Close Menu
Elaan NewsElaan News
  • Elaan Calender App
  • एलान के बारे में
  • विदेश
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • एलान विशेष
  • लेख / विचार
Letest

मलाला की किताब से इतना डर क्यों? यह सिर्फ एक किताब नहीं, सोच की आज़ादी का सवाल है

September 6, 2026

विदेश में ‘एकता’ का संदेश, देश में नफ़रत की राजनीति पर खामोशी

September 5, 2026

आरएसएस पर अमेरिका में बवाल: आखिर नफ़रत और जातिवाद की राजनीति से देश कब आज़ाद होगा?

August 28, 2026
Facebook X (Twitter) Instagram
Trending
  • मलाला की किताब से इतना डर क्यों? यह सिर्फ एक किताब नहीं, सोच की आज़ादी का सवाल है
  • विदेश में ‘एकता’ का संदेश, देश में नफ़रत की राजनीति पर खामोशी
  • आरएसएस पर अमेरिका में बवाल: आखिर नफ़रत और जातिवाद की राजनीति से देश कब आज़ाद होगा?
  • वक्फ बोर्ड में बढ़ती धांधलियां… वक्फ की असली मंशा पर निजी हित भारी
  • 10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?
  • मोहन भागवत का विदेश दौरा और आरएसएस पर अंतरराष्ट्रीय सवाल
  • तीन आदिवासी बच्चियों की मौत और ‘विकास’ का दावा: जब बिस्तर तक न मिले तो कैसा विकास?
  • विदेशी चंदे के नाम पर नियंत्रण या नागरिक संस्थाओं पर नई शिकंजाकशी?
Facebook Instagram YouTube
Elaan NewsElaan News
Subscribe
Sunday, September 6
  • Elaan के बारे में
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • विदेश
  • Elaan विशेष
  • लेख विचार
  • ई-पेपर
  • कैलेंडर App
  • Video
  • हिन्दी
    • English
    • हिन्दी
    • اردو
Elaan NewsElaan News
Home»भारत

मलाला की किताब से इतना डर क्यों? यह सिर्फ एक किताब नहीं, सोच की आज़ादी का सवाल है

parsh chavanBy parsh chavanSeptember 6, 2026 भारत No Comments6 Mins Read
Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email WhatsApp Copy Link
malala
Share
Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email WhatsApp

मलाला की किताब से इतना डर क्यों? सवाल सिर्फ एक किताब का नहीं, सोच की आज़ादी का है

अहमदाबाद में मलाला यूसुफज़ई और ऐन फ्रैंक की किताबों की रीडिंग को लेकर हुआ विवाद सिर्फ एक स्कूल या एक किताब का मामला नहीं है। यह घटना उस बड़े सवाल को सामने लाती है कि आखिर हमारे देश में बच्चों को क्या पढ़ना चाहिए और यह तय करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए?

क्या पढ़ना = स्वीकार करना?

खबर के मुताबिक, अहमदाबाद के एक स्कूल की रीडिंग लिस्ट में मलाला यूसुफज़ई की आत्मकथा ‘आई एम मलाला’ और ऐन फ्रैंक की ‘द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल’ शामिल थीं। कुछ अभिभावकों और दक्षिणपंथी संगठनों ने इसका विरोध किया। विरोध के बाद स्कूल ने दोनों किताबों को अनिवार्य रीडिंग लिस्ट से हटा दिया।

बाद में, जब नागरिकों और छात्रों के एक समूह ने इन किताबों की सार्वजनिक रीडिंग आयोजित की, तो वहाँ कथित तौर पर हंगामा और मारपीट तक की नौबत आ गई।

सबसे पहला सवाल यह है कि आखिर मलाला की आत्मकथा पढ़ाने में ऐसी क्या आपत्ति है? क्या किसी किताब को पढ़ लेना, उसमें लिखी हर बात को स्वीकार कर लेना होता है? अगर ऐसा है, तो फिर स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इतिहास, राजनीति, दर्शन और साहित्य की किताबें पढ़ाने का मतलब ही क्या रह जाता है?

मलाला की कहानी सिर्फ पाकिस्तान की नहीं

मलाला पाकिस्तान की लड़की है, लेकिन उसकी कहानी केवल पाकिस्तान की कहानी नहीं है। उसने लड़कियों की शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष किया, तालिबान के हमले का सामना किया और दुनिया भर में शिक्षा के अधिकार की आवाज बनी।

कोई व्यक्ति मलाला के विचारों से असहमत हो सकता है, उसकी राजनीति या बयानों की आलोचना कर सकता है। लेकिन क्या असहमति का जवाब किताब बंद करके दिया जाएगा?

