केरल उच्च न्यायालय द्वारा ‘द केरला स्टोरी 2 – गोज़ बियॉन्ड’ की रिलीज़ पर पंद्रह दिनों की अंतरिम रोक सिर्फ़ एक फिल्म पर लगी कानूनी अड़चन नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल की तरफ इशारा करती है जो आज भारतीय समाज के सामने खड़ा है। क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी राज्य, समुदाय या धर्म की छवि को धूमिल करने की खुली छूट दी जा सकती है?
न्यायमूर्ति बी. कुरियन थॉमस की मौखिक टिप्पणियों से स्पष्ट है कि अदालत प्रथम दृष्टया इस बात से संतुष्ट नहीं थी कि Central Board of Film Certification (सीबीएफसी) ने फिल्म को प्रमाणपत्र देते समय पर्याप्त सावधानी बरती। जब अदालत स्वयं यह सवाल उठाती है कि इतनी संवेदनशील विषय-वस्तु वाली फिल्म को ‘ए’ के बजाय ‘यूए’ प्रमाणपत्र कैसे दिया गया, तो यह केवल तकनीकी आपत्ति नहीं, बल्कि सामाजिक प्रभाव को लेकर गंभीर चिंता का संकेत है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
नफ़रत की बुनियाद पर बनी फिल्मों का भविष्य क्या?
देश में पिछले कुछ वर्षों में एक प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है कि किसी एक समुदाय या धर्म को केंद्र में रखकर सनसनीखेज़ कथानक गढ़ना, उन्हें “सच्ची घटनाओं से प्रेरित” बताना और फिर उसी के आधार पर व्यापक प्रचार करना। यह प्रवृत्ति न केवल समाज में अविश्वास पैदा करती है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को भी चोट पहुंचाती है।
साफ़ तौर पर कहा जाना चाहिए कि किसी भी जाति या धर्म के खिलाफ नफ़रत को बढ़ावा देने वाली फिल्मों पर प्रतिबंध लगना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश अधिकार नहीं है; भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(2) इस पर “उचित प्रतिबंध” की बात करता है। विशेषकर सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता के हित में।
अगर कहानी झूठी हो तो?
यह मामला और गंभीर तब हो जाता है जब आरोप यह हो कि फिल्म का कथानक तथ्यों पर आधारित नहीं, बल्कि अतिरंजित या भ्रामक है। यदि कोई निर्माता जानबूझकर झूठी कहानियाँ गढ़कर उन्हें “सच्चाई” के रूप में पेश करता है और उससे किसी राज्य या समुदाय की छवि को नुकसान पहुँचता है, तो यह केवल रचनात्मक स्वतंत्रता का प्रयोग नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास के साथ छल है। ऐसे मामलों में केवल अस्थायी रोक या औपचारिक आपत्ति पर्याप्त नहीं हो सकती।
झूठे आख्यान गढ़कर नफ़रत फैलाने वाले निर्माताओं पर सख़्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर भविष्य में ऐसी गतिविधियों पर स्थायी रोक भी लगनी चाहिए। यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते लगाम नहीं कसी गई, तो कल को कोई भी समूह अपने राजनीतिक या वैचारिक लाभ के लिए काल्पनिक कहानियाँ गढ़कर समाज को बाँटने का औज़ार बना लेगा।
शीर्षक और प्रतीकात्मक राजनीति
याचिकाओं में यह भी तर्क दिया गया है कि फिल्म के शीर्षक में ‘केरल’ शब्द का इस्तेमाल राज्य को सामूहिक रूप से कटघरे में खड़ा करता है। सवाल यह है कि यदि कथित सीक्वल की कहानी का प्रत्यक्ष संबंध केरल से नहीं है, तो फिर राज्य का नाम शीर्षक में क्यों? क्या यह सिर्फ़ बाज़ार और विवाद से लाभ कमाने की रणनीति है? जब दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में तथाकथित “पीड़िताओं” में एक भी महिला केरल से नहीं थी, तो यह संदेह और गहरा हो जाता है कि कहीं राज्य की पहचान का इस्तेमाल एक प्रतीकात्मक दुश्मन गढ़ने के लिए तो नहीं किया जा रहा।
सेंसर बोर्ड की भूमिका पर पुनर्विचार
सीबीएफसी का काम केवल औपचारिक प्रमाणपत्र देना नहीं, बल्कि सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन करना भी है। यदि अदालत को प्रथम दृष्टया यह लगे कि प्रमाणन प्रक्रिया में पर्याप्त विवेक का प्रयोग नहीं हुआ, तो यह संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है। क्या बोर्ड राजनीतिक दबाव, बाज़ार या किसी विचारधारा से प्रभावित हुए बिना निष्पक्ष निर्णय ले पा रहा है? यह प्रश्न अब टालने योग्य नहीं है।
खामोशी की कीमत
इतिहास गवाह है कि झूठ को बार-बार दोहराया जाए तो वह धीरे-धीरे “सच” जैसा प्रतीत होने लगता है। यदि समाज और संस्थाएँ इस तरह की प्रवृत्तियों पर चुप्पी साध लें, तो झूठी कहानियाँ गढ़कर नफ़रत फैलाने का सिलसिला कभी नहीं रुकेगा। यह केवल एक राज्य या एक समुदाय का सवाल नहीं—यह लोकतांत्रिक भारत की बहुलतावादी आत्मा का सवाल है। अदालत का यह अंतरिम आदेश अंतिम फैसला नहीं है, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण संदेश जरूर देता है। सिनेमा की शक्ति अपार है, और जितनी बड़ी शक्ति, उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी।
अब निगाहें अंतिम सुनवाई पर हैं, लेकिन उससे भी अधिक ज़रूरी है कि समाज इस बहस को केवल एक फिल्म तक सीमित न रखे, बल्कि यह तय करे कि हम किस तरह के सांस्कृतिक आख्यानों को प्रोत्साहित करना चाहते हैं। सच और संवेदनशीलता पर आधारित, या सनसनी और विभाजन पर टिके हुए।