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छोटे कर्जदार की गर्दन पर शिकंजा, बड़े कर्जदार के लिए ‘हेयरकट’! क्या यही है भाजपा का बैंकिंग न्याय?

adminBy adminSeptember 7, 2026 एलान विशेष No Comments5 Mins Read
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subhash chandra
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भारत की बैंकिंग व्यवस्था में एक सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है कि कर्ज की कीमत सबके लिए बराबर है या नहीं? एक तरफ छोटा कारोबारी, दुकानदार या आम आदमी बैंक की कुछ किस्तें चूक जाए तो नोटिस, रिकवरी एजेंट और कानूनी कार्रवाई उसका पीछा नहीं छोड़ते। दूसरी तरफ जब मामला हजारों करोड़ रुपये के बड़े कर्जदारों का आता है, तो वही व्यवस्था ‘राइट-ऑफ’, ‘हेयरकट’, ‘रिजॉल्यूशन’ और ‘दिवाला प्रक्रिया’ जैसे भारी-भरकम शब्दों में बदल जाती है।

सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से सामने आए आंकड़े और ज़ी समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा के मामले में एनसीएलटी का फैसला इसी विरोधाभास पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।


आरटीआई आंकड़े: वसूली में अंतर

आरटीआई से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, 2016-17 से 2025-26 के बीच सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने एक करोड़ रुपये से कम बकाया वाले छोटे डिफॉल्टरों से 5,004.28 करोड़ रुपये की वसूली की। इसके मुकाबले 100 करोड़ रुपये से अधिक बकाया वाले बड़े कर्जदारों से बैंक सिर्फ 3,874.41 करोड़ रुपये ही वसूल कर सका।


राइट-ऑफ का अंतर

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इसी अवधि में बैंक ने बड़े कर्जदारों के 26,701.55 करोड़ रुपये के कर्ज को राइट-ऑफ किया, जबकि छोटे कर्जदारों के 6,774.23 करोड़ रुपये के कर्ज को राइट-ऑफ किया गया। आंकड़ों में छोटे कर्जदारों से वसूली की दर करीब 74 प्रतिशत, जबकि बड़े कर्जदारों से केवल 14.5 प्रतिशत बताई गई है। यह अंतर महज आंकड़ा नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या बैंकिंग सिस्टम छोटे कर्जदारों से पैसा वसूलने में जितना सख्त है, उतना बड़े कर्जदारों के मामले में भी है?


सुभाष चंद्रा मामला: 99.97% हेयरकट

अब सुभाष चंद्रा का मामला देखिए। एनसीएलटी ने उनकी पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी है। लेनदारों ने 22,006.57 करोड़ रुपये से ज्यादा के दावे किए थे, लेकिन प्रस्तावित योजना में उन्हें सिर्फ 6.5 करोड़ रुपये मिलेंगे। यानी कुल दावे का लगभग 0.03 प्रतिशत। दूसरे शब्दों में करीब 99.97 प्रतिशत रकम की वसूली नहीं होगी। वित्तीय भाषा में इसे ‘हेयरकट’ कहा जाता है। लेकिन आम आदमी इसे कैसे समझे?

अगर किसी छोटे दुकानदार पर बैंक का दस लाख रुपये कर्ज है और वह आर्थिक संकट में फंस जाता है, तो क्या बैंक उससे कहेगा कि चलिए, आप केवल तीन-चार हजार रुपये दे दीजिए और बाकी मामला खत्म? शायद नहीं। यही कारण है कि बड़े कॉरपोरेट कर्ज के मामलों में ‘हेयरकट’ की सीमा जनता के लिए असहज करने वाले सवाल पैदा करती है।


राइट-ऑफ का सही अर्थ

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। राइट-ऑफ का मतलब कर्ज माफ कर देना नहीं होता। बैंक राइट-ऑफ के बाद भी कानूनी तरीके से वसूली जारी रख सकते हैं। इसी तरह दिवाला कानून के तहत किसी कर्जदार से वही राशि वसूल की जा सकती है जो उसकी वास्तविक और उपलब्ध संपत्तियों से संभव हो।

लेकिन फिर सवाल और बड़ा हो जाता है कि अगर हजारों करोड़ रुपये का कर्ज दिया गया था, तो कर्ज देते समय जोखिम का आकलन किसने किया था? बैंक ने इतनी बड़ी राशि मंजूर कैसे की? गारंटी और संपत्तियों का मूल्यांकन कितना सही था? कर्ज डूबने के संकेत मिलने के बाद समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और सबसे महत्वपूर्ण ये कि अगर गलती कर्जदार की थी तो कर्ज देने वाली व्यवस्था की जवाबदेही कौन तय करेगा?


जनता का पैसा, जनता की बचत

बैंकों का पैसा हवा से नहीं आता। करोड़ों आम नागरिक अपनी बचत बैंक में जमा करते हैं। उसी बैंकिंग व्यवस्था से बड़े उद्योगों को हजारों करोड़ रुपये के कर्ज मिलते हैं। इसलिए जब इतनी बड़ी रकम फंसती है तो यह केवल बैंक और कारोबारी का निजी मामला नहीं रह जाता। इसका संबंध सीधे जनता के भरोसे और वित्तीय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ जाता है। यही वजह है कि आरबीआई और वित्त मंत्रालय की जवाबदेही पर उठाए जा रहे सवालों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।


पारदर्शिता की मांग

बड़े कर्जदारों के नाम और कर्ज की जानकारी को लेकर पारदर्शिता क्यों नहीं होनी चाहिए? अगर किसी मामले में सार्वजनिक धन का जोखिम जुड़ा है तो जनता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि पैसा किसे दिया गया, किन शर्तों पर दिया गया, डिफॉल्ट क्यों हुआ और वसूली के लिए क्या किया गया।

सवाल किसी एक कारोबारी को निशाना बनाने का नहीं है। सवाल व्यवस्था के दोहरे मापदंड का है।


राजनीतिक बहस

विजय माल्या की टिप्पणी और जयराम रमेश का ‘हेयरकट नहीं, मुंडन’ वाला तंज इसी बहस को राजनीतिक रूप से और तीखा बनाते हैं। राजनीतिक आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन आंकड़ों ने जो सवाल खड़े किए हैं, उनका जवाब राजनीति से नहीं बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही से मिलना चाहिए।


निष्कर्ष: कैसी बैंकिंग व्यवस्था?

भारत को ऐसी बैंकिंग व्यवस्था चाहिए जिसमें छोटा कर्जदार भी कानून से बाहर न हो और बड़ा कर्जदार भी कानून से ऊपर न हो। कर्ज लेने वाला छोटा हो या बड़ा सबके लिए नियम समान होने चाहिए। बैंक को कर्ज देने में लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाला है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि वास्तव में दिवाला प्रक्रिया के बाद केवल कुछ रकम ही वसूल हो सकती है, तो जनता को पूरी प्रक्रिया का हिसाब दिखना चाहिए।


अंतिम सवाल

वरना आम आदमी के मन में यह सवाल बना रहेगा कि गरीब की छोटी चूक ‘डिफॉल्ट’ है, लेकिन बड़े कारोबारी का हजारों करोड़ का संकट ‘हेयरकट’ क्यों बन जाता है? और अगर बैंकिंग न्याय सचमुच सबके लिए समान है, तो फिर आंकड़ों में इतना बड़ा फर्क क्यों दिखाई देता है? यही वह सवाल है जिसका जवाब सरकार, आरबीआई और बैंकिंग व्यवस्था इन तीनों ने देना चाहिए।

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