अगर मलाला की किताब में कोई बात गलत है, तो बच्चों को वह पढ़ाकर उसके सही-गलत पर चर्चा क्यों नहीं कराई जा सकती? यही तो शिक्षा का उद्देश्य है – कि बच्चे केवल वही न पढ़ें जिससे हम सहमत हैं, बल्कि अलग-अलग विचारों को पढ़ें, समझें, सवाल करें और फिर अपनी राय बनाएं।

भारतीय साहित्य की समृद्धि का सवाल

यहाँ दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल भी है – क्या हमारे देश में लेखकों और विचारकों की कमी है? बिल्कुल नहीं।

भारत का साहित्य हजारों वर्षों की विचार परंपरा से भरा पड़ा है। कबीर हैं, तुलसीदास हैं, प्रेमचंद हैं, महादेवी वर्मा हैं, रवींद्रनाथ टैगोर हैं, भगत सिंह हैं, डॉ. आंबेडकर हैं, महात्मा गांधी हैं, सावित्रीबाई फुले हैं, जवाहरलाल नेहरू हैं और अनगिनत अन्य विचारक हैं।

तो फिर सवाल उठाना स्वाभाविक है कि जब भारतीय लेखकों की इतनी समृद्ध विरासत मौजूद है, तो मलाला की किताब को अनिवार्य रीडिंग में शामिल करने की ज़रूरत क्यों पड़ी?

यह सवाल उठना गलत नहीं है, लेकिन इसका जवाब भी उतना ही महत्वपूर्ण है – किसी विदेशी लेखक की किताब पढ़ना भारतीय साहित्य की उपेक्षा नहीं है। अगर हम दुनिया के दूसरे समाजों को समझना चाहते हैं, तो हमें दूसरे देशों के लेखकों को भी पढ़ना होगा।

ऐन फ्रैंक की डायरी – एक उदाहरण

ऐन फ्रैंक की डायरी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक छोटी-सी लड़की की डायरी नाजी शासन और यहूदियों के उत्पीड़न के दौर की दुनिया को समझने का ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन गई। क्या उसे पढ़ना इसलिए गलत होगा क्योंकि ऐन फ्रैंक भारत की नहीं थीं?

अगर यही तर्क स्वीकार कर लिया जाए, तो फिर दुनिया का कोई साहित्य भारतीय बच्चों के लिए उपयोगी नहीं रहेगा।

समस्या किताब में नहीं, डर में है

समस्या किताब में नहीं, किताब से पैदा होने वाली सोच में डर की है। जिस समाज में बच्चों को सवाल पूछने से रोका जाता है, वहाँ धीरे-धीरे सवाल करने की क्षमता खत्म होने लगती है। और जिस समाज में सवाल खत्म हो जाएं, वहाँ अंधविश्वास और कट्टरता के लिए जगह बढ़ती जाती है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब किताबों के चुनाव पर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों का दबाव दिखाई देने लगा है। स्कूल में कौन-सी किताब पढ़ाई जाए, यह फैसला शिक्षाविदों, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच शैक्षणिक चर्चा का विषय होना चाहिए।

यदि किसी किताब में आपत्तिजनक या तथ्यात्मक रूप से गलत सामग्री है, तो शिक्षा विभाग, विशेषज्ञ और स्कूल प्रबंधन उस पर फैसला कर सकते हैं। लेकिन डंडे, धमकी और कथित मारपीट से किताब का विरोध करना शिक्षा नहीं, असहमति को दबाने की कोशिश है।

किताब हटाने से विचार नहीं मिटता

यह भी याद रखना चाहिए कि मलाला की किताब को हटाने से मलाला का विचार खत्म नहीं हो जाएगा। किसी पुस्तक को रीडिंग लिस्ट से हटाया जा सकता है, लेकिन सवाल पूछने की आदत को इतनी आसानी से नहीं हटाया जा सकता।

हमें यह तय करना होगा कि हम बच्चों के हाथ में किताब देना चाहते हैं या केवल अपनी पसंद की विचारधारा?

बच्चों को विकल्प दीजिए, आदेश नहीं

अगर बच्चा मलाला को पढ़ता है, तो उसे भगत सिंह को भी पढ़ाइए। आंबेडकर को पढ़ाइए। सावित्रीबाई फुले को पढ़ाइए। प्रेमचंद को पढ़ाइए। गांधी को पढ़ाइए। टैगोर को पढ़ाइए। और साथ ही ऐन फ्रैंक को भी पढ़ने दीजिए।

बच्चे को विकल्प दीजिए, आदेश नहीं। क्योंकि मजबूत शिक्षा वह नहीं होती जिसमें बच्चे केवल वही पढ़ते हैं जो सत्ता, समाज या कोई संगठन उन्हें पढ़ाना चाहता है। मजबूत शिक्षा वह होती है जिसमें बच्चा अलग-अलग विचार पढ़कर खुद तय करता है कि सच क्या है, गलत क्या है और उसे किससे सहमत होना है।

अहमदाबाद की घटना – बहस यह होनी चाहिए

इसलिए, अहमदाबाद की घटना पर बहस सिर्फ यह नहीं होनी चाहिए कि ‘आई एम मलाला’ पढ़ाई जाए या नहीं। बहस यह होनी चाहिए:

क्या भारत के स्कूलों में किताबों का फैसला ज्ञान और शिक्षा के आधार पर होगा, या राजनीतिक दबाव और भीड़ की ताकत के आधार पर?

