जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिसके खाते में
42 सीटें गई हैं. वहीं, भारतीय जनता पार्टी 29 सीटों पर सिमट गई है.कांग्रेस ने 6 और निर्दलीय
उम्मीदवारों ने 7 सीटें जीती हैं.
नई दिल्ली: लगभग एक दशक बाद जम्मू–कश्मीर में हुए विधानसभा चुनाव के अंतिम परिणाम सामने
आ गए हैं.90 सदस्यीय विधानसभा में 42 सीटें जीतकर नेशनल कॉन्फ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी बनकर
उभरी है, जबकि उसकी गठबंधन सहयोगी कांग्रेस के खाते में 6 सीटें गई हैं. इस तरह नेशनल कॉन्फ्रेंस
और कांग्रेस का गठबंधन 48 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने की स्थिति में आ गया
है.हालांकि, चुनाव परिणाम इस केंद्र शासित प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े क्षेत्रीय दल पीपुल्स डेमोक्रेटिक
पार्टी (पीडीपी) के लिए घोर निराशा लेकर आए हैं. दशक भर पहले हुए अविभाजित जम्मू-कश्मीर के
विधानसभा चुनावों में पीडीपी 28 सीट के साथ सबसे बड़ा दल बनकर उभरी थी, लेकिन इस बार वह
महज तीन सीटों पर सिमट गई. यहां तक कि पार्टी प्रमुख महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्तिजा मुफ्ती तक
पार्टी की पारंपरिक सीट श्रीगुफावाड़ा-बिजबेहरा से हार गई हैं.
चुनाव के दौरान कयास लगाया जा रहा था कि जमात-ए-इस्लामी का चुनावी मैदान का प्रवेश और
तमाम निर्दलीय प्रत्याशियों की उपस्थिति कश्मीर घाटी की राजनीति को गहराई से प्रभावित कर
सकती है. लेकिन, अंतिम चुनाव परिणामों में केवल 7 निर्दलीय प्रत्याशी जीतने में सफल रहे, जिनमें
जमात का प्रभाव नहीं दिखाई देता है. यहां तक कि जमात समर्थित सबसे चर्चित उम्मीदवार सयर
अहमद रेशी तक कुलगाम सीट से चुनाव हार गए हैं.
पूर्व कांग्रेसी और पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी खाता भी
नहीं खोल पाई है, जबकि महज सात सीटों पर उम्मीदवार खड़ी करने वाली आम आदमी पार्टी (आप)
के खाते में एक सीट गई है और वह जम्मू-कश्मीर में अपना खाता खोलने में सफल हो गई है.
नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला अपनी दोनों सीटें गांदेरबल और बडगाम जीतने में सफल रहे हैं.
सज्जाद लोन की पार्टी पीपुल्स कॉन्फ्रेंस भी 15 सीट पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन केवल एक सीट पर
जीत मिली. स्वयं सज्जाद लोन हंदवाड़ा से जीतने में सफल रहे.हालांकि, लोन दो सीटों से चुनाव लड़े
थे. दूसरी सीट कुपवाड़ा की थी, जहां उन्हें केवल 7,457 वोट मिले और तीसरे पायदान पर रहे.
हंदवाड़ा में भी उनकी जीत का अंतर महज 662 वोट रहा. बहरहाल, कुपवाड़ा सीट पीडीपी की झोली
में गई है. पीडीपी ने पहली बार कुपवाड़ा से जीत दर्ज की है.
एक सीट सीपीआईएम ने भी जीती है. इसने कुलगाम से जीत दर्ज की है, जहां पार्टी प्रत्याशी मोहम्मद
युसुफ तारिगामी ने निर्दलीय उम्मीदवार सयर अहमद रेशी को हराया. रेशी को 37 साल बाद चुनावी
राजनीत में वापसी करने वाले जमात-ए-इस्लामी का समर्थन प्राप्त था.
मत प्रतिशत के लिहाज से देखें तो भाजपा को कुल मतों का 25.64 फीसदी प्राप्त हुआ है, वहीं नेशनल
कॉन्फ्रेंस को 23.43 फीसदी मत प्राप्त हुए हैं. कांग्रेस को 11.97 प्रतिशत मत मिले हैं. सबसे अधिक
नुकसान पीडीपी को उठाना पड़ा है. पिछले विधानसभा चुनाव में 22.67 प्रतिशत मत पाने वाली
पीडीपी को इस बार महज 8.87 प्रतिशत मत मिले हैं. लिहाजा पीडीपी की सीट संख्या 28 से गिरकर
महज 3 रह गई है.
गौरतलब है कि परिणाम आने के तुरंत बाद उपराज्यपाल अपनी तरफ से पांच विधायक मनोनीत
करेंगे. इन पांच में से दो कश्मीरी पंडित, दो महिला और एक पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से
विस्थापितों का प्रतिनिधि होगा. मनोनीत विधायकों के पास वे सभी विधायी शक्तियां और
विशेषाधिकार होंगे, जो चुने हुए विधायकों के पास होती हैं. इस तरह जम्मू-कश्मीर विधानसभा में
विधायकों की कुल संख्या 95 हो जाएगी.ऐसे में जम्मू-कश्मीर के नेताओं में इस बात को लेकर
अनिश्चितता है कि बहुमत का आंकड़ा कुल 90 विधानसभा सीटों के हिसाब से 46 है या 95 विधायकों
के हिसाब से 48.
