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Home»भारत

वक्फ संशोधन बिल मामले में जेपीसी को मिले 1.25 करोड़ ई-मेल पर बौखलाए भाजपाई

adminBy adminOctober 19, 2024 भारत No Comments6 Mins Read
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28 जुलाई को केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए वक्फ संशोधन विधेयक में वक्फ बोर्ड में गैर-
मुस्लिमों और मुस्लिम महिलाओं को शामिल करने का प्रस्ताव है, साथ ही बोर्ड की संपत्ति को
वक्फ घोषित करने की शक्ति को सीमित किया गया है। अन्य दलों के विरोध के कारण,
विधेयक को 8 अगस्त को भाजपा सांसद जगदंबिका पाल की अध्यक्षता वाली जेपीसी को भेज
दिया गया था। पिछले महीने जेपीसी ने जनता से प्रतिक्रिया मांगी थी और उन्हें 1.25 करोड़
से अधिक ईमेल और 75,000 पत्र प्राप्त हुए।
मूर्खता की हद पार करते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद निशिकांत दुबे ने
वक्फ (संशोधन) विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को प्राप्त
1.25 करोड़ ईमेल की जांच की मांग की है। दुबे ने कहा कि इनमें पाकिस्तान की आईएसआई
और चीन जैसी विदेशी ताकतों की संलिप्तता हो सकती है।
जेपीसी के अध्यक्ष पाल को लिखे पत्र में दुबे ने शिकायतों की इतनी बड़ी संख्या पर सवाल
उठाया और इसके पीछे “राष्ट्र-विरोधी ताकतों” का संदेह व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि
अधिकांश ईमेल एक ही फॉर्मेट में थे और उनके स्रोतों की विस्तृत जांच की मांग की।
दुबे ने अपने पत्र में लिखा, “हम बाहरी ताकतों को अपनी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हेरफेर करने
की अनुमति नहीं दे सकते। हमें संसद की शुचिता की रक्षा के लिए त्वरित कार्रवाई करने की
आवश्यकता है।”
विश्व हिंदू परिषद (VHP) के प्रवक्ता विनोद बंसल ने दुबे के दावों का समर्थन किया और इन
ईमेलों की संख्या को “ईमेल जिहाद” के रूप में वर्णित किया। उन्होंने जाकिर नाइक और
अन्य “राष्ट्र-विरोधी ताकतों” की संलिप्तता पर भी संदेह जताया और सरकार से जांच करने
का आग्रह किया।
केंद्रीय संसदीय कार्य और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वह जेपीसी
के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं कर सकते, लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि समिति इस
मुद्दे पर गहनता से विचार करेगी। उन्होंने कहा, “जेपीसी को अधिकार दिए गए हैं, और रिपोर्ट
जमा होने के बाद हम स्थिति की समीक्षा करेंगे।”

