नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने गो-संरक्षण अभियान के तहत 10,000 ‘गो मित्रों’ को प्रशिक्षित करने की योजना की घोषणा की है। सरकार का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य युवाओं, खासकर जेन-ज़ी को गो-संरक्षण से जोड़ना और इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, प्राकृतिक खेती, महिला सशक्तीकरण, हरित ऊर्जा तथा रोजगार से जोड़कर आत्मनिर्भरता का मॉडल तैयार करना है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सुनने में यह योजना ग्रामीण विकास, पर्यावरण और पशुपालन से जुड़ी एक सकारात्मक पहल लग सकती है। गायों की देखभाल, बायोगैस, गोबर आधारित उत्पाद, जैविक खेती और पशुधन आधारित रोजगार जैसे क्षेत्रों में निश्चित रूप से आर्थिक संभावनाएं मौजूद हैं। लेकिन इस घोषणा का समय और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियां कुछ गंभीर सवाल भी खड़े करती हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 10,000 ‘गो मित्र’ वास्तव में रोजगार और ग्रामीण विकास का मॉडल तैयार करेंगे, या फिर यह आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले आस्था और राजनीति को एक बार फिर जोड़ने की कोशिश है?
रोजगार चाहिए या ‘गो मित्र’ का नेटवर्क?
उत्तर प्रदेश लंबे समय से बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा है। लाखों युवा सरकारी नौकरियों, निजी रोजगार और स्थायी आय के अवसरों की तलाश में हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की अनियमितता, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और रोजगार के सीमित अवसरों को लेकर युवाओं के बीच लगातार असंतोष देखने को मिलता रहा है। ऐसे समय में सरकार 10,000 युवाओं को ‘गो मित्र’ के रूप में प्रशिक्षित करने की बात करती है। लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि इन ‘गो मित्रों’ को आखिर मिलेगा क्या?
क्या यह स्थायी नौकरी होगी? क्या उन्हें सरकारी वेतन या मानदेय मिलेगा? क्या प्रशिक्षण के बाद रोजगार की गारंटी होगी? क्या उनके लिए कोई स्पष्ट आर्थिक मॉडल तैयार है? या फिर हजारों युवाओं का केवल एक ऐसा नेटवर्क बनाया जाएगा, जिसका काम गांवों में सरकार के गो-संरक्षण अभियान को आगे बढ़ाना होगा? सरकार को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए। क्योंकि आज का युवा केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि स्थायी रोजगार और सम्मानजनक आय चाहता है।
गो-संरक्षण की राजनीति और जमीन की हकीकत
उत्तर प्रदेश में गो-संरक्षण लंबे समय से सरकार की प्राथमिकता और राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। सरकार ने गोशालाओं और बेसहारा गोवंश के संरक्षण के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। लेकिन दूसरी तरफ किसान लंबे समय से आवारा पशुओं की समस्या को लेकर शिकायत करते रहे हैं। कई ग्रामीण इलाकों में किसानों की शिकायत रही है कि बेसहारा पशु उनकी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। किसान रात-रात भर खेतों की रखवाली करने को मजबूर होते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब राज्य में पहले से ही गोशालाओं, पशु संरक्षण और आवारा गोवंश को लेकर गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं, तो क्या 10,000 ‘गो मित्र’ नियुक्त करने से समस्या का वास्तविक समाधान होगा? गो-संरक्षण केवल नारे, अभियान और प्रशिक्षण से नहीं होगा। इसके लिए जमीन पर पर्याप्त गोशालाएं, चारा, पशु चिकित्सक, कर्मचारियों की नियुक्ति और जवाबदेह व्यवस्था चाहिए। यदि गाय सड़कों पर घूमती रहे, किसान फसल बचाने के लिए परेशान रहे और गोशालाओं में संसाधनों की कमी बनी रहे, तो केवल ‘गो मित्र’ तैयार कर देने से तस्वीर नहीं बदलेगी।
गोबर, गोमूत्र और ‘आत्मनिर्भरता’ का दावा
सरकार का कहना है कि गो-संरक्षण को गोबर और गोमूत्र आधारित उत्पादों, प्राकृतिक खेती, बायोगैस और अन्य आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा जाएगा। सिद्धांत रूप में यह विचार उपयोगी हो सकता है। बायोगैस, जैविक खाद और पशुधन आधारित छोटे उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं। लेकिन हर सरकारी योजना की तरह यहां भी सवाल कार्यान्वयन और बाजार का है।
गोबर से खाद बनाना एक बात है, लेकिन उसे बेचने के लिए बाजार कहां है? गोमूत्र आधारित उत्पादों की वास्तविक मांग कितनी है? प्रशिक्षण लेने वाले युवाओं को ऋण, मशीनरी और विपणन की सुविधा कौन देगा? क्या सरकार इन उत्पादों को खरीदने या इनके लिए बाजार उपलब्ध कराने की कोई गारंटी देगी? यदि इन सवालों का जवाब नहीं है, तो ‘आत्मनिर्भरता’ का यह मॉडल भी उन अनेक योजनाओं की तरह कागजों और सरकारी विज्ञापनों तक सीमित रह सकता है।
जेन-ज़ी को गो-संरक्षण से जोड़ने की कोशिश क्यों?
