वक्फ ऐसी अमानत है, जिसे किसी व्यक्ति, परिवार, समूह या संस्था की निजी संपत्ति नहीं माना जा सकता। जब कोई व्यक्ति अपनी जमीन या दूसरी संपत्ति अल्लाह की रजा और किसी धार्मिक, सामाजिक या जनकल्याण के काम के लिए वक्फ करता है, तो वह संपत्ति एक पवित्र अमानत बन जाती है। इस अमानत की हिफाजत करना, वक्फ करने वाले की मंशा का सम्मान करना और संपत्ति का इस्तेमाल उसी मकसद के लिए करना वक्फ बोर्ड की मुख्य जिम्मेदारी है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
लेकिन जब यही संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से हटकर निजी फायदे, गुटबाजी या राजनीतिक दबाव के हिसाब से काम करने लगें, तो मामला सिर्फ दफ्तर की लापरवाही तक सीमित नहीं रहता। इससे वक्फ की मूल भावना और मकसद ही प्रभावित होता है। आज वक्फ बोर्ड के कुछ फैसलों और कामकाज को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। इन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं है। अगर किसी व्यक्ति या समूह ने अपनी संपत्ति किसी खास धार्मिक मकसद के लिए वक्फ की है, तो उस वक्फ की कमेटी बनाते समय वक्फ करने वाले की मंशा, वक्फनामे की शर्तें और कानून को सबसे ज्यादा महत्व मिलना चाहिए।
सिर्फ अपने प्रशासनिक अधिकार का इस्तेमाल करके ऐसे लोगों को कमेटी में शामिल करना, जो वक्फ की शर्तों या उसकी मूल भावना से मेल नहीं खाते, संबंधित लोगों में बेचैनी पैदा कर सकता है। इससे वक्फ के असली मकसद पर भी सवाल उठते हैं। यह बात साफ तौर पर समझने की जरूरत है कि वक्फ बोर्ड को अधिकार अमानत की हिफाजत के लिए मिला है, अमानत का मकसद बदलने के लिए नहीं। बोर्ड को देखना चाहिए कि वक्फ करने वाले ने संपत्ति किस मकसद से वक्फ की थी, वक्फनामे में क्या शर्तें लिखी थीं और उन शर्तों के मुताबिक कौन लोग मुतवल्ली या ट्रस्टी बनने के हकदार हैं।
अफसोस की बात है कि कुछ मामलों में लंबे समय से वक्फ की सेवा कर रहे असली ट्रस्टियों या मुतवल्लियों की बात को नजरअंदाज करके ऐसे लोगों की योजनाएं मंजूर किए जाने के आरोप सामने आते हैं, जिनका वक्फ से संबंध या प्रतिनिधित्व खुद सवालों के घेरे में है। अगर किसी मामले में ऐसा हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। क्योंकि किसी योजना की मंजूरी केवल कागजी कार्रवाई नहीं होती। इसके जरिए वक्फ की जमीन, उसकी आमदनी और भविष्य के प्रबंधन का रास्ता तय होता है।
मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब किसी अदालत का साफ आदेश मौजूद हो और उसके बावजूद कोई संस्था या अधिकारी ऐसा फैसला करे, जो अदालत के आदेश के खिलाफ हो। अगर किसी अदालत के आदेश को समझने या लागू करने के तरीके को लेकर कोई मतभेद है, तो उसके लिए कानूनी रास्ता मौजूद है। लेकिन अपनी मर्जी से अदालत के आदेश को नजरअंदाज करना किसी भी सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्था की सामान्य प्रशासनिक आजादी नहीं हो सकती। वक्फ के मामलों में राजनीतिक दखल का आरोप भी बेहद चिंता की बात है।
अगर फैसले इस आधार पर होने लगें कि कौन प्रभावशाली है, किससे राजनीतिक फायदा मिल सकता है या कौन किसी ताकतवर व्यक्ति के करीब है, तो फिर वक्फ की अमानतदारी कहां रह जाएगी? वक्फ बोर्ड किसी राजनीतिक दल, समूह या प्रभावशाली व्यक्ति को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि वक्फ की धार्मिक, कानूनी और प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने के लिए बनाया गया है।
