- अगर अदालतों के पास भी नागरिकों की चींख सुनने का समय नहीं, तो मजलूम आखिर जाएं कहां?
- गुजरात में “कट्टरतावाद विरोधी पथक”की स्थापना…
- मतदाता सूची से नाम हटना नागरिकता खत्म होना नहीं- सुप्रीम कोर्ट
- बिना नेम प्लेट और नंबर वाले ये लोग कौन हैं? पुलिस की वर्दी में छिपे चेहरों का सच सामने आना चाहिए
- सवाल एक अनशन का नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का है
- ग़ैरों पे करम-अपनों पे सितम? पाकिस्तान को नसीहत देने से पहले भारत को भी आईना देखने की ज़रूरत
- जब जज का नाम इंसाफ़ से बड़ा बना दिया जाए, तो समझ लीजिए संविधान कठघरे में खड़ा है
- मतदाता सूची या लोकतंत्र की सूची? चुनाव आयोग पर उठते सवालों का जवाब अब जरूरी है
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भारत की सामाजिक संरचना हजारों वर्षों के ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। इस संरचना में जाति व्यवस्था और ब्राह्मणों की भूमिका सबसे अधिक निर्णायक रही है। लेकिन ब्राह्मण क्या प्रारंभ से ही भारत में थे? क्या वे यहीं के मूल निवासी थे? या वे बाहर से आए? और कैसे उन्होंने एक धार्मिक-राजनैतिक तंत्र खड़ा कर ऊँच-नीच, शुद्ध-अशुद्ध और भेदभाव की व्यवस्था बनाई? इन सवालों के उत्तर इतिहास, पुरातत्व, भाषाशास्त्र और समाजशास्त्र के अध्ययन से निकलकर सामने आते हैं। 1. भारत में ब्राह्मणों का आगमन ब्राह्मण, जिन्हें परंपरागत रूप से ‘वर्ण व्यवस्था’ के सबसे ऊपर माना गया है, ये कोई भारतीय…
जाकिर कुरैशी की हत्या महज़ “पशु चोरी” के शक पर नहीं हुई। “उसे मियां कहा गया।” यही इस हिंसा की असली वजह है। यह धर्म के नाम पर जान लेने की मानसिकता है। 50–60 हिन्दू गुंडों की भीड़ ने उसके हाथ बांधे, पीठ और पैरों की हड्डियाँ तोड़ दीं — यह हत्या है, दुर्घटना नहीं। न्याय कहाँ है?:- सिर्फ दो गिरफ्तारियाँ — और मुख्य आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं। यह “लॉ एंड ऑर्डर” का मसला नहीं है, यह राज्य की चुप्पी से पोषित नफरत है। पहलगाम हमले के बाद संगठित हिंसा:- 22 अप्रैल के बाद, 300+ नफरत के मामले दर्ज,…
उत्तर प्रदेश की ज़मीन सैकड़ों वर्षों से हिंदू-मुस्लिम साझी विरासत की मिसाल रही है। इन्हीं मिसालों में एक अहम नाम है सैयद सालार मसूद गाज़ी मियां का, जिनकी याद में हर साल बहराइच और अन्य स्थानों पर मेले लगते रहे हैं। इन मेलों में धर्म की दीवारें ढह जाती थीं—हिंदू और मुसलमान मिलकर झूले झूलते, मिन्नतें मांगते, मिठाई बांटते और सांस्कृतिक समरसता का उत्सव मनाते। लेकिन आज यही साझा संस्कृति हिंदुत्व की राजनीति के लिए खतरा बन गई है। गाजी मियां, यानी सैयद सालार मसूद, 11वीं शताब्दी में भारत आए एक तुर्क सेनापति माने जाते हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से उनके…
दोस्तों, सोचिए… शहर के बीचोंबीच, चौक में“ सड़क पर अगर आपको नंगा किया जाए…?” “अगर आपके गुप्तांगों पर मारा जाए और कहा जाए – तू पाकिस्तानी है? कश्मीर से आया है?”न सिर्फ मारा जाए, बल्कि आपकी इंसानियत, आपकी इज्ज़त, आपकी पहचान को नंगा कर दिया जाए…“और फिर इन सबका विडिओ बनाया जाए और कहा जाए – वीडियो वायरल करूंगा…”तो क्या आप ज़िंदा रह पाएंगे? लातूर शहर में एयरटेल कंपनी में काम करने वाले एक पढ़े -लिखे, इज्ज़तदार 30 वर्षीय आमिर पठान को सिर्फ एक छोटी सी बात पर – गाड़ी को साइड न देने के बहाने हिंदुत्ववादी गुंडों ने सड़क…
जब एक मंत्री देश की पहली महिला इन्फेंट्री अधिकारी को “आतंकवादियों की बहन” कहे, तो सवाल सिर्फ़ एक बयान का नहीं होता—सवाल देश के संविधान, उसकी सेना और उस महिला की गरिमा का होता है, जिसने इस देश के लिए वर्दी पहनने का साहस किया। मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह ने कर्नल सोफ़िया क़ुरैशी को निशाना बनाते हुए ऐसा ही बयान दिया। “प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उनकी समाज की बहन को भेजा है।” यह वाक्य—अपमान, नफरत और महिला-विरोधी मानसिकता से भरा हुआ है। कौन हैं कर्नल सोफ़िया क़ुरैशी?:- कर्नल सोफ़िया भारतीय सेना…
