राजस्थान से निकली IAS चयन की खबर सिर्फ़ एक भर्ती विवाद नहीं है, बल्कि ये बताती है कि भारत के लोकतंत्र और संविधान को कैसे चुनिंदा अफ़सर और सत्ता तंत्र मिलकर ठेंगा दिखा रहे हैं। कुल 18 अधिकारी इंटरव्यू में बैठे, उनमें से 14 SC/ST/OBC समुदायों से, और सिर्फ़ 4 सवर्ण समुदाय से। पर नतीजा? 100% सीटें सवर्णों के नाम! और बाकी 14 योग्य, अनुभवी अफ़सर – सिर्फ़ उनकी जाति की वजह से बाहर फेंक दिए गए! सवाल ये है – क्या संविधान अब सिर्फ़ किताबों में रह गया है? डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस सामाजिक न्याय के लिए संविधान में आरक्षण और समान अवसर का प्रावधान रखा था, उसे राजस्थान की चयन समिति ने खुलेआम ठुकरा दिया। मुख्य सचिव सुधांशु पंत की अध्यक्षता वाली इस समिति ने योग्यता की आड़ में जातिवाद को खड़ा कर दिया। यह कोई साधारण चूक नहीं है – यह है सिस्टमेटिक भेदभाव। जिसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव से सुरक्षा) और 16 (समान अवसर) पर सीधा हमला कहा जा सकता है। सवर्ण-केन्द्रित चयन: योग्यता का असली मतलब?
हंसराज मीणा का सवाल वाजिब है –”जब 14 योग्य अफसर SC/ST/OBC समुदाय से थे, तो एक भी क्यों नहीं चुना गया? क्या सभी अयोग्य थे? या फिर ‘योग्यता’ सिर्फ़ सवर्णों की जागीर है? ये वही “मेरिट” का झूठा तर्क है जिसे दशकों से पिछड़े और दलित समुदायों को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। असलियत ये है कि मेरिट = जाति + नेटवर्क + सत्ता का संरक्षण। यह सिर्फ़ अन्याय नहीं, बल्कि धोखा है। धोखा संविधान से। धोखा उन लाखों नौजवानों से, जो ये मानकर मेहनत करते हैं कि योग्यता के दम पर उन्हें भी मौका मिलेगा। और धोखा उन समुदायों से, जिनके नाम पर वोट माँगे जाते हैं लेकिन पद बाँटने की बारी आती है तो उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है।
राजनीति की पोल खुली:- कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का हमला सही है – “सरकार को SC, ST, OBC, MBC और अल्पसंख्यक वर्गों से एक भी योग्य अधिकारी नहीं मिला! यानी साफ है – भाजपा सरकार “36 कौम” की राजनीति करके सत्ता में तो आई, लेकिन ब्यूरोक्रेसी में जातिवादी अफ़सरों को तरजीह दी। इससे एक संदेश गया – ब्यूरोक्रेसी सिर्फ़ सवर्णों की बपौती है, बाक़ी सब ‘ग़ुलाम वर्ग’ हैं।
सुप्रीम कोर्ट और “क्रीमी लेयर” की बहस:- आज जब सुप्रीम कोर्ट में SC/ST आरक्षण पर “क्रीमी लेयर” लागू करने की बहस चल रही है, ये केस और भी ख़तरनाक संकेत देता है। अगर आर्थिक आधार पर “क्रीमी लेयर” लागू हुई तो SC/ST समुदाय से आने वाले सक्षम अफ़सर पूरी तरह बाहर कर दिए जाएँगे। और सवर्ण-प्रधान चयन समितियाँ फिर “मेरिट” के नाम पर सिर्फ़ अपने लोगों को चुनेंगी।
बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा था –”जाति के कारण होने वाले भेदभाव को दूर किए बिना सिर्फ़ आर्थिक आधार पर न्याय नहीं हो सकता।”आज वही साबित हो रहा है – अमीर या गरीब दलित/आदिवासी होना मायने नहीं रखता, सिस्टम उन्हें सिर्फ़ उनकी जाति से देखता है।
नतीजा – यह फैसला मिसाल नहीं, खतरनाक परंपरा है:- यह पहली बार है कि राजस्थान के इतिहास में IAS की सभी सीटें सिर्फ़ सवर्ण अधिकारियों से भरी गईं। अगर इसे मिसाल बना दिया गया तो आगे हर चयन में यही होगा – SC/ST/OBC सिर्फ़ फ़ॉर्म भरने के लिए रह जाएँगे, और अंतिम सूची हमेशा ‘एक ही जाति’ की होगी।
यह लोकतंत्र नहीं, “जातंत्र” है:- राजस्थान IAS चयन ने साफ़ कर दिया –यहाँ योग्यता नहीं, जाति तय करती है कि आप कहाँ पहुँचेंगे। यहाँ संविधान की बात सिर्फ़ भाषणों में होती है, असल में जातिवादी मानसिकता ही हावी रहती है। और यहाँ “समान अवसर” एक धोखा है, जो सिर्फ़ काग़ज़ पर लिखा है।
आख़िरी सवाल: क्या ये मामला सिर्फ़ ट्वीट और बयानबाज़ी में दबा दिया जाएगा? या फिर वाक़ई सरकार और न्यायपालिका इस जातिवादी “सिस्टमेटिक धोखाधड़ी” को चुनौती देंगे? क्योंकि अगर नहीं, तो आने वाले समय में भारतीय ब्यूरोक्रेसी – लोकतांत्रिक भारत की नहीं, बल्कि जातिवादी भारत की पहचान बनकर रह जाएगी।