- अगर अदालतों के पास भी नागरिकों की चींख सुनने का समय नहीं, तो मजलूम आखिर जाएं कहां?
- गुजरात में “कट्टरतावाद विरोधी पथक”की स्थापना…
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- बिना नेम प्लेट और नंबर वाले ये लोग कौन हैं? पुलिस की वर्दी में छिपे चेहरों का सच सामने आना चाहिए
- सवाल एक अनशन का नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का है
- ग़ैरों पे करम-अपनों पे सितम? पाकिस्तान को नसीहत देने से पहले भारत को भी आईना देखने की ज़रूरत
- जब जज का नाम इंसाफ़ से बड़ा बना दिया जाए, तो समझ लीजिए संविधान कठघरे में खड़ा है
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यह सिर्फ छात्रवृत्ति की देरी नहीं है — यह एक सुनियोजित शोषण है, एक ऐसा जुल्म जो भारत के सबसे वंचित और संघर्षशील युवाओं पर ढाया जा रहा है। मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप — अल्पसंख्यक छात्रों के लिए उम्मीद की किरण — अब खुद एक उपेक्षा की शिकार लाश बन चुकी है। 6 महीने से अधिक बीत गए, छात्र पैसे के लिए तरस रहे हैं, शोध रुक गया है, दवाइयाँ नहीं खरीदी जा रहीं, रेंट नहीं दिया जा रहा, और सरकार चुप है। क्या ये योजनाबद्ध अत्याचार नहीं है?:- दिसंबर 2024 से लेकर अब तक सैकड़ों मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई, सिख,…
मथुरा एक बार फिर सियासी धर्मयुद्ध का अखाड़ा बन चुका है। इस बार मोर्चा खुला है ‘हिंदू चेतना यात्रा’ के नाम पर — एक ऐसी यात्रा जिसे ‘जनजागरण’ कहा जा रहा है, लेकिन जिसकी बुनियाद में घुली है नफरत, उन्माद और अदालत की अवमानना! श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद पहले ही अदालत में लंबित है। लेकिन वादी पक्ष यानी ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास’ के लोग अब सड़कों पर उतरकर माहौल गरमाने में जुटे हैं। ‘हिंदू चेतना यात्रा’ को “आस्था का उत्सव” कहकर परोसा जा रहा है, जबकि इसका असली मकसद सांप्रदायिक तनाव फैलाना और न्याय प्रक्रिया पर दबाव…
ग़ज़ा फिर जल रहा है — लेकिन इस बार बमबारी से नहीं, भूख से बिलखते लोगों पर बरसी गोलियों से। 27 लाशें। 90 घायल। सब भूख से मर रहे थे, सिर्फ़ रोटी लेने निकले थे। लेकिन इस्राइली सेना के लिए ये भूखे भी “ख़तरा” बन गए। रफाह में एक सहायता वितरण केंद्र के बाहर, लोग मदद की कतार में खड़े थे — कुछ उम्मीद लिए, कुछ रोटी के लिए। तभी, गोलियां चलीं। ग़ज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि 27 लोगों की मौत हो गई, दर्जनों ज़ख़्मी हैं। इसी तरह की घटना रविवार को भी हुई थी, यानी यह महज़…
2022 के चुनाव प्रचार के दौरान एक जनसभा में “हिसाब-किताब” की बात करने वाले अब्बास अंसारी को कोर्ट ने दो साल की सज़ा सुनाई और उन्हें विधायक पद से अयोग्य करार दिया गया। कोर्ट चला, फैसला आया, विधानसभा अध्यक्ष ने छुट्टी के दिन सचिवालय खोला, और तुरंत उनकी सीट खाली घोषित कर दी गई।जब्कि अगले दिन भी ये सब हो सकता था लेकिन क्या और क्यों जल्दी थी पता नहीं। सबकुछ इतनी तेज़ी से हुआ मानो कोई आतंकी पकड़ा गया हो। अब्बास अंसारी कोई पहले विधायक नहीं हैं जिनके साथ ये मामला पेश आया हो योगी राज में इससे पहले…
कृष्ण प्रताप सिंह- कोई दो सौ साल पहले 1826 में 30 मई को बांग्ला और उर्दू के प्रभुत्व वाले कल्कत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित साप्ताहिक ‘उदंत मार्तंड’ के रूप में हिंदी को उसका पहला समाचार पत्र मिला तो उस पत्र की मुख्य चिंता हिंदुस्तानियों के भविष्य से जुड़ी हुई थी. हालांकि तब तक हिंदुस्तानियों में इतनी भी जागरूकता नहीं आई थी कि वह उनके बूते अपने पलने-बढ़ने के सपने देख सकता. दमनकारी सत्ता और उदासीन समाज द्वारा डाले गए दूसरे कई रोड़े भी उसके मार्ग को ऊबड़-खाबड़ बनाए हुए थे. इसके बावजूद उसे अपने सिद्धांतों व सरोकारों से समझौता गवारा…