इस बीच नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी
(भाजपा) के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने मुख्य सचिव को सरकारी कामकाज के नियमों को बदलने के
लिए कहा था, जिससे जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल को व्यापक शक्तियां मिल जातीं. इस आरोप के
बाद बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है.
यह विवाद हालिया संपन्न विधानसभा चुनावों के कुछ दिनों बाद ही सामने आया है. साथ ही, केंद्र
सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के बाद के तीन नियमों में संशोधन करने के तीन महीने से भी कम समय
बाद शुरू हुआ है. उक्त संशोधन एलजी की प्रशासनिक शक्तियों का दायरा बढ़ाने से संबंधित थे.एक्स
(पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि
भाजपा ने मुख्य सचिव को सरकारी नियमों को बदलने का निर्देश दिया था, जिससे सीएम की शक्तियों
में ‘कटौती’ हो.अब्दुल्ला ने कहा, ‘भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में स्पष्ट रूप से हार स्वीकार कर ली है।
अन्यथा मुख्य सचिव को सरकार के कामकाज के नियमों को बदलने का काम क्यों सौंपा जाता, ताकि
मुख्यमंत्री/निर्वाचित सरकार की शक्तियों में कटौती की जा सके और उन्हें एलजी को सौंपा जा सके?
अधिकारियों को सलाह दी जाती है कि वे आने वाली निर्वाचित सरकार को और अधिक कमजोर करने
के किसी भी दबाव का विरोध करें.’
विधानसभा चुनाव से पहले, केंद्र सरकार ने एक कार्यकारी अधिसूचना के जरिए नए नियम बनाकर
एलजी की शक्तियों का विस्तार किया था, जिससे केंद्र शासित प्रदेश में हंगामा मच गया था, जहां
नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) सहित अन्य राजनीतिक संगठनों ने भाजपा
पर जम्मू-कश्मीर की भावी निर्वाचित सरकारों को कमजोर करने का आरोप लगाया था.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा अधिसूचित और गृह मंत्रालय द्वारा 12 जुलाई को जारी अधिसूचना में जारी
किए गए नए नियमों ने ‘जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (द्वितीय संशोधन) सरकारी कामकाज
नियम, 2024’ में संशोधन किया था.
पूर्ववर्ती राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किए जाने के बाद अपनी तरह की यह दूसरी
अधिसूचना जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम-2019 (2019 का 34) की धारा 55 के तहत जारी
की गई थी, जिसे धारा 73 के तहत 31 अक्टूबर 2019 की घोषणा के साथ पढ़ा गया.
24 फरवरी को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा कि राष्ट्रपति मुर्मू ने जम्मू-कश्मीर के व्यापार संचालन-
2019 के नियम 50 में ‘जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश सरकार के व्यापार संचालन (संशोधन) नियम,
2024’ के माध्यम से संशोधन किया है.
नियम 50 के उपनियम 2 के खंड बी में उपराज्यपाल से जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव और पुलिस
महानिदेशक की नियुक्ति के मामले में गृह मंत्रालय से ‘पूर्व परामर्श’ लेने को कहा गया था, जिसे
संशोधित कर जम्मू-कश्मीर के गृह सचिव की नियुक्ति में भी केंद्र की मंजूरी की आवश्यकता बताई गई.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर पर अपनी पकड़
मजबूत करती दिख रही है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर के अंत से पहले केंद्र शासित प्रदेश में
विधानसभा चुनाव कराने का निर्देश दिया था. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के सत्ता
में आने की संभावना बहुत कम है.
2018 में जम्मू-कश्मीर की सत्ता संभालने के बाद, केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक और
चुनावी सीमाओं को इस उम्मीद के साथ तैयार किया है कि एक दशक में पहली बार हुए विधानसभा
चुनाव के बहुप्रतीक्षित नतीजों के घोषित होने के बाद वह सत्ता में वापस आ जाएगी.
विश्लेषकों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक आरक्षण की व्यवस्था को अपने चुनावी गणित के
पक्ष में बदलने के अलावा, भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने एलजी को विधानसभा में पांच
सदस्यों को नामित करने का भी अधिकार दिया है, जिन्हें केंद्रीय गृह मंत्रालय में बैठे राजनेता द्वारा
मंजूरी दिए जाने की संभावना है.
हालांकि, जम्मू में कांग्रेस द्वारा भाजपा को कड़ी चुनावी टक्कर दिए जाने तथा कश्मीर में पार्टी के
सहयोगियों द्वारा नेशनल कॉन्फ्रेंस की चुनौती का सामना किए जाने के कारण सभी की निगाहें 8
अक्टूबर पर टिकी थी. बहरहाल जम्मू–कश्मीर के इन चुनाव परिणामों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है
की भाजपा को वहां की जनता ने क्यों नकारा, केंद्र सरकार के अगस्त 2019 के फैसले ने जम्मू–कश्मीर
की तस्वीर बदल दी. तब मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाकर न सिर्फ जम्मू–कश्मीर का विशेष दर्जा
खत्म किया, बल्कि राज्य को लद्दाख और जम्मू–कश्मीर में बांटकर अपने अधीन ले लिया यानी केंद्र
शासित प्रदेश बना दिया.रही बात पीडीपी की तो उसे नकारने का कारण 2014 में भाजपा के साथ
मिलकर सरकार बनाना हो सकता है।