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Home»भारत

उर्स पर रोक, कुंभ पर करोड़ों! क्या यही है ‘सबका साथ-सबका विकास’?

adminBy adminJune 24, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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image credit : en.etemaaddaily.com
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जहाँ उर्स पर रोक है, वहाँ कुंभ पर अरबों खर्च हैं। क्या मुसलमान अब अपने बुज़ुर्गों को याद भी नहीं कर सकते? उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व की राजनीति अब महज़ नारों तक सीमित नहीं रही। यह अब लोगों की परंपराओं, आस्थाओं और सांझी विरासत पर सीधा हमला बन चुकी है। अयोध्या और बाराबंकी में उर्स की अनुमति न देना, और उसका “क़ानून-व्यवस्था” के नाम पर पक्षपातपूर्ण रद्द होना, इसी सिलसिले की अगली कड़ी है।

विश्व हिंदू परिषद की शिकायत और सरकार का झुकाव:-TOI की रिपोर्ट के अनुसार, अयोध्या के मसोधा इलाके में ‘दादा मियां उर्स’ पर विश्व हिंदू परिषद ने आपत्ति जताई। आरोप लगाया गया कि यह उर्स गाजी बाबा, यानी सैयद सालार मसूद गाजी के नाम पर हो रहा है। बस, फिर क्या था? स्थानीय प्रशासन ने अनुमति रद्द कर दी।

उधर बाराबंकी के फूलपुर में सैयद शकील बाबा के उर्स को भी अनुमति नहीं मिली — कारण बताया गया: “संभावित सांप्रदायिक तनाव”। इसी तरह मार्च में संभल का सदियों पुराना नेज़ा मेला, मई में बहराइच का जेठ मेला – सब पर रोक। परंपराएं रद्द, मगर भगवाधारी इवेंट्स को खुली छूट:-सवाल ये है कि क्या यही मापदंड हर धार्मिक आयोजन पर लागू होता है? क्या कांवड़ यात्रा, रामनवमी की शोभायात्राएं, या हरिद्वार-कुंभ जैसे आयोजनों में कभी ‘संभावित तनाव’ या ‘भीड़ नियंत्रण’ का बहाना बनाया गया?

हरिद्वार कुंभ (2021) में करोड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई। कोरोना की दूसरी लहर को हवा देने वाले इस आयोजन पर सरकार ने अरबों रुपये खर्च किए – सरकारी खजाने से, यानी हमारे-आपके टैक्स के पैसे से। Rs. 850 करोड़ से ज़्यादा की सरकारी सब्सिडी। रेलवे स्टेशन और सड़कों का रिनोवेशन। मुफ्त स्वास्थ्य कैंप। सुरक्षा बलों की भारी तैनाती। लेकिन जब बात मुस्लिम समाज की होती है, तब राज्य का रवैया एकदम बदल जाता है। उर्स पर ‘तनाव’ का डर, दरगाहों पर ऐतिहासिकता पर सवाल, और सदियों पुराने मेलों पर प्रतिबंध!

गाजी मियां बनाम सुहेलदेव: इतिहास का सांप्रदायिक दोहन:- सैयद सालार मसूद गाजी को मुस्लिम समाज एक सूफी संत, एक योद्धा, और ‘गाजी मियां’ के तौर पर श्रद्धा से याद करता है। मगर संघ परिवार ने उन्हें एक ‘लुटेरा’ और ‘आक्रांता’ घोषित कर दिया है। दूसरी ओर, महाराजा सुहेलदेव को एक वीर हिंदू रक्षक बताकर उन्हें राजभर और पासी समुदायों में नायक की तरह गढ़ा गया है। बहराइच में सुहेलदेव का स्मारक, उनके नाम पर सुपरफास्ट ट्रेन, विश्वविद्यालय, और डाक टिकट – यह सब उस व्यक्ति के खिलाफ खड़ा किया गया है जिसे लाखों मुसलमान आज भी गाज़ी मियां कहकर सम्मान देते हैं।

क्या सिर्फ बहुसंख्यकों की आस्था ही राष्ट्र की आस्था है?:- अगर राम मंदिर पर करोड़ों खर्च हो सकते हैं, अगर प्रयागराज कुंभ के नाम पर सरकारी मशीनरी झोंकी जा सकती है, तो सैयद गाजी मियां के मेले, दादा मियां के उर्स, या नेज़ा मेलों पर रोक क्यों? क्या यह भारत के संविधान की धार्मिक स्वतंत्रता की भावना का उल्लंघन नहीं है? क्या अब ‘क़ानून-व्यवस्था’ का मतलब है: जो हिंदू बहुसंख्यक समाज को असहज लगे, उसे प्रतिबंधित कर दो?

सांझी विरासत को मिटाने की कोशिश:- गाजी मियां का मेला सिर्फ मुसलमानों का धार्मिक आयोजन नहीं है। इसमें हिंदू दलित समुदाय, पिछड़ी जातियों के लोग, और ग्रामीण समाज भी हिस्सा लेते रहे हैं। यह मेलों की वो परंपरा है जो मज़हब से परे इंसानियत और आस्था को जोड़ती थी। मगर संघ-भाजपा का एजेंडा साफ़ है — हर उस सांझी परंपरा को मिटा दो जो उनके ‘हिंदू राष्ट्र’ की कट्टर परिकल्पना के खिलाफ जाती हो।

भारत में अब धार्मिक स्वतंत्रता, बराबरी और सांझी संस्कृति का दम घोंटा जा रहा है। एक तरफ भगवा झंडों के नीचे निकली हिंसक शोभायात्राएं ‘संस्कृति’ कहलाती हैं, वहीं सूफी संतों के नाम पर उर्स ‘सांप्रदायिक तनाव’ की वजह बनते हैं। ये कैसा ‘विकास’ है जिसमें ट्रेन, स्टैचू और डाक टिकट तो सुहेलदेव के नाम के बनते हैं, लेकिन गाज़ी मियां की याद में मेला लगाना गुनाह बन जाता है? सवाल सिर्फ एक है — क्या भारत अब सभी धर्मों के लिए बराबर का देश रहा भी है, या सिर्फ एक धर्म के वर्चस्व का अखाड़ा बनता जा रहा है? अगर आपको यह लेख असरदार लगा, तो इसे साझा करें। क्योंकि चुप रहना अब विकल्प नहीं है।

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