यह भी जरूरी है कि वक्फ के मामलों को सिर्फ मजहबी या संप्रदाय के विवाद के रूप में न देखा जाए। असल सवाल यह होना चाहिए कि वक्फ करने वाले की मंशा क्या थी? वक्फनामे में क्या शर्तें हैं? कानून क्या कहता है? और अदालत का फैसला क्या है? अगर इन चारों सवालों के जवाब साफ हैं, तो फैसला भी उन्हीं के मुताबिक होना चाहिए।
वक्फ की संपत्तियां आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमानत हैं। इनकी आमदनी से मस्जिदें, मदरसे, कब्रिस्तान, खानकाहें, शिक्षण संस्थाएं, अनाथ बच्चों और जरूरतमंदों की मदद जैसे कई धार्मिक और सामाजिक काम किए जाते हैं। इन संपत्तियों के प्रबंधन में थोड़ी सी लापरवाही भी भविष्य में बड़ा नुकसान कर सकती है। इसलिए वक्फ बोर्ड के फैसलों में पारदर्शिता, निष्पक्षता और कानून का पालन बहुत जरूरी है। जरूरत इस बात की है कि वक्फ बोर्ड के सभी महत्वपूर्ण फैसलों का रिकॉर्ड साफ और पारदर्शी रखा जाए।
असली ट्रस्टियों और मुतवल्लियों को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया जाए। वक्फनामे की शर्तों का सम्मान किया जाए। किसी भी तरह के मजहबी या गुटीय पक्षपात से ऊपर उठकर फैसले लिए जाएं और अदालत के आदेशों का पूरी तरह पालन किया जाए। अगर किसी अधिकारी, सदस्य या जिम्मेदार व्यक्ति पर गड़बड़ी का आरोप है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यह मांग किसी एक मजहब, समूह या संगठन के पक्ष में नहीं है। यह वक्फ की पवित्रता, कानून की सर्वोच्चता और ईमानदारी के पक्ष में है।
वक्फ बोर्ड के जिम्मेदार लोगों को यह याद रखना चाहिए कि उनके सामने सिर्फ संपत्तियों की फाइलें नहीं होतीं। उन फाइलों के पीछे वक्फ करने वाले की नीयत, लोगों की धार्मिक भावनाएं, जनता के अधिकार और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य जुड़ा होता है। इसलिए हर फैसला लेते समय एक सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या यह फैसला वक्फ करने वाले की मंशा के मुताबिक है, या किसी व्यक्ति, समूह, निजी हित या राजनीतिक फायदे के लिए? अगर जवाब पहला है, तो फैसला मजबूत आधार पर है। लेकिन अगर दूसरा जवाब सामने आता है, तो चुप रहना भी एक बड़ी नाइंसाफी बन सकता है।
वक्फ की अमानत में सबसे ज्यादा अहमियत वक्फ करने वाले की मंशा, कानून की पाबंदी और हकदारों के अधिकार की है। इन तीनों को नजरअंदाज करके लिया गया कोई भी फैसला, चाहे वह कितने ही कागजी दस्तावेजों के साथ क्यों न लिया गया हो, नैतिक और प्रशासनिक तौर पर सवालों के घेरे में रहेगा। अब वक्फ बोर्ड को यह साबित करना होगा कि वह वास्तव में वक्फ का रखवाला है, किसी खास हित का रखवाला नहीं।
वक्फ बोर्ड में बढ़ती गड़बड़ियां… शिकायत से फैसले तक
वक्फ के मामलों में पारदर्शिता और निष्पक्षता इसलिए बहुत जरूरी है, क्योंकि यहां किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति का नहीं, बल्कि एक धार्मिक, सामाजिक और सार्वजनिक अमानत का मामला होता है। इसलिए वक्फ से जुड़े किसी भी विवाद में हर पक्ष को अपनी बात रखने, दस्तावेज पेश करने और अपनी शिकायत या अपील संबंधित अधिकारी तक पहुंचाने का पूरा मौका मिलना चाहिए। लेकिन अगर एक पक्ष की शिकायत या आपत्ति को सुने बिना ही मामला आगे बढ़ा दिया जाए, तो इंसाफ का बुनियादी सिद्धांत ही प्रभावित होता है।
दूसरे पक्ष को सुने बिना फैसला क्यों?
