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- निशाने पर पत्रकार: डिजिटल सेंसरशिप, सत्ता और सवालों से डरती व्यवस्था
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Author: admin
ग़ाज़ा एक बार फिर खून से नहा गया है। इस बार निशाना सिर्फ़ मासूम बच्चे और मरीज़ नहीं बने, बल्कि सच की आवाज़ – पत्रकार – भी बने। सोमवार (25 अगस्त) को दक्षिणी ग़ाज़ा के खान यूनिस स्थित नासिर अस्पताल पर इज़रायली मिसाइलों ने कहर बरपाया। कम से कम 20 लोग मारे गए, जिनमें पाँच पत्रकार शामिल हैं। सोचिए, अस्पताल की छत पर कैमरा उठाए पत्रकार जब दुनिया को ग़ाज़ा की असलियत दिखाने की कोशिश कर रहे थे, तभी उन पर मिसाइल बरसाई गई। पहला हमला ऊपर की मंज़िल पर हुआ – जहाँ से लाइव कवरेज चल रहा था। कुछ…
image source : shutterstock.com मनोज अभिज्ञान- हम ऐसे युग में जी रहे हैं, जहां किसी व्यक्ति का अस्तित्व केवल उसके भौतिक शरीर तक सीमित नहीं है. आपका नाम, चेहरा, अंगुलियों के निशान, आंख की पुतली, बैंक खाता, वोटर आईडी, आधार नंबर, मेडिकल रिकॉर्ड, और मोबाइल लोकेशन—ये सब मिलकर आपका डिजिटल अवतार बनाते हैं. यह अवतार सर्वरों में संग्रहीत, अद्यतन और विश्लेषित होता रहता है, बिना आपके नियंत्रण के. यह सरकारों, निजी कंपनियों और उस तकनीकी ढांचे के अधीन है, जो आपके लिए अदृश्य है. यह परिवर्तन चुपके से हुआ. पहले पहचान के लिए राशन कार्ड, पासपोर्ट या वोटर कार्ड जैसे…
राजस्थान से निकली IAS चयन की खबर सिर्फ़ एक भर्ती विवाद नहीं है, बल्कि ये बताती है कि भारत के लोकतंत्र और संविधान को कैसे चुनिंदा अफ़सर और सत्ता तंत्र मिलकर ठेंगा दिखा रहे हैं। कुल 18 अधिकारी इंटरव्यू में बैठे, उनमें से 14 SC/ST/OBC समुदायों से, और सिर्फ़ 4 सवर्ण समुदाय से। पर नतीजा? 100% सीटें सवर्णों के नाम! और बाकी 14 योग्य, अनुभवी अफ़सर – सिर्फ़ उनकी जाति की वजह से बाहर फेंक दिए गए! सवाल ये है – क्या संविधान अब सिर्फ़ किताबों में रह गया है? डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस सामाजिक न्याय के लिए संविधान…
इसराइल ने यमन की राजधानी सना पर हमला कर दिया। आधिकारिक बयान में कहा गया है कि यह कार्रवाई हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों के जवाब में की गई। लेकिन सवाल उठता है – क्या यह वाकई सिर्फ “जवाबी हमला” है या फिर मध्य पूर्व में एक नए और ख़तरनाक युद्ध की पटकथा लिखी जा रही है? हमला कहाँ हुआ?:- इसराइली सेना ने खुले तौर पर एक्स (Twitter) पर पोस्ट कर दावा किया कि उसने सना में हूतियों के कई ठिकानों पर हवाई हमला किया। इनमें – राष्ट्रपति भवन से जुड़ा सैन्य इलाक़ा, पावर प्लांट्स, और फ़्यूल स्टोरेज…
भारत में लोकतंत्र और संविधान की दुहाई दी जाती है, लेकिन एक 26 साल का नौजवान मोहम्मद शोएब इस लोकतंत्र की असली तस्वीर बन गया है। गुजरात में बेरहमी से पीटा गया, दिल्ली-एनसीआर के अस्पतालों ने इलाज करने से मना कर दिया, और जब गाज़ियाबाद के एक अस्पताल ने भर्ती किया तो पहले 4,40,000 रुपये जमा करने की शर्त रखी! ये कहानी सिर्फ़ एक युवक की नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम का चारों तरफ़ से सड़ चुका चेहरा है। हमला और बेबसी:-14 अगस्त को मोहम्मद शोएब सूरत रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरते ही अज्ञात लोगों के हमले का शिकार…