ज्ञात हो कि केंद्र सरकार ने वक्फ कानून में बदलाव के लिए पिछले संसद सत्र के दौरान
वक्फ संशोधन विधेयक पेश किया था। हालांकि, विपक्ष ने इसे मुस्लिमों के खिलाफ बताते हुए
इसका विरोध किया। इस विरोध को देखते हुए सरकार ने विधेयक को जेपीसी के पास भेजने
का फैसला किया।
समिति ने लोगों से अपनी टिप्पणियां संयुक्त सचिव, लोकसभा सचिवालय, कमरा नंबर 440,
संसद भवन एनेक्सी, नई दिल्ली -110001 पर भेजने या उन्हें jpcwaqf-
lss@sansad.nic.in पर ईमेल करने के लिए कहा था।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 पर विभिन्न हितधारकों
के साथ अनौपचारिक चर्चा के लिए जेपीसी के सदस्य पांच राज्यों का दौरा करने वाले थे।
जिसके अनुसार यह राष्ट्रव्यापी चर्चा 1 अक्टूबर तक चलने वाली थी, जिसकी शुरुआत 26
सितंबर को महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से हो चुकी है। 27 सितंबर को अहमदाबाद में
गुजरात सरकार, गुजरात वक्फ बोर्ड और अन्य प्रमुख हितधारकों के प्रतिनिधियों से बातचीत
थी ।
इसके बाद समिति के सदस्य 28 सितंबर को आंध्र प्रदेश, 29 सितंबर को तमिलनाडु और 1
अक्टूबर को कर्नाटक में विभिन्न हितधारकों के साथ परामर्श करने पहुंचें। हैदराबाद में होने
वाली चर्चा में आंध्र और तेलंगाना के अलावा छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।उधर
धार्मिक और सांस्कृतिक संगठन देवभूमि संघर्ष समिति ने शिमला में मस्जिद के एक हिस्से के
कथित अवैध निर्माण को लेकर हिमाचल प्रदेश के जिलों में विरोध प्रदर्शन किया. यह विरोध
प्रदर्शन हिमाचल प्रदेश में अवैध मस्जिदों और प्रवासियों के खिलाफ किया गया.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने स्थानीय प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर
मांग की कि वक्फ बोर्ड को खत्म किया जाए और प्रवासियों के दस्तावेजों की जांच की जाए.
बाद में शिमला के चौड़ा मैदान में विधानसभा के निकट एक और विरोध प्रदर्शन किया गया,
जिसमें संजौली में मस्जिद के कथित ‘अवैध’ हिस्से को ध्वस्त करने की मांग की गई.
याद रहे कि हिमाचल प्रदेश में काँग्रेस की सरकार है जिसने मंगलवार को राज्य के सभी खाद्य
विक्रेताओं और भोजनालयों को ‘पारदर्शिता’ बढ़ाने का हवाला देते हुए मालिकों के नाम और
पते लिखने का निर्देश दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, यह निर्णय मंगलवार को राज्य के शहरी विकास और नगर निगम की
बैठक के दौरान लिया गया, हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने
एक सोशल मीडिया पोस्ट में घोषणा की.
पठानिया ने कहा, ‘हिमाचल में हर रेस्तरां और फास्ट फूड आउटलेट को मालिक की पहचान
बताना अनिवार्य होगा ताकि लोगों को कोई परेशानी न हो. इसके लिए शहरी विकास और
नगर निगम की बैठक में निर्देश जारी किए गए हैं.’
आदेश के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए सात सदस्यीय समिति का गठन किया गया है.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, समिति में मंत्री विक्रमादित्य सिंह और अनिरुद्ध
सिंह शामिल हैं.
सिंह ने कहा कि पहचान पत्र जारी करने सहित फेरीवालों के लिए भी नियम लाए जाएंगे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जिस बैठक में यह फैसला लिया गया, वह विक्रमादित्य
सिंह के कार्यालय में हुई थी और इसे राज्य की स्ट्रीट वेंडिंग पॉलिसी को अंतिम रूप देने के

लिए बुलाया गया था, जो शिमला की संजौली मस्जिद से संबंधित 11 सितंबर के विवाद के
बाद से सुर्खियों में है. इस महीने की शुरुआत में हुए उक्त सांप्रदायिक तनाव के पीछे अलग-
अलग समुदायों के दो दुकानदारों के बीच लड़ाई थी.
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि इस वर्ष 15 दिसंबर तक नीति को अंतिम रूप दिए
जाने के पश्चात सभी स्ट्रीट वेंडर अपने पहचान पत्र तथा वेंडिंग लाइसेंस प्रदर्शित करेंगे.
अखबार से बात करते हुए विक्रमादित्य ने कहा, ‘पिछले कुछ दिनों में हमारे राज्य में अशांति
थी. हमारे निर्णय किसी अन्य राज्य द्वारा प्रेरित नहीं हैं. सभी विक्रेताओं के लिए पहचान
पत्र प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा – चाहे वे हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या किसी अन्य समुदाय
से हों. राज्य में वेंडिंग जोन, वेंडिंग नीति बनाने के लिए उच्च न्यायालय से हमें निर्देश मिले
हैं. हाल ही में हुई अशांति एक मजबूत वेंडिंग नीति की न होने से जुड़ी हुई थी.’
विक्रमादित्य सिंह ने कहा, ‘मैं केवल यह कहना चाहूंगा कि यह निर्णय राज्य-केंद्रित है, यह
राज्य के लोगों की भलाई के लिए है.’
यह आदेश उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी किए गए इसी तरह के निर्देश के बाद आया है.
सबसे पहले जुलाई में कांवड़ यात्रा से पहले योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस मामले को
उठाया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादास्पद कदम पर रोक लगा दी, जिसे कई लोगों
ने सांप्रदायिक पहचान और भेदभाव का एक स्पष्ट कृत्य माना था.
भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने यूपी में पिछले दो हफ्तों में कम से कम
चार घटनाओं के मद्देनजर इसे फिर से आगे बढ़ाया है, जहां फूड स्टॉल स्टाफ या जूस सेंटर
पर कथित तौर पर जूस और रोटियों को मानव मल या थूक से दूषित करने का आरोप
लगाया गया था.

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