राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में हजारों लोगों को संबोधित करते हुए भारत की जिस तस्वीर को दुनिया के सामने पेश किया, वह सुनने में निश्चित रूप से आकर्षक है। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में एकता है। उन्होंने कहा कि हिंदू राष्ट्र का मतलब मुसलमानों को भारत से बाहर करना नहीं है। यहां तक कहा कि जो हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, वह हिंदू ही नहीं है।
भागवत ने ‘मैं और मेरा’ के बजाय ‘हम और हमारा’ की बात की, दुश्मनी को इंसान की बनाई हुई चीज बताया और कहा कि दुनिया को भारत से विविधता के बीच एकता सीखनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या न्यूयॉर्क में कही गई ये बातें भारत में भी उसी ताकत और स्पष्टता के साथ लागू होती हैं? यही वह सवाल है जिससे भागवत और संघ को बचना नहीं चाहिए।
विदेश में भारत की बहुलतावादी और सहिष्णु तस्वीर पेश करना अच्छी बात है, लेकिन भारत की जमीन पर पिछले वर्षों में मुसलमानों को लेकर जिस तरह की बहिष्कार की राजनीति, नफरत भरे भाषण, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की अपीलें तथा भीड़ हिंसा के मामले सामने आए हैं, उन पर संघ की आवाज कितनी बुलंद रही है?
आलोचकों का आरोप है कि भाजपा और उससे जुड़े संगठनों से जुड़े कुछ लोगों पर मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ बयान देने के आरोप लगते रहे हैं। कई मौकों पर मुस्लिमों के बहिष्कार की अपीलें भी सामने आईं। गाय के नाम पर हिंसा और मॉब लिंचिंग के मामलों ने देश की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।
ऐसे मामलों में अगर कोई व्यक्ति खुले तौर पर नफरत फैलाता है, किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा की अपील करता है या कानून अपने हाथ में लेता है, तो क्या संघ को उसी तरह सार्वजनिक और कठोर भाषा में उसका विरोध नहीं करना चाहिए, जैसी भाषा भागवत ने न्यूयॉर्क में इस्तेमाल की?
भागवत ने कहा कि ‘जीओ और जीने दो’ भारत की परंपरा है। फिर सवाल उठता है कि भारत में मुसलमानों के लिए भी यही ‘जीओ और जीने दो’ कितना प्रभावी है? अगर हिंदू राष्ट्र का अर्थ मुसलमानों को बाहर करना नहीं है, तो फिर मुसलमानों के खिलाफ होने वाली नफरत और बहिष्कार की राजनीति पर संघ की स्पष्ट राजनीतिक-सामाजिक प्रतिक्रिया क्यों दिखाई नहीं देती? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संघ का प्रभाव भाजपा की विचारधारा और भारतीय राजनीति पर व्यापक माना जाता है।
दूसरा बड़ा सवाल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘बुलडोजर राजनीति’ को लेकर है। उत्तर प्रदेश सरकार इन कार्रवाइयों को अवैध निर्माण, अतिक्रमण और कानून-व्यवस्था के मामलों में की गई कार्रवाई बताती है। लेकिन आलोचकों का आरोप है कि कई मामलों में बुलडोजर कार्रवाई को दंडात्मक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया और मुस्लिम परिवारों के घरों, दुकानों तथा धार्मिक संस्थानों को निशाना बनाया गया।
ऐसे में सवाल सीधा है कि अगर भागवत वास्तव में भारत की विविधता और सभी समुदायों के सम्मान की बात करते हैं, तो उन्होंने ऐसी कार्रवाइयों पर कितनी बार सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई? योगी आदित्यनाथ भाजपा के मुख्यमंत्री हैं, संघ के विचार परिवार से उनका वैचारिक रिश्ता माना जाता है। ऐसे में जब भागवत विदेश की धरती से कहते हैं कि भारत किसी समुदाय को बाहर करने वाला देश नहीं है, तो देश में किसी समुदाय को असुरक्षा महसूस होने की स्थिति में संघ की जिम्मेदारी भी बनती है कि वह अपनी बात स्पष्ट करे।
यही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिखाई दिया जब न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने भागवत के कार्यक्रम से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि उनका परिवार भारत को एक बहुलवादी और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में देखता रहा है और वह ऐसी राजनीति का समर्थन नहीं करते जो किसी देश को केवल एक पहचान तक सीमित कर दे। ममदानी का बयान केवल अमेरिका की स्थानीय राजनीति का हिस्सा मानकर खारिज करना आसान है, लेकिन इसके पीछे उठ रहे सवाल को नजरअंदाज करना मुश्किल है।
अगर भारत वास्तव में विविधता में एकता का संदेश दुनिया को देना चाहता है, तो दुनिया स्वाभाविक रूप से यह भी पूछेगी कि भारत के भीतर अल्पसंख्यकों की स्थिति क्या है?
यहीं मोहन भागवत का न्यूयॉर्क भाषण एक महत्वपूर्ण कसौटी बन जाता है। संघ कहता है कि वह समाज को बदलना चाहता है और राजनीति से ऊपर सामाजिक परिवर्तन को महत्व देता है। भागवत ने खुद कहा कि राजनीति स्वार्थ में फंस गई है और परिवर्तन समाज से शुरू होना चाहिए। लेकिन अगर समाज में किसी समुदाय के खिलाफ नफरत बढ़ती है, तो उस सामाजिक वातावरण को बदलने की जिम्मेदारी सबसे पहले उन संगठनों की भी है जो खुद को समाज निर्माण का सबसे बड़ा वाहक बताते हैं।
कुणाल कामरा ने भागवत के कार्यक्रम को लेकर जिस व्यंग्य के जरिए भारतीय लोकतंत्र और पुलिस-प्रशासन पर सवाल उठाया, वह भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कोई व्यक्ति भागवत के कार्यक्रम के पक्ष में है या विरोध में। असली सवाल यह है कि लोकतंत्र में हर विचार को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता है, लेकिन उसी लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की बराबरी और सुरक्षा की गारंटी भी उतनी ही जरूरी है।
भारत की असली परीक्षा मैडिसन स्क्वायर गार्डन के मंच पर नहीं होगी। वहां हजारों लोगों के सामने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ या ‘एकता में विविधता’ कहना आसान है। असली परीक्षा तब होगी जब किसी मुस्लिम परिवार के घर पर बुलडोजर चले, किसी मुसलमान के खिलाफ बहिष्कार की अपील हो, किसी धार्मिक स्थल को लेकर तनाव पैदा हो या भीड़ कानून हाथ में लेने की कोशिश करे। उस वक्त संघ क्या करता है? क्या वह चुप रहता है, या उसी ताकत से विरोध करता है जिस ताकत से विदेश में भारत की सहिष्णु तस्वीर पेश की जाती है?