विरोध करने वालों से एक सवाल

और एक सवाल उन लोगों से भी, जो मलाला की किताब का विरोध कर रहे हैं – अगर किताब में कोई गलती है, तो बच्चों को वह गलती समझाने के बजाय किताब हटाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

भारत की ताकत उसकी विविधता और उसकी विशाल ज्ञान परंपरा है। हमें अपने लेखकों पर गर्व होना चाहिए, लेकिन दुनिया की किताबों से डरना नहीं चाहिए।

क्योंकि किताब का जवाब दूसरी किताब होती है, डंडा नहीं।
और शिक्षा का जवाब बहस होती है, हिंसा नहीं।

बच्चों को तय किताबें नहीं, सोचने की आज़ादी दीजिए, क्योंकि जिस दिन किताबों से डर पैदा हो गया, उस दिन समाज में सवालों से भी डर पैदा हो जाएगा।

अभिव्यक्ति की आज़ादी अहमदाबाद विवाद आई एम मलाला ऐन फ्रैंक किताबों पर विवाद डायरी ऑफ ए यंग गर्ल बच्चों की किताबें भारतीय साहित्य मलाला यूसुफज़ई राजनीतिक दबाव शिक्षा की आज़ादी शिक्षा में सेंसरशिप सोच की आज़ादी स्कूल रीडिंग लिस्ट
Share. Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email WhatsApp Copy Link
parsh chavan
  • Website

Keep Reading

विदेश में ‘एकता’ का संदेश, देश में नफ़रत की राजनीति पर खामोशी

10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?

मोहन भागवत का विदेश दौरा और आरएसएस पर अंतरराष्ट्रीय सवाल

विदेशी चंदे के नाम पर नियंत्रण या नागरिक संस्थाओं पर नई शिकंजाकशी?

प्रेस क्लब में ‘मोदी चालीसा’: पत्रकारिता के मंच पर व्यक्तिपूजा का सवाल

कांवड़ के नाम पर कानून का राज कमजोर क्यों पड़ रहा है?

Add A Comment
Leave A Reply Cancel Reply

Latest Post
  • मलाला की किताब से इतना डर क्यों? यह सिर्फ एक किताब नहीं, सोच की आज़ादी का सवाल है
  • विदेश में ‘एकता’ का संदेश, देश में नफ़रत की राजनीति पर खामोशी
  • आरएसएस पर अमेरिका में बवाल: आखिर नफ़रत और जातिवाद की राजनीति से देश कब आज़ाद होगा?
  • वक्फ बोर्ड में बढ़ती धांधलियां… वक्फ की असली मंशा पर निजी हित भारी
  • 10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?
Categories
  • Uncategorized
  • एलान विशेष
  • धर्म
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • लातुर
  • लेख विचार
  • विदेश
  • विशेष
Instagram

elaannews

📺 | हमारी खबर आपका हौसला
⚡️
▶️ | NEWS & UPDATES
⚡️
📩 | elaannews1@gmail.com
⚡️

अमरावती में 17 वर्षीय नाबालिग लड़की की हत्या के मा अमरावती में 17 वर्षीय नाबालिग लड़की की हत्या के मामले में राजापेठ पुलिस ने आरोपी आनंद भड की शहर के प्रमुख रास्तों से धिंड निकाली। दो दिन पहले आरोपी ने नाबालिग लड़की पर चाकू से हमला कर सरेआम उसकी हत्या कर दी थी, जिसके बाद शहर में दहशत का माहौल था। पुलिस ने आरोपी को घटनास्थल पर ले जाकर धिंड निकाली, ताकि लोगों के मन में पैदा हुई दहशत कम हो सके। आरोपी को अदालत ने चार दिन की पुलिस हिरासत में भेजा है। पुलिस उससे पूछताछ कर रही है और हत्या के पीछे की पूरी वजह जल्द सामने आने की उम्मीद है। वहीं, नागरिकों ने आरोपी को चौक में फांसी देने की मांग की है।#elaannews #breakingnews #maharashtra #amrawatinews #amrawati
“दो करोड़ नाम हटाए गए, उसी तरह दो करोड़ नाम मतदाता “दो करोड़ नाम हटाए गए, उसी तरह दो करोड़ नाम मतदाता सूची में डाले भी जा सकते हैं। सावधान रहें। चुनाव जीतने के लिए भाजपा का निचले स्तर तक जाकर दांव-पेंच।”- उद्धव ठाकरे - सुप्रीमो, शिवसेना (UBT)#elaannews #breakingnews #maharashta #SIR #bjp
Full Video On Youtube And Facebook Check Out Like Full Video On Youtube And Facebook Check Out Like Comment And Share Video.#elaannews #breakingnews #Latur #laturnews #shiruranantpal
Full Video On Youtube And Facebook Check Out Like Full Video On Youtube And Facebook Check Out Like Comment And Share Video.#elaannews #breakingnews #Latur #laturcity #laturnews
Follow on Instagram
Facebook X (Twitter) Pinterest Vimeo WhatsApp TikTok Instagram

News

  • महाराष्ट्र
  • भारत
  • विदेश
  • एलान विशेष
  • लेख विचार
  • धर्म

Subscribe to Updates

Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

© 2024 Your Elaan News | Developed By Durranitech
  • Privacy Policy
  • Terms
  • Accessibility