भारत के उपराष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और वरिष्ठ राजनयिक विक्रम मिस्री और उनके परिवार पर हुए ऑनलाइन ट्रोलिंग हमले कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि एक चलन बन चुकी रणनीति का हिस्सा हैं — जहां पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने वाले अफसरों को भी राष्ट्रद्रोही या कायर कहकर अपमानित किया जाता है, अगर उनका काम सत्ताधारी विचारधारा के “नैरेटिव” से मेल नहीं खाता। हाल ही में मिस्री पर हिंदुत्ववादी ट्रोल्स ने हमला किया — सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने एक ऐसी नीति का पालन किया, जो भारत सरकार ने तय की थी। मिस्री ने खुद से कोई रुख नहीं लिया था। वे एक…
ये पत्रकार नहीं गद्दारी हैं काँग्रेस की सत्ता में जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने देश पे हमला किया था तो “मोदी जी कहते थे: ’56 इंच का सीना चाहिए पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए!’ ‘कांग्रेस सरकार कमज़ोर है, सिर्फ़ बयानबाज़ी करती है!’ रैलियों में कहते थे — ‘अगर मैं पीएम होता, तो 10 सिर के बदले 100 सिर काटकर लाता!’ लेकिन अब क्या हुआ? जब पुलवामा हुआ — पहले चुनावी रैली में भाषण, फिर बालाकोट पर सवाल उठे। अब जब नकली युद्ध का माहौल गोदी मीडिया ने बनाया —तो सब चुप! क्या देशभक्ति सिर्फ़ माइक पर बोलने और चुनाव जीतने…
मुंबई: महाराष्ट्र में महायुति सरकार ने पहले “लड़की बहिन” फिर “वयोश्री” उसके बाद “युवा कार्य प्रशिक्षण” और अब सोमवार को चुनाव आयोग द्वारा राज्य में चुनाव की तारीखों की घोषणा करने से ठीक पहले मुंबई में प्रवेश करने या बाहर निकलने वाले हल्के मोटर वाहनों और गैर-वाणिज्यिक वाहनों (स्कूल और नियमित बसों) पर लगाए जाने वाले टोल को खत्म करने का फैसला किया. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हर दिन करीब 2,80,000 हल्के वाहन टोल नाकों का इस्तेमाल करते हैं और सोमवार आधी रात से लागू होने वाले इस फैसले से इन जगहों पर ट्रैफिक कम हो सकता है…
ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) में भारत को 105वें स्थान पर रखा गया है अंतरराष्ट्रीय मानवीय एजेंसियों द्वारा 127 देशों में कुपोषण और बाल मृत्यु दर संकेतकों के आधार पर भुखमरी के स्तर को मापने और ट्रैक करने के लिए उपयोग किये जाने वाले वैश्विक भुखमरी सूचकांक यानी ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) में भारत को 105वें स्थान पर रखा गया है. सूचकांक के हिसाब से यह ‘गंभीर’ श्रेणी है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, 2024 की रिपोर्ट, जो अब अपने 19वें संस्करण में है, इस सप्ताह आयरिश मानवीय संगठन कंसर्न वर्ल्डवाइड और जर्मन सहायता एजेंसी वेल्टहंगरहिल्फ़ द्वारा प्रकाशित की गई है, जिसमें इस…
नासिरा शर्मा गाजा में इज़रायल के हमले को सालभर पूरा हो चुका है पर हिंसा ख़त्म होने की आस नज़र नहीं आती. फ़िलिस्तीन में बरसों से हो रहा विध्वंस साहित्यकारों की दृष्टि से अछूता नहीं रहा है. साहित्य अकादमी से सम्मानित लेखिका नासिरा शर्मा की किताब ‘फ़िलिस्तीन : एक नया कर्बला’ इस भूमि से जन्मी रचनाओं का एक प्रतिनिधि संकलन है. इस किताब में लेखिका से फ़िलिस्तीन–इज़रायल परिदृश्य पर हुई बातचीत का यह संपादित अंश प्रस्तुत है. अशोक तिवारी: आपने मिडिल–ईस्ट पर बहुत काम किया है. आपके लिए इन मुल्कों की समस्याओं को लगातार उठाने के पीछे कौन–से प्रेरक तत्व रहे…