22 अप्रैल 2025, पहलगाम एक खौफनाक दिन। कश्मीर की खूबसूरत वादियों में गोलियों की आवाज़ गूंजी, और कुछ ही मिनटों में 26 लोगों की ज़िंदगियां हमेशा के लिए खत्म हो गईं। चीखें थीं, अफरातफरी थी, खून था और सबसे ज़्यादा, इंसानियत की एक कड़ी परीक्षा थी। लेकिन जैसे ही यह ज़ख्म भरने की कोशिश कर रहा था, बीजेपी सांसद राम चंदर जांगड़ा ने उस ज़ख्म पर नमक नहीं, तेज़ाब छिड़क दिया। “हाथ जोड़ने से कोई छोड़ता नहीं” – ये शब्द हैं या ज़हर? पीड़ितों के परिवारों को सांत्वना देने के बजाय, सांसद ने कहा: “जिन महिलाओं ने अपने पति खोए,…
“फ्री फिलिस्तीन” लिखा, और एक साल के लिए बर्बाद कर दिए गए – RGNIYD में मुस्लिम छात्रों पर राष्ट्र-विरोध के नाम पर सुनियोजित शिकंजा!तिरंगे के नीचे “फ्री फिलिस्तीन” लिखना क्या देशद्रोह है? क्या “जय भीम” बोलना अब राष्ट्र-विरोध हो गया है? क्या सिर्फ़ मुसलमान छात्र बोलें, तो हर नारा ग़लत हो जाता है? तमिलनाडु के राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान (RGNIYD) ने इन सवालों का जवाब एक शर्मनाक फ़ैसले से दिया है – तीन मुस्लिम छात्रों को सिर्फ़ इसलिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि कथित रूप से उन्होंने “फ्री फिलिस्तीन” लिखा था। वो भी उस दिन, जब उनके फाइनल…
उसने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया था, फिर भी उसे मार दिया गया। यह कैसा न्याय है?” हरियाणा के पानीपत की सड़कों पर 24 साल का फिरदौस आलम सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि उसने एक टोपी पहन रखी थी — एक मुस्लिम पहचान का छोटा सा प्रतीक, जो उसकी जान ले बैठा। पी कोई हथियार नहीं होती। वह कोई धमकी नहीं होती। लेकिन नरेंद्र उर्फ “सुसु लाला” जैसे नफरत के पुजारियों के लिए वह पहचान ही गुनाह है। हत्या का कारण? मुसलमान होना। टोपी पहनना। 24 मई की रात, जब फिरदौस अपने दोस्तों के साथ एक खेल मैदान के पास…
अपूर्वानंद- अब धीरे-धीरे यह साफ़ होता जा रहा है कि अली ख़ान महमूदाबाद के बहाने अशोका यूनिवर्सिटी को घेरने की कोशिश की जा रही है. क्या उस पर पूरी तरह क़ब्ज़ा कर लिया जाएगा? क्या वह जेएनयू की तरह बर्बाद कर दिया जाएगा? इस आशंका का कारण है. इस बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठन, भाजपा, राजकीय संस्थान, सब मिलकर अशोका यूनिवर्सिटी पर हमला कर रहे हैं. खबर है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग ने 3 महीने पहले अशोका यूनिवर्सिटी के परिसर में दो विद्यार्थियों की मौत के स्पष्टीकरण के लिए हरियाणा पुलिस और प्रशासन को नोटिस भेजा है.…
24 मई 2025 को अलीगढ़ में एक तारीख़ जो फिर याद दिला गई कि भारत अब ‘भीड़तंत्र’ की गिरफ्त में है, और ‘हिंदुत्व के आतंकी’ खुलेआम सड़कों पर मुसलमानों का ‘फैसला’ कर रहे हैं। चार मुसलमान अरबाज़, अकील, कदीम और मुन्ना खान जिनका न कोई अपराध साबित हुआ, न अदालत ने कोई सज़ा सुनाई। लेकिन गोरक्षकों की भीड़ ने उन्हें निर्वस्त्र करके जानवरों की तरह पीटा। लाठी, डंडे, रॉड, ईंटें और धारदार हथियारों से उनका फैसला कर दिया … क्या यही है योगी का ‘रामराज्य’? क्या यही है मोदी का ‘नया भारत’? जब मांस के सारे बिल मौजूद थे, जब…