UN की रिपोर्ट और सरकार की खामोशी: संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) की भारत पर आई ताजा रिपोर्ट ने देश में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दलितों और आदिवासियों से लेकर मुसलमानों, प्रवासियों और शरण मांगने वालों तक—रिपोर्ट में कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाई, कथित भेदभाव, हिरासत, हिंसा, नागरिकता और मतदाता सूची जैसी प्रक्रियाओं को लेकर चिंता जताई गई है।
रिपोर्ट में क्या-क्या उठे सवाल?
रिपोर्ट में असम और पश्चिम बंगाल के बांग्लाभाषी मुसलमानों की स्थिति को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सीएए, एनआरसी और एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं में भेदभाव की आशंका पर समिति ने चिंता जताई और स्वतंत्र जांच सहित कई कदम उठाने की सिफारिश की है।
दलितों और आदिवासियों के अधिकारों, जमीन से विस्थापन, जातीय भेदभाव और कानून के समान इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
क्या रिपोर्ट आने से मिल जाता है इंसाफ?
लेकिन असली सवाल रिपोर्ट से भी बड़ा है – क्या केवल रिपोर्ट आने से इंसाफ मिल जाएगा?
क्या किसी पीड़ित को संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट दिखाकर यह कहा जा सकता है कि अब तुम्हारे साथ न्याय हो गया?
- क्या जिस परिवार ने किसी कथित पुलिस ज्यादती में अपना सदस्य खोया है, उसके लिए किसी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में दर्ज एक पैराग्राफ ही काफी है?
- क्या जिस गरीब, दलित या आदिवासी की जमीन और रोजी-रोटी खतरे में है, उसे सिर्फ चिंता और सिफारिशों से सुरक्षा मिल जाएगी?
जवाब साफ है – नहीं।
रिपोर्ट तब मायने रखती है जब उसके बाद कार्रवाई हो। चेतावनी तभी सार्थक होती है जब उसके बाद सुधार दिखाई दे। वरना अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें भी धीरे-धीरे कागजों का ढेर बन जाती हैं और पीड़ित इंसाफ की तलाश में दर-दर भटकता रहता है।
क्या पहले भी आ चुकी हैं ऐसी रिपोर्टें?
यह पहली बार नहीं है जब भारत में मानवाधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता व्यक्त की गई हो। पिछले वर्षों में भी संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
मगर सवाल यह है कि उन रिपोर्टों के बाद जमीन पर कितना बदलाव आया?
सरकार का रवैया – खारिज करना या जवाब देना?
अक्सर सरकार का रवैया यही रहा है कि ऐसी रिपोर्टों को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताकर खारिज कर दिया जाए। लेकिन लोकतंत्र में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सवाल पूछने वाला कौन है। सवाल यह होना चाहिए – सवाल सही है या गलत?
अगर रिपोर्ट गलत है, तो सरकार तथ्यों के साथ जवाब दे। आंकड़े सामने रखे। स्वतंत्र जांच कराए और साबित करे कि आरोप निराधार हैं।
लेकिन अगर रिपोर्ट में उठाए गए सवालों में सच्चाई है, तो फिर सवालों को राजनीतिक साजिश, विदेशी हस्तक्षेप या देश की छवि खराब करने की कोशिश बताकर दबा देना समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
सत्ता को आलोचना से डरना नहीं चाहिए
सत्ता को आलोचना से डरना नहीं चाहिए, बल्कि आलोचना से अपनी व्यवस्था को सुधारना चाहिए। आज सबसे बड़ा खतरा यही है कि कहीं लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना ही अपराध न समझ लिया जाए।
सरकार आती-जाती है, संविधान और अधिकार स्थायी हैं
सरकार लोकतंत्र का पर्याय नहीं है। सरकार आती-जाती रहती है, लेकिन संविधान और नागरिकों के अधिकार स्थायी होते हैं।
- जिस नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटने का खतरा है, उसे पारदर्शी प्रक्रिया चाहिए।
- जिस अल्पसंख्यक को अपनी पहचान के कारण निशाना बनाए जाने का डर है, उसे संविधान का संरक्षण चाहिए।
- जिस दलित को जातिगत हिंसा का सामना करना पड़ रहा है, उसे कानून का निष्पक्ष इस्तेमाल चाहिए।
- जिस आदिवासी को अपनी जमीन और जंगल से विस्थापन का डर है, उसे उसके अधिकारों की गारंटी चाहिए।
भाजपा सरकार से सीधे सवाल
और यहीं से सवाल सीधे भाजपा सरकार से भी है:
- क्या सरकार संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेगी?
- क्या वह उन आरोपों की स्वतंत्र जांच कराने को तैयार है, जिन पर अंतरराष्ट्रीय संस्था ने चिंता जताई है?
- क्या वह यह सुनिश्चित करेगी कि नागरिकता, मतदाता सूची और कानून का इस्तेमाल किसी समुदाय विशेष के खिलाफ भेदभाव का माध्यम न बने?
