राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत की प्रस्तावित अमेरिका यात्रा से पहले वहां के कुछ सिख संगठनों और अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) की ओर से उठाई गई आपत्तियां केवल एक व्यक्ति की विदेश यात्रा का विवाद नहीं हैं। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सवाल यह है कि जिस संगठन को भारत की सत्ताधारी राजनीति और हिंदुत्व की विचारधारा का वैचारिक केंद्र माना जाता है, उसके बारे में धार्मिक अल्पसंख्यकों, सामाजिक न्याय और जातीय समानता को लेकर देश और विदेश में लगातार सवाल क्यों उठते रहे हैं? 20 अगस्त को अमेरिका के तीन सिख संगठनों द्वारा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को लिखा गया पत्र इसी चिंता को सामने लाता है। पत्र में आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों-विशेषकर सिखों, मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और उत्पीड़न से जुड़ी विचारधारा को बढ़ावा देने के आरोप लगाए गए हैं।
इससे पहले यूएससीआईआरएफ के स्तर पर भी आरएसएस को लेकर गंभीर टिप्पणियां सामने आईं। जिसपर भारत सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए यूएससीआईआरएफ को पक्षपाती और अविश्वसनीय बताया है। लेकिन किसी संस्था को पक्षपाती कहकर सवालों को समाप्त नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में असली कसौटी यह होनी चाहिए कि क्या उठाए गए सवालों का जवाब तथ्यों, नीतियों और समाज की वास्तविक स्थिति के आधार पर दिया जा रहा है?
नफ़रत का माहौल आखिर पैदा कौन करता है?
आज भारत में मुसलमानों, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती शत्रुता पर लगातार बहस होती रही है। कहीं धार्मिक पहचान के आधार पर भीड़ द्वारा हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं, कहीं खान-पान और पहनावे को लेकर लोगों को निशाना बनाया जाता है, कहीं मस्जिदों और धार्मिक स्थलों पर विवाद खड़े किए जाते हैं, तो कहीं ‘घुसपैठिया’, ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’,कॉर्पोरेट जिहाद ‘जनसंख्या खतरा’ और न जाने कितने नए शब्द गढ़कर एक पूरे समुदाय को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है।
यह पूछना जरूरी है कि क्या नफ़रत केवल सड़कों पर अचानक पैदा हो जाती है? भीड़ के हाथ में डंडा बाद में आता है, उससे पहले उसके दिमाग में एक विचार डाला जाता है। किसी समुदाय को पहले ‘दूसरा’ बताया जाता है, फिर ‘खतरा’ बताया जाता है और अंततः उसके खिलाफ हिंसा को सामान्य बनाने की कोशिश की जाती है। यही वह प्रक्रिया है जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए सबसे खतरनाक होती है। आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों का कहना हो सकता है कि वे समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक जागरण का काम करते हैं।
लेकिन फिर यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यदि संगठन का उद्देश्य केवल राष्ट्र निर्माण है, तो उसके समर्थक और उससे प्रभावित राजनीतिक-सामाजिक समूह बार-बार धार्मिक ध्रुवीकरण के केंद्र में क्यों दिखाई देते हैं? क्या राष्ट्रवाद का अर्थ किसी एक धर्म की सर्वोच्चता है? क्या देशभक्ति साबित करने के लिए किसी नागरिक को अपनी धार्मिक पहचान का प्रमाण देना पड़ेगा? और क्या भारत का भविष्य बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की स्थायी लड़ाई में सुरक्षित रह सकता है?
हिंदुत्व और हिंदू समाज-क्या दोनों एक ही हैं?
सबसे बड़ी राजनीतिक चाल शायद यही रही है कि हिंदू धर्म, हिंदू समाज और हिंदुत्व की राजनीतिक विचारधारा को एक ही चीज़ के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। भारत का हिंदू समाज स्वयं जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों, परंपराओं और विचारों की विशाल विविधता से बना है। लेकिन हिंदुत्व की राजनीति अक्सर एक ऐसी एकरूप ‘हिंदू पहचान’ तैयार करने का प्रयास करती दिखाई देती है, जिसमें बहुसंख्यक समाज के भीतर मौजूद जातिगत असमानताएं और सामाजिक अन्याय पीछे छूट जाते हैं और ध्यान किसी बाहरी या आंतरिक ‘दुश्मन’ की ओर मोड़ दिया जाता है।
यहीं से जातिवाद का सवाल सबसे गंभीर हो जाता है। जब दलित पर अत्याचार होता है, जब आदिवासी अपनी जमीन और जंगल के लिए संघर्ष करता है, जब पिछड़े वर्गों को सामाजिक बराबरी के लिए लड़ना पड़ता है, जब जाति के नाम पर विवाह करने वालों की हत्या कर दी जाती है, तब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आवाज कितनी बुलंद होती है? यह सवाल केवल आरएसएस से नहीं, बल्कि पूरे उस राजनीतिक-सामाजिक ढांचे से है जो हिंदू एकता की बात तो करता है, लेकिन हिंदू समाज के भीतर मौजूद जातिगत ऊंच-नीच को समाप्त करने के लिए उतनी ही तीव्रता से संघर्ष करता दिखाई नहीं देता।
जाति खत्म करने की लड़ाई या जातियों को संगठित करने की राजनीति?
