क्या इतिहास फिर से अदालतों और सड़कों पर खड़ा किया जा रहा है? संभल की जामा मस्जिद को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का ताज़ा जवाब एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया है। आरटीआई के तहत पूछे गए सवालों पर एएसआई ने स्पष्ट किया है कि उसके पास ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है जिससे यह साबित हो कि मस्जिद किसी पूर्व संरचना को ध्वस्त कर बनाई गई थी। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
यह जवाब केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष दिया गया और आयोग ने भी कहा कि आरटीआई कानून के तहत किसी संस्था को केवल उपलब्ध रिकॉर्ड देने के लिए बाध्य किया जा सकता है, नई जानकारी जुटाने के लिए नहीं। लेकिन सवाल यह है कि जब आधिकारिक रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, तो फिर “मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने” का दावा किस आधार पर किया जा रहा है? और क्या यह केवल इतिहास की खोज है, या इतिहास के नाम पर एक राजनीतिक परियोजना?
दस्तावेज़ क्या कहते हैं?
एएसआई के अनुसार: मस्जिद का निर्माण 1526 में हुआ माना जाता है। 1920 की राजपत्र अधिसूचना के बाद इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। निर्माण के समय ज़मीन के मालिक या किसी पूर्व संरचना के विध्वंस का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद, एक याचिका के आधार पर यह दावा किया गया कि मस्जिद किसी प्राचीन मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी।
अदालत के आदेश पर सर्वेक्षण की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसके विरोध में 24 नवंबर 2024 को हिंसा हुई और चार लोगों की जान चली गई। यहाँ मूल प्रश्न यही है कि यदि आधिकारिक रिकॉर्ड में प्रमाण नहीं है, तो क्या केवल दावों और जनभावनाओं के आधार पर किसी ऐतिहासिक इमारत को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है?
क्या इतिहास की पुनर्रचना या राजनीतिक पुनरावृत्ति?
यह विवाद अनायास नहीं लगता। भारतीय इतिहास में एक उदाहरण ऐसा है जिसने देश की दिशा बदल दी—1990 के दशक में यह नैरेटिव गढ़ा गया कि बाबरी मस्जिद एक प्राचीन मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। उस समय भी इतिहास, आस्था और राजनीति का मिश्रण ऐसा हुआ कि सच्चाई और अफवाहों के बीच की रेखा धुंधली हो गई।
6 दिसंबर 1992 को मस्जिद को गिरा दिया गया। देशभर में दंगे भड़के, हजारों लोग मारे गए और भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को गहरा आघात लगा। आज जब संभल की जामा मस्जिद या अन्य ऐतिहासिक मस्जिदों के बारे में समान दावे सामने आते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या हम वही रास्ता दोहरा रहे हैं?
अफ़वाहों का विस्तार: एक खतरनाक ट्रेंड
पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में कई मस्जिदों के बारे में यह दावा किया गया कि वे किसी मंदिर के ऊपर बनी हैं। सोशल मीडिया, राजनीतिक मंचों और याचिकाओं के जरिए ऐसे दावों को हवा दी जाती है। समस्या यह नहीं कि इतिहास की जांच हो बल्कि समस्या यह है कि जब जांच से पहले ही निष्कर्ष सुना दिए जाते हैं, तब समाज में अविश्वास और तनाव फैलता है। इतिहासकारों का कहना है कि मध्यकालीन भारत में मंदिरों और मस्जिदों का निर्माण जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में हुआ। हर संरचना को आज की राजनीतिक दृष्टि से देखना न तो ऐतिहासिक रूप से सटीक है, न ही सामाजिक रूप से सुरक्षित।
कानून बनाम भावनाएँ:- केंद्रीय सूचना आयोग ने स्पष्ट किया कि एएसआई को केवल उपलब्ध रिकॉर्ड देना होता है। यदि रिकॉर्ड में किसी विध्वंस का उल्लेख नहीं है, तो उसे गढ़ा नहीं जा सकता। फिर भी, यदि अदालतों और सड़कों पर ऐसे दावे लगातार उठते रहे, तो यह केवल एक इमारत का सवाल नहीं रहेगा बल्कि यह देश के संवैधानिक ढांचे और सामाजिक ताने-बाने का प्रश्न बन जाएगा।
क्या सबक सीखा गया?
बाबरी मस्जिद का इतिहास हमें यह सिखाता है कि जब अफवाहें और राजनीतिक भावनाएँ हावी हो जाती हैं, तो परिणाम केवल एक ढांचा गिरने तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरा समाज हिल जाता है। संभल का मामला अभी दस्तावेज़ी स्तर पर है। एएसआई का स्पष्ट जवाब है कि उसके पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो पूर्व संरचना के विध्वंस को सिद्ध करे। ऐसे में यह जिम्मेदारी मीडिया, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज की है कि वे तथ्य और अफवाह के बीच अंतर करें।
इतिहास को हथियार नहीं, विरासत रहने दें
भारत की ताकत उसकी विविध विरासत में है। यदि हर ऐतिहासिक मस्जिद या मंदिर को संदेह की नजर से देखा जाएगा, तो समाज स्थायी अस्थिरता की ओर बढ़ सकता है। इतिहास की खोज वैज्ञानिक तरीके से होनी चाहिए, न कि भावनात्मक अभियानों के जरिए।
क्योंकि जब इतिहास को हथियार बनाया जाता है, तो वर्तमान घायल होता है और भविष्य असुरक्षित। संभल की जामा मस्जिद का विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अतीत को समझना चाहते हैं, या उसे अपने वर्तमान एजेंडे के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं?