जम्मू-कश्मीर के बडगाम में 12 वर्षीय बच्ची के साथ कथित बलात्कार और हत्या की घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि उस सामाजिक और राजनीतिक विफलता का भयावह चेहरा है, जिसमें मासूम बेटियों की सुरक्षा हर दिन कमजोर होती जा रही है। यह घटना पूरे देश से एक सवाल पूछ रही है कि आख़िर कब तक मासूम बच्चियां दरिंदगी का शिकार होती रहेंगी और सरकारें केवल संवेदनाएं व्यक्त करती रहेंगी? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
भारत में निर्भया कांड से लेकर कठुआ, उन्नाव, हाथरस, मणिपुर, कोलकाता, पुणे और अब बडगाम तक हर बार देश ने गुस्सा देखा, मोमबत्तियां देखीं, नारे देखे, लेकिन क्या वास्तव में व्यवस्था बदली? हर घटना के बाद “सख़्त कार्रवाई” और “फास्ट ट्रैक न्याय” के दावे किए जाते हैं, मगर ज़मीनी सच्चाई यही है कि बलात्कार और बच्चों के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं।
सवाल यह है कि अगर कानून इतने प्रभावी हैं, तो अपराधियों के मन में डर क्यों नहीं पैदा हो रहा? सबसे गंभीर और शर्मनाक पहलू यह है कि कई मामलों में सत्ता पक्ष से जुड़े नेताओं, कार्यकर्ताओं या प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आते रहे हैं। कठुआ मामले में आरोपियों के समर्थन में तिरंगा यात्राएं निकाली गईं। उन्नाव रेप केस में पीड़िता को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ा। हाथरस में प्रशासन पर सबूत दबाने के आरोप लगे।
कई बार दुष्कर्म के आरोपियों का स्वागत फूल-मालाओं से किया गया, उन्हें “संस्कारी” और “निर्दोष” बताकर राजनीतिक संरक्षण दिया गया। ऐसे दृश्य केवल पीड़ित परिवारों का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का मनोबल तोड़ते हैं। यही वजह है कि जनता के मन में यह सवाल गहराता जा रहा है कि क्या सरकारें सचमुच महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा चाहती हैं, या फिर राजनीतिक हितों के सामने न्याय और नैतिकता दोनों कमजोर पड़ जाते हैं? यदि सत्ता से जुड़े लोगों पर कार्रवाई में ढिलाई होगी, अगर आरोपी राजनीतिक संरक्षण पाते रहेंगे, तो कानून का भय कैसे पैदा होगा?
बडगाम की इस बच्ची की मौत केवल उसके परिवार का दर्द नहीं है बल्कि यह पूरे देश की संवेदनशीलता की परीक्षा है। एक बच्ची जो कुरान पढ़ने मदरसे गई थी, उसका शव अगले दिन खेत में मिलता है। यह दृश्य केवल कश्मीर ही नहीं, पूरे भारत की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला है। बच्ची के हाथों में घास का होना और शरीर पर संघर्ष के निशान इस बात की गवाही देते हैं कि उसने आख़िरी सांस तक दरिंदों से लड़ने की कोशिश की।
सरकारों की जिम्मेदारी केवल अपराध के बाद जांच बैठाने तक सीमित नहीं हो सकती। जरूरत इस बात की है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों पर और भी कठोर एवं समयबद्ध कानून लागू किए जाएं। फास्ट ट्रैक अदालतों को वास्तव में तेज़ बनाया जाए। दोषियों को राजनीतिक संरक्षण देने वालों पर भी कार्रवाई हो। पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही तय हो। स्कूलों, मदरसों और सार्वजनिक स्थानों के आसपास सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाए। और सबसे अहम-बलात्कार जैसे अपराधों को राजनीतिक और सांप्रदायिक चश्मे से देखना बंद किया जाए।
दुखद यह भी है कि समाज का एक हिस्सा अपराधी की जाति, धर्म या राजनीतिक पहचान देखकर प्रतिक्रिया देता है। अगर आरोपी “अपना” है तो उसके समर्थन में अभियान शुरू हो जाते हैं, और अगर “दूसरा” है तो उसे फांसी की मांग उठती है। यह दोहरा रवैया भी अपराधियों का मनोबल बढ़ाता है। आज बडगाम की बच्ची इंसाफ मांग रही है। उससे पहले कठुआ की आसिफा, दिल्ली की निर्भया, हाथरस की बेटी और देश की हजारों अनाम बच्चियां भी यही सवाल छोड़ गईं कि क्या इस देश में बेटियां सचमुच सुरक्षित हैं?
अगर अब भी सरकारें केवल भाषणों और ट्वीट्स तक सीमित रहीं, तो आने वाले समय में जनता का कानून और व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह टूट सकता है। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी इमारतों, भाषणों या चुनावों से नहीं, बल्कि उसकी बेटियों की सुरक्षा से होती है।
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