भारत का सबसे बड़ा सामाजिक विरोधाभास यह है कि हम विश्वगुरु बनने की बात करते हैं, लेकिन आज भी किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत उसके जन्म से तय करने वाली मानसिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। जाति के नाम पर भेदभाव, दलितों पर अत्याचार, सामाजिक बहिष्कार और विवाह संबंधी हिंसा की घटनाएं लगातार हमारे समाज के सामने आती हैं।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि जो संगठन स्वयं को समाज का सबसे बड़ा सांस्कृतिक मार्गदर्शक बताता है, उसने जाति व्यवस्था की जड़ों पर निर्णायक प्रहार करने के लिए क्या ऐसा व्यापक आंदोलन खड़ा किया है, जिसकी तुलना धार्मिक पहचान के मुद्दों पर उसके अभियानों से की जा सके? क्या कभी जाति प्रथा को समाप्त करने के लिए उसी पैमाने पर देशव्यापी जनजागरण हुआ, जिस पैमाने पर मंदिर, धर्मांतरण या धार्मिक पहचान के मुद्दों पर आंदोलन हुए?
क्या दलित और सवर्ण के बीच वास्तविक सामाजिक बराबरी स्थापित करने के लिए उतनी ही राजनीतिक ऊर्जा खर्च की गई? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या ‘हिंदू एकता’ का नारा वास्तव में जाति समाप्त करने का माध्यम बना या कई बार जातिगत असमानताओं को छिपाकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ राजनीतिक एकजुटता बनाने का उपकरण? इन प्रश्नों से बचना आसान है, लेकिन उनका उत्तर दिए बिना सामाजिक समरसता की बात अधूरी रहेगी।
सत्ता, संगठन और जवाबदेही
आरएसएस स्वयं को राजनीतिक दल नहीं कहता। लेकिन यह भी एक स्थापित राजनीतिक वास्तविकता है कि भाजपा के अनेक प्रमुख नेताओं का वैचारिक और संगठनात्मक संबंध आरएसएस से रहा है। ऐसे में आरएसएस को केवल एक साधारण सामाजिक संगठन मानकर उसकी भूमिका पर चर्चा से बचना संभव नहीं है। जब किसी संगठन का वैचारिक प्रभाव देश की सरकार, नीतियों, शिक्षा, संस्कृति और सार्वजनिक विमर्श तक पहुंचता है, तो उसकी जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी हो जाती है।
इसी संदर्भ में उसके पंजीकरण, वित्तीय पारदर्शिता और धन के स्रोतों को लेकर उठाए गए प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं। प्रियांक खड़गे द्वारा मोहन भागवत को लिखे गए पत्र में आरएसएस की आय, पंजीकरण और कर संबंधी जवाबदेही पर सवाल उठाए गए। आरएसएस ने अपने खिलाफ लगाए गए विभिन्न आरोपों से इनकार किया है। लेकिन लोकतंत्र में केवल इनकार पर्याप्त नहीं होता बल्कि पारदर्शिता ही सबसे मजबूत जवाब होती है।
अगर किसी संगठन के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो उसके वित्त, संसाधनों और संस्थागत ढांचे पर सार्वजनिक सवाल उठने से उसे डर क्यों होना चाहिए? इसी तरह अमेरिका में कथित लॉबिंग और संघ से जुड़े संगठनों को मिलने वाले फंड को लेकर सामने आई रिपोर्टों ने भी बहस को जन्म दिया है। सवाल यह नहीं कि किसी संगठन पर आरोप लगते ही उसे दोषी घोषित कर दिया जाए। सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक जीवन में प्रभाव रखने वाले संगठन अपनी गतिविधियों और वित्तीय संबंधों को पूरी पारदर्शिता के साथ जनता के सामने रखने के लिए तैयार हैं?
अल्पसंख्यकों का डर क्या केवल ‘प्रचार’ है?
हर बार जब भारत में मुसलमानों या ईसाइयों के खिलाफ हिंसा, नफरत भरे भाषण या सामाजिक बहिष्कार की बात उठती है, तो एक तर्क दिया जाता है कि भारत विरोधी शक्तियां देश को बदनाम कर रही हैं। लेकिन क्या देश की छवि बचाने का मतलब समस्याओं से आंखें बंद कर लेना है? अगर कोई मुस्लिम नागरिक भीड़ हिंसा से डरता है, कोई ईसाई समुदाय अपने धार्मिक कार्यक्रम को लेकर चिंतित है, कोई दलित आज भी जातिगत अपमान का सामना करता है या कोई सिख संगठन अमेरिका में बैठकर भारत की धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर चिंता व्यक्त करता है, तो इन सभी को विदेशी एजेंडा बताकर खारिज कर देना समस्या का समाधान नहीं है।
देश की प्रतिष्ठा आलोचना दबाने से नहीं, बल्कि अन्याय को दूर करने से बढ़ती है। भारत की असली ताकत उसकी विविधता रही है। यह देश केवल एक धर्म, एक भाषा, एक जाति या एक विचारधारा से नहीं बना। भारत उन करोड़ों लोगों का देश है जिनकी पहचान, परंपराएं और मान्यताएं अलग-अलग हैं। संविधान ने इसी विविधता को बराबरी और नागरिकता के सिद्धांत से जोड़ा। इसलिए कोई भी विचारधारा जो नागरिकों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर बांटती है, लोकतंत्र के लिए चुनौती है, चाहे वह किसी भी धर्म के नाम पर हो।
नफ़रत की राजनीति का सबसे बड़ा लाभ किसे?
