जब एक देश शैक्षणिक किताबों से डरने लगे, और मस्जिद की अज़ान से घबराने लगे – समझ लीजिए वह सिर्फ एक ज़ायोनी हुकूमत नहीं, एक मानवता-विरोधी विचारधारा बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र की ललकार और इज़रायल की बेशर्मी:- संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की ताज़ा रिपोर्ट ने वो सब उजागर कर दिया है जिसे ज़मीन पर हर फिलिस्तीनी बच्चा, हर माँ और हर ज़ख्मी शिक्षक रोज़ जी रहा है इज़रायल सिर्फ लड़ाई नहीं लड़ रहा, वो एक पूरी क़ौम को ‘मिटाने’ का अभियान चला रहा है।
इस रिपोर्ट में साफ़ कहा गया है कि इज़रायली सेना ने ग़ाज़ा के स्कूलों, मस्जिदों और धार्मिक स्थलों को जानबूझकर निशाना बनाया, और ये कोई युद्ध की चूक नहीं, बल्कि नरसंहार की सुनियोजित रणनीति है। ग़ाज़ा में 90% से ज़्यादा स्कूल और यूनिवर्सिटी की इमारतें तबाह कर दी गई हैं। आधे से अधिक धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल जमींदोज़ कर दिए गए।
शिक्षा, संस्कृति और धर्म – तीनों को मिटाने की साज़िश:- जब टैंक एक स्कूल पर चढ़कर उसकी दीवारों को चीरता है, तो सिर्फ ईंटें नहीं गिरतीं, एक पूरी नस्ल का भविष्य खून से रंग जाता है। क्या कोई सभ्य दुनिया इस अपराध को मूक दर्शक बनकर देखती रहेगी? संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, ये हमले सिर्फ भौतिक संरचनाओं पर नहीं थे। यह फिलिस्तीनियों की शिक्षा, संस्कृति और आत्मनिर्णय के अधिकार पर हमला था। यानी आने वाली पीढ़ियों को जानबूझकर ‘ग़ुलाम’ बनाने की साजिश।
बचपन की कब्रगाह बनता ग़ाज़ा:- ग़ाज़ा के बच्चे आज बचपन नहीं जीते, वो लाशें गिनना, मलबा हटाना और अपने भाई-बहनों की चीखें सुनना सीखते हैं। स्कूलों के नाम पर सिर्फ खंडहर बचे हैं। क्लासरूम अब मुर्दाघर बन चुके हैं। बच्चों ने अपना बचपन खो दिया है, रिपोर्ट में कहा गया है। अब उनकी ज़िंदगी हमलों, अनिश्चितता, भुखमरी और अमानवीय हालात से लड़ते हुए कट रही है।
क्या ये केवल ‘युद्ध’ है, या एक ‘नस्लीय सफ़ाया’?:- इज़रायल सरकार का ये कहना कि वह ‘हमास से लड़ रहा है’, अब एक खोखला मज़ाक बन चुका है। स्कूलों में हमास नहीं पढ़ाता, वहां बच्चे पढ़ते हैं। मस्जिदों से रॉकेट नहीं चलते, वहां दुआएं उठती हैं।
तो फिर यह बर्बरता क्यों? इस रिपोर्ट में एक बेहद गंभीर चेतावनी दी गई है – कि यह सब कुछ नरसंहार की मंशा को दर्शा सकता है। यानी ये महज़ ‘कोलैटरल डैमेज’ नहीं, बल्कि एक योजनाबद्ध ‘जातीय सफाया’ है।
इज़रायल का अहंकार, दुनिया की चुप्पी:- इज़रायल ने इस रिपोर्ट को खारिज़ करते हुए संयुक्त राष्ट्र को “यहूदी विरोधी और आतंकवाद समर्थक संस्था” कहा है। क्या आज हर वो आवाज़ जो ज़ुल्म के खिलाफ उठे, उसे ‘यहूदी विरोधी’ कह देना ही नीति बन गई है? दुनिया की चुप्पी इस ज़ुल्म की साझेदार बन चुकी है। अरब देश ‘व्यापार’ में मशगूल हैं, और पश्चिम ‘डिप्लोमेसी’ में। लेकिन एक पूरा मज़हब, एक कौम, एक नस्ल धीरे-धीरे मिटाई जा रही है और हम सब गूंगे दर्शक बने बैठे हैं। हमारी ज़िम्मेदारी क्या है?:- अगर आज हम चुप हैं, तो यक़ीन मानिए कल हमारी मस्जिदें, हमारे स्कूल, और हमारे बच्चों की किताबें भी इन्हीं टैंकों के नीचे होंगी। फिलिस्तीन की लड़ाई सिर्फ एक भूगोल की नहीं, इंसानियत के अस्तित्व की लड़ाई है।
इज़रायली उत्पादों का बहिष्कार करें। सोशल मीडिया पर इन रिपोर्ट्स को ज़्यादा से ज़्यादा फैलाएं। अपने नेताओं से जवाब मांगें – उनकी चुप्पी क्या किसी सौदे की कीमत है? जब स्कूलों को युद्ध के मैदान बना दिया जाए, और किताबों को निशाना बनाया जाए, समझ लीजिए कि ये लड़ाई ज़मीन की नहीं, इंसानियत की कब्र खोदने की कोशिश है। इज़रायल ने जो किया है, वह केवल जंग नहीं – वह इतिहास के पन्नों में काले अक्षरों में दर्ज होने वाला एक नरसंहार है। और अगर हम अब भी खामोश हैं — तो दोषी सिर्फ ज़ायोनी ताक़तें नहीं, बल्कि हम भी हैं।