20 अगस्त को मुंबई का आज़ाद मैदान गवाही दे रहा था – कि ग़ज़ा के लिए दर्द सिर्फ़ ग़ज़ा के मुसलमान या फ़िलिस्तीनी नहीं महसूस करते, बल्कि हिंदुस्तान की गली-गली, चौक-चौराहे और दिल-दिमाग़ भी उससे जुड़ गए हैं। करीब 250 लोग – नेता, कलाकार, छात्र, पत्रकार – सब एक साथ खड़े होकर इज़राइल की कार्रवाई को “जनसंहार” बता रहे थे। ये नज़ारा बताता है कि भारतीय समाज की नब्ज़ इंसानियत के लिए धड़कती है, न कि मज़हबी चश्मे से। अदालत का झटका – और जनता की जीत;- सोचिए, मुंबई पुलिस ने पहले इस सभा की इजाज़त देने से मना कर…
लातूर जिले में इस बार गणेशोत्सव और ईद-ए-मिलाद पर सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द्र को लेकर अभूतपूर्व कदम उठाए जा रहे हैं। प्रशासन और समाज दोनों स्तरों पर जिस तरह की सख़्ती और जागरूकता दिखाई दे रही है, वह आने वाले त्योहारों को शांति और भाईचारे के साथ मनाने की गारंटी देती है। गणेशोत्सव और ईद-ए-मिलाद के लिए उठाए गए कदम… बना रहे हैं लातूर को ‘लोहे के किले’ जैसा मज़बूत! क्योंकि अगर पुलिस और प्रशासन दोनों ठान लें कि शांति से त्योहार मनेंगे, चैन से लातूर जिएगा तो कोई मुश्किल नहीं इसके लिए सिर्फ कानून पर अमल ज़रूरी है। वरना…
कृष्ण प्रताप सिंह- अंदेशे तो पहले से जताए जा रहे थे, लेकिन अब देश के चुनाव आयोग ने जिस तरह सारी लोकलाज (जिसे लोकतांत्रिक बर्ताव का सबसे जरूरी तत्व बताया जाता है) बिसराकर अपनी (अ)विश्वसनीयता से जुड़े सारे सवालों की जवाबदेही की ओर पीठ कर ली, साथ ही चोर के कोतवाल को डांटने की तर्ज पर विपक्षी दलों व नेताओं के विरुद्ध हमलावर रवैया अख्तियार कर लिया है, उससे एक तरह से पुष्टि हो गई है कि हम नियंत्रित, प्रबंधित या निर्देशित लोकतंत्र में रहने को अभिशप्त हो गए हैं. वैसे इस बाबत यह कहना ज्यादा सही होगा कि देखते-देखते…
गुजरात में स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में बुर्के को आतंकवाद से जोड़ा स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर स्कूलों में बच्चों के नाटक देशभक्ति, एकता और आज़ादी के जज़्बे को दिखाने का माध्यम होते हैं। लेकिन गुजरात के भावनगर में नगर निगम द्वारा संचालित एक स्कूल ने ऐसा प्रयोग कर दिया, जिसने आज़ादी के उत्सव को विवाद और आलोचना में बदल दिया। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में छात्राओं को बुर्का पहनकर आतंकवादियों की भूमिका निभाते हुए दिखाया गया। वे हाथों में बंदूकें लिए मंच पर आती हैं और नृत्य करती छात्राओं पर गोलियां चलाती दिखती हैं। यह दृश्य…
राजस्थान के टोंक ज़िले का मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य (MCH) अस्पताल आज सिर्फ़ एक अस्पताल नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, पेशेवर आचरण और सामाजिक ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला बन चुका है। यहाँ एक मुस्लिम इंटर्न छात्रा उमामा और वरिष्ठ गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. इंदु गुप्ता के बीच हुआ विवाद अब सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक आग की तरह फैल चुका है। सवाल यह है कि क्या सफ़ेद कोट पहनने के बाद इंसान का धर्म अदृश्य हो जाता है, या फिर धार्मिक प्रतीकों को भी अस्पताल की सख़्त पेशेवर दुनिया में जगह मिलनी चाहिए? विवाद की चिंगारी कैसे भड़की?:- वायरल वीडियो में साफ़ दिखता…