या फिर इस रिपोर्ट का भी वही होगा, जो कई पिछली रिपोर्टों का हुआ – कुछ दिनों तक राजनीतिक बयानबाजी, टीवी बहसें, आरोप-प्रत्यारोप और फिर सब कुछ शांत?
जवाबदेही तय कौन करेगा?
अगर यही होना है, तो फिर एक गंभीर सवाल देश के सामने खड़ा होता है – आखिर जवाबदेही तय कौन करेगा?
लोकतंत्र में संसद है, न्यायपालिका है, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग है और नागरिक समाज है। फिर भी अगर बार-बार वही शिकायतें सामने आती रहें, तो व्यवस्था के भीतर कहीं न कहीं गंभीर कमजोरी जरूर है।
संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर भी सवाल
यहाँ सवाल संयुक्त राष्ट्र से भी कम महत्वपूर्ण नहीं है:
- अगर किसी देश के बारे में बार-बार मानवाधिकार संबंधी गंभीर रिपोर्टें आती रहें और सरकारों पर उनका कोई ठोस असर न दिखाई दे, तो क्या संयुक्त राष्ट्र की भूमिका केवल रिपोर्ट जारी करने और चिंता जताने तक सीमित रहनी चाहिए?
- क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्र को अपनी निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था को और मजबूत नहीं करना चाहिए?
- क्या गंभीर मामलों में केवल सिफारिशों के बजाय ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए, जिससे संबंधित सरकारों पर वास्तविक जवाबदेही का दबाव बने?
बेशक, भारत एक संप्रभु देश है और किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था की भूमिका को उसकी संवैधानिक और कानूनी सीमाओं के भीतर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन मानवाधिकारों का सवाल किसी सीमा पर रुकता नहीं। इंसान के अधिकार उसकी नागरिकता, धर्म, जाति या भाषा देखकर तय नहीं किए जा सकते।
मानवाधिकार – सरकार की मेहरबानी नहीं, इंसान का अधिकार
मानवाधिकार सरकार की मेहरबानी नहीं, इंसान के अधिकार हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है। ऐसे में लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि उस नागरिक के अधिकार बचाने में है, जो सत्ता के सामने कमजोर है।
असली लोकतंत्र तब दिखाई देता है, जब सरकार:
- अपने आलोचक की आवाज भी सुनती है,
- अल्पसंख्यक को बराबरी का भरोसा देती है,
- दलित को न्याय दिलाती है, और
- आदिवासी को उसकी जमीन और अधिकारों की सुरक्षा देती है।
सवाल यह नहीं कि UN ने क्या कहा, सवाल यह है कि कितना सच है
इसलिए CERD की रिपोर्ट को केवल सरकार बनाम संयुक्त राष्ट्र का विवाद बना देना, इस रिपोर्ट के असली सवालों से बचना होगा।
सवाल यह नहीं कि UN ने भारत के बारे में क्या कहा।
सवाल यह है कि रिपोर्ट में उठाए गए सवालों में कितना सच है और अगर सच है, तो सरकार उसे दूर करने के लिए क्या करेगी?
रिपोर्ट को खारिज करना आसान है। सवालों का जवाब देना मुश्किल है। लेकिन लोकतंत्र में सरकारों से आसान रास्ता चुनने की उम्मीद नहीं की जाती। उनसे जवाबदेही की उम्मीद की जाती है।
रिपोर्टें बहुत आ चुकीं, अब कार्रवाई की जरूरत
रिपोर्टें बहुत आ चुकीं। चेतावनियाँ बहुत आ चुकीं। अब जरूरत रिपोर्टों के ढेर की नहीं, कार्रवाई की है।
- अगर सरकार को लगता है कि आरोप गलत हैं, तो वह तथ्यों के साथ जवाब दे।
- अगर आरोपों में सच्चाई है, तो सुधार करे।
- और अगर कहीं सरकारी मशीनरी ने कानून का गलत इस्तेमाल किया है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो।
इतिहास पूछेगा – क्यों नहीं सुनी गईं चेतावनियाँ?
वरना इतिहास यही पूछेगा कि जब अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ लगातार चेतावनी दे रही थीं, जब देश के भीतर भी सवाल उठ रहे थे, तब सत्ता ने उन आवाजों को सुना क्यों नहीं?
क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं कि सरकार अपने समर्थकों के लिए क्या करती है, बल्कि यह है कि वह अपने सबसे कमजोर, वंचित और असहमत नागरिकों के अधिकारों की कितनी मजबूती से रक्षा करती है।
अब देखना यह है…
अब देखना यह है कि यह रिपोर्ट भी सिर्फ सुर्खी बनकर रह जाती है, या सरकार को वास्तव में जवाबदेह बनाने की शुरुआत होती है।
और अगर रिपोर्टों के बाद भी हालात नहीं बदलते, तो सवाल और बड़ा होगा:
क्या अब संयुक्त राष्ट्र को सिर्फ रिपोर्ट लिखने और चिंता जताने से आगे बढ़कर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कोई प्रभावी अंतरराष्ट्रीय कदम उठाने पर विचार करना होगा?