किसी भी कानूनी या प्रशासनिक कार्रवाई में दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का बराबर मौका मिलना चाहिए। वक्फ की संपत्ति से जुड़ी किसी योजना, मुतवल्ली की नियुक्ति, प्रशासनिक कमेटी की मंजूरी या किसी दूसरे महत्वपूर्ण मामले में अगर एक पक्ष की बात मान ली जाए और दूसरे पक्ष की शिकायत या आपत्ति फाइल में मौजूद होने के बावजूद उसे सुना ही न जाए, तो ऐसे फैसले की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
असल सवाल यह है कि क्या फैसला सभी तथ्यों और दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद लिया गया? अगर किसी पक्ष के पास वक्फनामा, अदालत का आदेश, पहले के प्रशासनिक फैसले, ट्रस्टी होने का प्रमाण या दूसरे जरूरी दस्तावेज मौजूद हैं, तो उन्हें देखे बिना फैसला करना इंसाफ के मुताबिक नहीं हो सकता।
शिकायत दर्ज हुई, लेकिन अधिकारी तक पहुंची ही नहीं!
सबसे ज्यादा चिंता की बात तब होती है, जब कोई नागरिक, मुतवल्ली या ट्रस्टी बाकायदा शिकायत या अपील करता है, लेकिन वह शिकायत संबंधित अधिकारी या सक्षम अधिकारी तक पहुंचने से पहले ही दफ्तर में कहीं रुक जाती है। सिर्फ दफ्तर में आवेदन जमा हो जाना काफी नहीं है।जरूरी यह है कि:आवेदन का सही तरीके से रिकॉर्ड बने। वह संबंधित अधिकारी तक पहुंचे।उस पर कार्रवाई हो।
आवेदक को कार्रवाई की जानकारी दी जाए। अगर शिकायतों को जानबूझकर रोकने, दबाने या संबंधित अधिकारी तक नहीं पहुंचाने की बातें सही साबित होती हैं, तो यह सिर्फ दफ्तर की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम के लिए गंभीर खतरे की बात है। एक आम आदमी के लिए वक्फ बोर्ड के बड़े अधिकारियों तक सीधे पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता। वह अपने कागजात, आवेदन और उम्मीद लेकर दफ्तर आता है। अगर उसका आवेदन मेज से आगे ही न जाए, तो वह इंसाफ के लिए कहां जाए?
कर्मचारियों की लापरवाही… सिस्टम की कमजोरी
वक्फ बोर्ड के हर कर्मचारी की जिम्मेदारी सिर्फ फाइल आगे बढ़ाना नहीं है। उसे कानून और तय प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार काम करना चाहिए। फाइल को बेवजह रोकना, आवेदन पर समय पर कार्रवाई न करना, दस्तावेजों की सही जांच न करना, पक्षों को जानकारी न देना या रिकॉर्ड सही तरीके से सुरक्षित न रखना-ये ऐसी लापरवाहियां हैं, जो किसी के अधिकार और किसी के हित को सीधे प्रभावित कर सकती हैं।
एक छोटी सी दफ्तर की लापरवाही कभी-कभी किसी बड़ी संपत्ति के भविष्य का फैसला बन जाती है। इसलिए वक्फ बोर्ड में जवाबदेही का मजबूत सिस्टम होना चाहिए। हर आवेदन की प्राप्ति, उसकी वर्तमान स्थिति, संबंधित अधिकारी और कार्रवाई की तारीख का रिकॉर्ड साफ होना चाहिए, ताकि किसी आवेदन को महीनों या वर्षों तक फाइलों में दबाकर न रखा जा सके।
रिश्वत के आरोप… जांच क्यों नहीं?