सरकार का विशेष जोर नई पीढ़ी और जेन-ज़ी को गो-संरक्षण अभियान से जोड़ने पर है। यह अपने आप में राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। जेन-ज़ी वह पीढ़ी है जो रोजगार, शिक्षा, तकनीक, सोशल मीडिया और भविष्य के अवसरों को लेकर अधिक जागरूक और मुखर है। सरकार यदि वास्तव में युवाओं को जोड़ना चाहती है तो उन्हें केवल गो-संरक्षण ही नहीं, बल्कि बेहतर शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार, स्टार्टअप के अवसर और निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया भी उपलब्ध करानी होगी। युवा के हाथ में केवल ‘गो मित्र’ का प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देकर उसे आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सकता। आत्मनिर्भरता तब आएगी, जब उसके पास नियमित आय और भविष्य की सुरक्षा होगी।
विधानसभा चुनाव और घोषणा का समय
इस पूरी योजना को आने वाले विधानसभा चुनावों के राजनीतिक संदर्भ से अलग करके देखना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में गाय, धर्म और हिंदुत्व लंबे समय से चुनावी विमर्श का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में चुनाव से पहले 10,000 ‘गो मित्रों’ का नेटवर्क तैयार करने की घोषणा को लेकर राजनीतिक सवाल उठना स्वाभाविक है। विपक्ष यह सवाल पूछ सकता है कि सरकार बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने के लिए कितनी गंभीर है और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़े अभियानों को कितना राजनीतिक महत्व दिया जा रहा है।
लोकतंत्र में किसी सरकार को अपनी विचारधारा और प्राथमिकताओं के आधार पर योजनाएं बनाने का अधिकार है। लेकिन जब चुनाव नजदीक हों, तब जनता को यह भी देखना चाहिए कि कौन-सी योजना वास्तविक जरूरतों के आधार पर बनाई गई है और कौन-सी घोषणा राजनीतिक संदेश देने के लिए अधिक उपयोगी है।
विकास का असली मॉडल क्या होना चाहिए?
गो-संरक्षण और पशुधन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में कोई बुराई नहीं है। बल्कि यदि इसे वैज्ञानिक तरीके से लागू किया जाए तो इससे किसानों और ग्रामीण युवाओं को फायदा भी हो सकता है। लेकिन विकास की प्राथमिकताएं संतुलित होनी चाहिए। जहां गोशालाओं के लिए योजनाएं हैं, वहां स्कूलों के लिए भी पर्याप्त बजट होना चाहिए। जहां गो-संरक्षण के लिए प्रशिक्षित कार्यकर्ता तैयार किए जा रहे हैं, वहां अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर भी होने चाहिए।
जहां ‘गो मित्र’ बनाए जा रहे हैं, वहां बेरोजगार युवाओं के लिए शिक्षक, पुलिस, स्वास्थ्यकर्मी और अन्य सरकारी पदों पर भर्ती भी होनी चाहिए। विकास का अर्थ केवल एक खास विचारधारा या आस्था से जुड़ी योजनाओं को आगे बढ़ाना नहीं है। विकास का अर्थ हर नागरिक के जीवन की बुनियादी समस्याओं का समाधान करना है।
आखिर में सवाल जनता का है
उत्तर प्रदेश सरकार की 10,000 ‘गो मित्र’ तैयार करने की योजना सफल होगी या नहीं, इसका फैसला उसके परिणामों से होगा, घोषणाओं से नहीं। यदि इससे वास्तव में युवाओं को रोजगार मिलता है, किसानों की समस्याएं कम होती हैं, गोशालाओं की स्थिति सुधरती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ताकत मिलती है, तो इसे सकारात्मक पहल माना जाएगा। लेकिन अगर यह योजना केवल चुनाव से पहले आस्था आधारित राजनीतिक नेटवर्क तैयार करने और सरकार की वैचारिक राजनीति को गांव-गांव तक पहुंचाने का माध्यम बनकर रह गई, तो जनता इसे पहचानने में देर नहीं लगाएगी।
आज उत्तर प्रदेश के युवा को केवल यह नहीं बताया जाना चाहिए कि गाय की सेवा कैसे की जाए। उसे यह भी बताया जाना चाहिए कि उसकी पढ़ाई के बाद नौकरी कहां है, उसकी भर्ती कब होगी और उसके भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा। 10,000 ‘गो मित्र’ तैयार करना आसान है, लेकिन करोड़ों युवाओं को रोजगार देना कठिन चुनौती है। और सरकार की असली परीक्षा इसी चुनौती को हल करने में है। क्योंकि लोकतंत्र में आखिरकार सवाल यही रहेगा—क्या सरकार युवाओं को रोजगार दे रही है, या रोजगार के सवाल से ध्यान हटाकर उन्हें एक नए राजनीतिक और वैचारिक अभियान का हिस्सा बना रही है?
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