“लातूर का ट्रैफिक… रोज़ की सिरदर्दी बन चुका है। कहीं जाम, कहीं धक्का मुक्की, और कहीं पुलिस की सीटी। लेकिन सवाल ये है – ज़िम्मेदार कौन है?”
“पिछले दस-पंद्रह सालों में लातूर की आबादी लगभग दोगुनी हो गई है। प्रॉपर्टी के रेट आसमान छू रहे हैं। शहर में पैसे की कोई कमी नहीं – मनपा की आमदनी भी दोगुनी हो चुकी है। लेकिन सड़कों पर क्या बदला? ट्रैफिक वही का वही… या कहें और भी बुरा।””सिग्नल गायब…कैमरे बंद…और ट्रैफिक पुलिस? जहाँ दिखती है, वहाँ सिर्फ चालान और वसूली करते हुए – कभी रिंग रोड पे, कभी हाइवे पे। ये चेकिंग हो रही है या टारगेटेड वसूली? किसके कहने पर होती है? और क्या यही ट्रैफिक कंट्रोल का असली तरीका है?” “आज भी लातूर के आधे से ज़्यादा चौक बिना सिग्नल के चल रहे हैं। जहाँ सिग्नल हैं, वो बंद पड़े हैं। जहाँ कैमरे हैं, वो काम नहीं कर रहे। और जहाँ भीड़ है, वहाँ पुलिस नदारद है। तो फिर सवाल उठता है – मनपा और ट्रैफिक डिपार्टमेंट क्या रहे हैं?” “रही बात लातूर के वाहन चालकों की – तो चाहे टू व्हीलर हो, थ्री व्हीलर या फोर व्हीलर… ट्रैफिक रूल्स का पालन करने वाले न के बराबर हैं। जहाँ जाम लगा, वहीं से रॉंग साइड! फिर चाहे सामने वाला कितना भी सही चल रहा हो – जबरन उसकी साइट भी बंद कर देंगे। क्यों? क्योंकि सिस्टम सो रहा है।” “मनपा ने गोलाई से ठेले हटाए, लेकिन अब उनकी जगह रिक्शा वालों ने ले ली। नांदेड रोड की ओर गोलाई से लेकर अन्ना भाऊ साठे चौक तक, और मिर्ची लाइन कॉर्नर पर ऑटो वालों का इतना जाम रहता है कि वहां से होकर निकलना –किसी भी गाड़ी के लिए आसान नहीं है। मनो ये ट्रैफिक नहीं बल्कि जंग का मैदान हो ?””हर दो-तीन दिन में पुलिस आती है, सीटी बजती है, ठेले और ऑटो गायब हो जाते हैं…आधे घंटे बाद सब वापिस!
क्या यही है प्रशासन की कार्यवाही? या सिर्फ दिखावा?” “अगर लातूर का ट्रैफिक सुधारना है, तो अब सिर्फ बातें नहीं, ठोस और सख़्त कदम उठाने होंगे। जिसके लिए हमारे कुछ साफ़-साफ़ सुझाव हैं:” 1. हर चौराहे पर सिग्नल और चालू CCTV कैमरे लगाना ज़रूरी है। 2. सिग्नल तोड़ने और रूल्स तोड़ने वालों पर सीधी और सख़्त कार्रवाई हो। 3. हर भीड़ वाले इलाके में ऑटो रिक्शा के लिए तय स्टैंड और सख़्त चालान। 4. ठेले वालों को तय जगह दें, उसके बाद रोड पे दिखे तो कड़ी कार्यवाही करें। 5. हर कदम पर पारदर्शिता – वसूली नहीं, समाधान चाहिए। “अगर अब भी मनपा, ट्रैफिक डिपार्टमेंट और लातूर प्रशासन नहीं जागे, तो ये जाम, ये गड़बड़ी और ये अव्यवस्था – अभी की नहीं, आने वाले सालों की बर्बादी है। ये सिर्फ ट्रैफिक नहीं – ये सिस्टम की नाकामी है। और अब जवाबदेही जरूरी है।” “क्या आप भी लातूर की ट्रैफिक समस्या से परेशान हैं? क्या आप भी हर दिन जाम में फँस कर वक़्त और धैर्य खोते हैं? तो जिम्मेदारों तक ये आवाज़ पहुँचाएं। क्योंकि अब वक्त है – सिग्नल, स्टैंड और सिस्टम का! वरना लातूर की सड़कों पर सिर्फ जाम, धुआं और गुस्सा रहेगा।” “ये है जनता की आवाज़ – अब सिर्फ देखना नहीं, बोलना भी ज़रूरी है!