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Home»भारत

मुस्लिम लड़का प्यार करे तो ‘लव जिहाद’हिंदू करे तो घर वापसी! यह कैसा न्याय है?

adminBy adminJune 21, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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image credit : economist.com
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भारत के संविधान में हर नागरिक को अपने जीवनसाथी के चुनाव की स्वतंत्रता है। लेकिन जब एक मुसलमान युवक किसी हिंदू युवती से शादी करता है, तो यह आज़ादी सज़ा बन जाती है। जेल, फर्जी एफआईआर, धमकियाँ और साम्प्रदायिक उन्माद उसका स्वागत करते हैं। जबकि वही काम अगर कोई हिंदू युवक करे—चाहे सार्वजनिक मंच से मुस्लिम लड़कियों को शादी के लिए उकसाए—तो न उसे जेल होती है, न समाज का बहिष्कार, न प्रशासन का शिकंजा। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने इस भेदभावपूर्ण रवैये को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मुसलमान होकर हिंदू लड़की से शादी की? चलो पहले 6 महीने जेल में बैठो!

सुप्रीम कोर्ट को एक मुस्लिम युवक को सिर्फ इसलिए ज़मानत देनी पड़ी क्योंकि उसने एक हिंदू युवती से विवाह किया था, जिसे खुद दोनों परिवारों ने मंजूरी दी थी। युवक का नाम ‘सिद्दीकी’ है और उत्तराखंड पुलिस ने उसे उत्तराखंड धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम और IPC की धारा के तहत “धोखे से शादी” का आरोपी बना दिया।

➡️ शादी 10 दिसंबर को हुई,

➡️ हलफनामा 11 दिसंबर को दिया गया कि लड़की को धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा,

➡️ लेकिन 12 दिसंबर को एफआईआर दर्ज हुई!

क्या यह सिर्फ ‘क़ानून की प्रक्रिया’ थी या फिर धर्म देखकर की गई कार्यवाही? हिंदुत्ववादी सरकारों की ‘Selective Morality’:- उत्तराखंड हाईकोर्ट ने यह तर्क भी मान लिया कि “शादी से पहले मुस्लिम युवक ने अपनी पहचान नहीं बताई।” मतलब अगर आप मुसलमान हैं तो लड़की से शादी करने से पहले बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके धर्म बताइए नहीं तो ‘लव जिहाद’ केस बन जाएगा। लेकिन जब यही काम हिंदू करते हैं तो: सुदर्शन टीवी के चव्हाणके टीवी पर कहते हैं:

“हम हिंदू लड़कों को प्रेरित करेंगे कि वो ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम लड़कियों से शादी करें!”कहां है इन पर केस?  कहां है इनका धर्म छुपाने का मुद्दा? क्यों नहीं दर्ज होती FIR? उल्टा उन्हें मीडिया में ‘देशभक्त’ और ‘धर्म रक्षक’ बताया जाता है। ये सिर्फ प्यार नहीं, धर्म के खिलाफ युद्ध माना जाता है – अगर आप मुसलमान हैं।

जब भी कोई मुस्लिम युवक किसी हिंदू युवती से प्रेम करता है या शादी करता है, तो उसे: ‘लव जिहाद’ कहा जाता है। उसके खिलाफ धर्मांतरण कानून का दुरुपयोग होता है। उसे आतंकी जैसा ट्रीटमेंट मिलता है। मीडिया ट्रायल चलता है। गिरफ्तारी होती है, भले ही दोनों बालिग हों और रजामंदी से साथ रह रहे हों। लेकिन हिंदू लड़कों द्वारा मुस्लिम लड़कियों से शादी को ‘घर वापसी’ का नाम दिया जाता है। उनके लिए कानून, संविधान, निजता—all are suspended.

सुप्रीम कोर्ट का करारा तमाचा:- सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि: “राज्य दो वयस्कों के आपसी सहमति से साथ रहने पर सिर्फ इसलिए आपत्ति नहीं कर सकता क्योंकि वे अलग-अलग धर्मों के हैं।” “यह निजता का अधिकार है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला है।” फैसला दिखाता है कि देश का सर्वोच्च न्यायालय अब भी नागरिक स्वतंत्रता का रक्षक है, लेकिन निचली अदालतें, पुलिस और सरकारें हिंदुत्व के चश्मे से न्याय देखने लगी हैं। यह कौन सा भारत है जहां मुसलमान को प्यार करने से पहले गिरफ्तारी का डर हो और हिंदू को नफरत फैलाने की छूट?

आज की स्थिति यह है कि एक मुस्लिम युवक को शादी करने पर धोखा, धर्मांतरण, झूठा प्रेम जैसे आरोपों से घेरा जाता है। लेकिन कोई हिंदू टीवी एंकर खुलेआम मुस्लिम बहनों को “शिकार” बनाने का प्लान बताता है—और उसे फ्री स्पीच कहा जाता है! क्या यह हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ता भारत है? क्या यह लोकतंत्र है, या बहुसंख्यकवाद की अदालत? यह केस सिर्फ एक मुस्लिम युवक की ज़मानत का नहीं है। यह उस पूरे तंत्र की पोल खोलता है जो ‘मुसलमान होने’ को अपराध मानता है। जब तक समाज और कानून दोनों की नजरों में सभी धर्मों के नागरिक बराबर नहीं होंगे, तब तक भारत की लोकतांत्रिक आत्मा अधूरी रहेगी। आज सुप्रीम कोर्ट ने इंसाफ किया है, लेकिन सवाल यह है कि एक प्रेम करने वाले को पहले जेल क्यों मिली? “अगर मुसलमान लड़का प्यार करे तो ‘जेल’, हिंदू लड़का नफरत फैलाए तो ‘प्रसारण’? ये कैसा न्याय है, मेरे भारत के संविधान!”

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