यह भी समझना होगा कि धार्मिक नफ़रत और जातीय विभाजन केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि कई बार राजनीतिक पूंजी भी बन जाते हैं। जब बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्या और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे जनता को परेशान करते हैं, तब धार्मिक ध्रुवीकरण एक आसान राजनीतिक रास्ता बन सकता है। जनता का ध्यान रोजगार से हटाकर मंदिर-मस्जिद की बहस में लगाया जा सकता है। गरीब हिंदू और गरीब मुस्लिम की साझा आर्थिक समस्याओं को पीछे धकेलकर उन्हें एक-दूसरे का विरोधी बनाया जा सकता है।
यही राजनीति लोकतंत्र को कमजोर करती है। एक गरीब हिंदू की बेरोजगारी केवल इसलिए खत्म नहीं हो जाती कि वह किसी मुस्लिम से नफरत करने लगे। किसी दलित को सामाजिक सम्मान केवल धार्मिक नारे लगाने से नहीं मिलता। किसी किसान की फसल का उचित मूल्य सांप्रदायिक भाषणों से नहीं बढ़ता। लेकिन नफ़रत का कारोबार करने वालों के लिए यह सब बहुत उपयोगी है, क्योंकि एक विभाजित समाज सत्ता से कठिन सवाल पूछने की स्थिति में कम रह जाता है।
आरएसएस के सामने असली सवाल
मोहान भागवत की अमेरिका यात्रा को लेकर उठे विवाद के बीच आरएसएस के सामने केवल यह सवाल नहीं है कि अमेरिका उसे प्रवेश देता है या नहीं। इससे कहीं बड़ा सवाल भारत के भीतर उसकी भूमिका को लेकर है। क्या आरएसएस स्पष्ट रूप से उन सभी लोगों और संगठनों से दूरी बनाएगा जो मुसलमानों, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा या नफरत फैलाते हैं? क्या वह अपने प्रभाव क्षेत्र में नफरत भरे भाषणों के खिलाफ खुलकर अभियान चलाएगा? क्या वह जाति व्यवस्था और छुआछूत के खिलाफ केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि व्यापक और निर्णायक आंदोलन चलाएगा? क्या वह दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों को वास्तविक सामाजिक बराबरी दिलाने के लिए अपने सामाजिक ढांचे की समीक्षा करेगा?
क्या वह अपने वित्त और संस्थागत संरचना को लेकर उठने वाले सवालों का अधिक पारदर्शिता के साथ जवाब देगा? और सबसे महत्वपूर्ण ये कि क्या वह भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में स्वीकार करेगा जहां नागरिक की पहचान धर्म से नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्राप्त समान अधिकारों से तय होती है? मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा पर उठे सवालों को केवल ‘विदेशी साजिश’ या ‘भारत विरोधी प्रचार’ कहकर खारिज करना आसान है। लेकिन आसान जवाब हमेशा सही जवाब नहीं होता। आरएसएस भारत का एक प्रभावशाली संगठन है और इसलिए उससे जुड़े सवाल भी गंभीर होंगे।
जितना बड़ा उसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव है, उतनी ही बड़ी उसकी जिम्मेदारी भी है। आज भारत को नफरत नहीं, न्याय चाहिए। धार्मिक श्रेष्ठता की राजनीति नहीं, संवैधानिक बराबरी चाहिए। जाति के नाम पर बने सामाजिक किलों को मजबूत करने वाली मानसिकता नहीं, उन्हें तोड़ने का साहस चाहिए। भारत का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि कौन किस धर्म का है, कौन किस जाति में पैदा हुआ है या कौन किस संगठन से जुड़ा है।
भविष्य इस बात से तय होगा कि क्या हम एक ऐसा समाज बना पाएंगे जहां किसी नागरिक को अपने नाम, धर्म, जाति या पहनावे के कारण डरकर जीना न पड़े। और यही वह सवाल है, जिसका जवाब आज केवल आरएसएस को नहीं, बल्कि भारत की पूरी राजनीति और समाज को देना होगा। क्योंकि राष्ट्र नारे लगाने से महान नहीं बनता बल्कि राष्ट्र तब महान बनता है, जब उसके सबसे कमजोर नागरिक को भी बराबरी, सम्मान और सुरक्षा मिले।
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