड़ी देशों में भारतीयों की सुरक्षा: पश्चिम एशिया में लगभग एक करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। क्षेत्रीय अस्थिरता सीधे तौर पर उनकी सुरक्षा और भारतीय अर्थव्यवस्था (रेमिटेंस) पर असर डाल सकती है।
3. वैश्विक छवि पर प्रश्न: जब कोई देश सार्वजनिक रूप से संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून की बात करता है, लेकिन किसी विवादित हत्या पर स्पष्ट रुख नहीं लेता, तो उसकी नैतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। विपक्ष का तर्क है कि यही भारत की “वैश्विक नैतिक आवाज़” को कमजोर करता है।
क्या इज़राइल से दोस्ती जोखिमपूर्ण है?
भारत–इज़राइल संबंध केवल भावनात्मक या वैचारिक नहीं, बल्कि सामरिक भी हैं। इज़राइल भारत का एक बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता है। आतंकवाद-रोधी सहयोग और कृषि-तकनीक में भी साझेदारी मजबूत है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि यह रिश्ता इतना गहरा हो जाए कि भारत सार्वजनिक रूप से निष्पक्ष न दिखे, तो इससे: अरब देशों में राजनीतिक दूरी बढ़ सकती है। ईरान के साथ ऊर्जा और व्यापार संबंध प्रभावित हो सकते हैं। भारत की “संतुलित शक्ति” की छवि को धक्का लग सकता है। विशेषज्ञों का मत है कि कूटनीति में दोस्ती जरूरी है, पर “एकतरफा नज़दीकी” जोखिम पैदा करती है।
सरकार का पक्ष संतुलन या रणनीति?
प्रधानमंत्री मोदी ने हाल में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस से बातचीत कर मिसाइल हमलों की निंदा की और इज़राइल के साथ भी संवाद बनाए रखा। आधिकारिक बयानों में “संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और नागरिकों की सुरक्षा” पर जोर दिया गया है। सरकार समर्थकों का तर्क है कि सार्वजनिक बयानबाजी से अधिक महत्वपूर्ण है बैक-चैनल कूटनीति और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा। उनका कहना है कि खुलकर किसी पक्ष का नाम लेने से भारत की मध्यस्थ भूमिका कमजोर हो सकती है।
नैतिकता बनाम रणनीति?
यह बहस अंततः दो दृष्टिकोणों के बीच है: क्या भारत को नैतिक रूप से स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से मुखर होना चाहिए? या फिर रणनीतिक चुप्पी ही व्यावहारिक कूटनीति है? राहुल गांधी का सवाल राजनीतिक हो सकता है, लेकिन यह एक गहरे सिद्धांत की ओर इशारा करता है—क्या किसी राष्ट्राध्यक्ष की लक्षित हत्या को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा माना जा सकता है? यदि भारत इस पर स्पष्ट रुख नहीं लेता, तो भविष्य में ऐसे मामलों पर उसका नैतिक तर्क कमजोर पड़ सकता है।
संतुलन की कसौटी पर भारत
भारत आज वैश्विक मंच पर उभरती शक्ति है। ऐसे में हर बयान और हर चुप्पी का अर्थ निकाला जाता है। इज़राइल से दोस्ती भारत के लिए रणनीतिक रूप से लाभकारी हो सकती है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि इससे भारत की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति प्रभावित न हो। पश्चिम एशिया बारूद के ढेर पर बैठा है। एक गलत संकेत पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक सकता है। भारत के लिए चुनौती यही है कि दोस्ती भी निभे, रणनीति भी बचे और नैतिक साख भी कायम रहे। क्योंकि अंततः, वैश्विक राजनीति में केवल ताकत ही नहीं, विश्वसनीयता भी मायने रखती है।