अगर वक्फ बोर्ड के किसी कर्मचारी पर रिश्वत लेने या मांगने का आरोप लगता है, तो उसे केवल यह कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि यह सिर्फ आरोप है। लेकिन दूसरी तरफ बिना सबूत किसी व्यक्ति को भ्रष्ट कहना भी सही नहीं है। जरूरत इस बात की है कि ऐसे आरोपों की निष्पक्ष और भरोसेमंद जांच हो।
अगर आरोप गलत साबित होता है, तो संबंधित कर्मचारी की प्रतिष्ठा बहाल होनी चाहिए। और अगर आरोप सही साबित होता है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वक्फ की फाइल किसी कर्मचारी के लिए कमाई का निजी जरिया नहीं बन सकती। किसी आवेदक से उसके जायज काम के लिए गैरकानूनी पैसा मांगना उस अमानत के साथ बेईमानी है, जिसकी रक्षा की जिम्मेदारी संस्था पर है।
शिकायत की व्यवस्था सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर भी प्रभावी हो
वक्फ बोर्ड में ऐसा शिकायत सिस्टम होना चाहिए जिसमें हर शिकायत और अपील का सही रिकॉर्ड हो।आवेदक को रसीद और एक संदर्भ नंबर दिया जाए।शिकायत संबंधित अधिकारी तक जरूर पहुंचे। दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का उचित मौका मिले। कार्रवाई की समय-सीमा तय हो। आवेदन की वर्तमान स्थिति पता करने की सुविधा हो। शिकायत रोकने या दबाने वाले कर्मचारी की निगरानी हो। रिश्वत और भ्रष्टाचार की शिकायत के लिए सुरक्षित व्यवस्था हो। अंतिम फैसले की वजह लिखित रूप में दर्ज की जाए। ये कदम सिर्फ दफ्तर की सुविधा के लिए नहीं हैं, बल्कि एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था के लिए जरूरी हैं।
वक्फ बोर्ड को लोगों का भरोसा वापस जीतना होगा
वक्फ बोर्ड पर जनता का भरोसा तभी कायम रह सकता है, जब लोगों को यकीन हो कि उनकी बात सुनी जाएगी, उनका आवेदन फाइल में गुम नहीं होगा, किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में उनका अधिकार नहीं छीना जाएगा और अगर कोई कर्मचारी गैरकानूनी फायदा लेने की कोशिश करेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। वक्फ के मामलों में ताकतवर और कमजोर, प्रभावशाली और आम आदमी-सभी के लिए एक जैसा नियम होना चाहिए। अगर एक पक्ष की बात तुरंत सुन ली जाए और दूसरे की शिकायत को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसलिए जरूरत इस बात की है कि वक्फ बोर्ड सिर्फ संपत्तियों का प्रबंधन करने वाली संस्था न रहे, बल्कि इंसाफ, पारदर्शिता, जवाबदेही और वक्फ करने वाले की मंशा का सच्चा रखवाला बने। क्योंकि वक्फ की हिफाजत सिर्फ जमीन और इमारत की हिफाजत नहीं है। यह उस अमानत की हिफाजत है, जिसे किसी व्यक्ति ने अपनी निजी संपत्ति से अलग करके एक खास मकसद के लिए अल्लाह की राह में दे दिया है।
इस अमानत के साथ भ्रष्टाचार, पक्षपात, राजनीतिक दखल, रिश्वत या दफ्तर की लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। वक्फ की फाइल में सिर्फ कागज नहीं होते। उन कागजों के पीछे किसी वक्फ करने वाले की नीयत, किसी संस्था का भविष्य और जनता के अधिकार जुड़े होते हैं।
म. मुस्लिम कबीर, लातूर
8208435414
Read Next :
10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?