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Home»विदेश

ग़ज़ा के लिए आज़ाद मैदान की हुंकार – जब मुंबई बोला, अरब देश खामोश क्यों?

adminBy adminAugust 26, 2025 विदेश No Comments4 Mins Read
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Azad Maidan Mumbai protest for Gaza solidarity, Indian citizens raising voice against Israel actions, Arab silence questioned
20 August ko Mumbai ka Azad Maidan gungunaya – Gaza ke liye Hindustan ki awaaz uthti dikhi, jabki Arab duniya khamosh rahi.
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20 अगस्त को मुंबई का आज़ाद मैदान गवाही दे रहा था – कि ग़ज़ा के लिए दर्द सिर्फ़ ग़ज़ा के मुसलमान या फ़िलिस्तीनी नहीं महसूस करते, बल्कि हिंदुस्तान की गली-गली, चौक-चौराहे और दिल-दिमाग़ भी उससे जुड़ गए हैं। करीब 250 लोग – नेता, कलाकार, छात्र, पत्रकार – सब एक साथ खड़े होकर इज़राइल की कार्रवाई को “जनसंहार” बता रहे थे। ये नज़ारा बताता है कि भारतीय समाज की नब्ज़ इंसानियत के लिए धड़कती है, न कि मज़हबी चश्मे से। अदालत का झटका – और जनता की जीत;- सोचिए, मुंबई पुलिस ने पहले इस सभा की इजाज़त देने से मना कर दिया था। वजह? “क़ानून-व्यवस्था की चिंता।” लेकिन जब मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुँचा तो अदालत ने साफ़ कह दिया – भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) हर नागरिक को शांतिपूर्ण सभा का हक़ देता है। यानी, ग़ज़ा की पीड़ा पर बोलने से कोई रोक नहीं सकता। ये सिर्फ़ कानूनी जीत नहीं, बल्कि इंसानियत की लड़ाई में जनता की जीत थी।भारतीय समाज की आवाज़ –पत्रकार पी. साइनाथ ने गांधी को याद दिलाया – “फ़िलिस्तीन अरबों की ही है, जैसे इंग्लैंड अंग्रेज़ों की और फ्रांस फ्रांसीसियों की।” कांग्रेस के हुसैन दलवाई हों, CPI(M) के नेता हों, समाजवादी पार्टी की शबाना खान हों या अभिनेत्री स्वरा भास्कर – सबने एक स्वर में कहा कि ग़ज़ा में हो रहा नरसंहार बंद होना चाहिए। एक कार्यकर्ता ने तो सफेद कपड़े में लिपटे खून-लाल रंग से सने बच्चे का पुतला उठाकर पूरी दुनिया को झकझोर दिया – “अगर ये बच्चे तुम्हारे होते तो?” भारत में लोगों ने साफ़ दिखा दिया कि उनके लिए ये “धर्म” का नहीं बल्कि “इंसानियत” का सवाल है। और अब सवाल – अरब-मुस्लिम देशों से!:- लेकिन, अब सबसे बड़ा सवाल यही है – जब हिंदुस्तान की गली-गली से ग़ज़ा की पीड़ा पर आवाज़ उठ रही है, तो वो अरब और मुस्लिम देश कहाँ हैं जिनसे फ़िलिस्तीनियों को सबसे ज़्यादा उम्मीद थी? सऊदी अरब – अरब दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त – चुप्पी साधे हुए है! यूएई और क़तर – जिनके पास मीडिया और दौलत की ताक़त है – सिर्फ़ बयानबाज़ी करते हैं, ठोस कदम नहीं उठाते। तुर्की और ईरान – बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं, लेकिन ग़ज़ा की नाकाबंदी आज भी जस की तस है। ओआईसी (इस्लामिक देशों का संगठन) – जिसका मक़सद ही मुसलमानों की आवाज़ बनना है – वह भी सिर्फ़ बैठकों और बयानों तक सीमित है। हक़ीक़त ये है कि – अरब की सल्तनतें अपने व्यापारिक और सामरिक हितों में इतनी डूबी हैं कि ग़ज़ा के बच्चों की चीख़ें उन्हें सुनाई ही नहीं देतीं। भारतीय जनता बनाम अरब की खामोशी:- आज स्थिति यह है कि – भारत का आम नागरिक, कलाकार, पत्रकार और छात्र ग़ज़ा के बच्चों के लिए सड़कों पर उतर रहा है। लेकिन अरब दुनिया, जिसके महलों की नींव में तेल और सोना है, वो चुपचाप अमरीका-इज़राइल की डील देख रही है। क्या यह शर्मनाक नहीं? क्या यह दोहरा मापदंड नहीं? जहाँ भारतीय जनता इंसानियत की लड़ाई में शामिल है, वहीं अरब के शासक “तेल के मुनाफ़े” में व्यस्त हैं। ग़ज़ा की उम्मीद कहाँ है?:- आज ग़ज़ा के मासूम बच्चों के लिए सबसे बड़ी उम्मीद – न अरब है, न मुस्लिम दुनिया। बल्कि उम्मीद है – उन आम लोगों से जो इंसानियत के लिए खड़े होते हैं। और मुंबई का आज़ाद मैदान इसका सबूत है।

सवाल उठता है – अगर भारत जैसे देश में लोग सड़कों पर उतरकर ग़ज़ा के लिए आवाज़ उठा सकते हैं, तो अरब और मुस्लिम देश क्यों नहीं? क्यों उनकी ज़बान पर ताले हैं? क्या तेल और डॉलर, इंसानियत से ज़्यादा क़ीमती हो गए हैं?

आख़िरकार सच्चाई यही है –आज ग़ज़ा को हथियारों से नहीं, बल्कि इंसानियत की सच्ची आवाज़ से बचाया जा सकता है। और ये आवाज़ भारत की धरती से गूँज रही है…जबकि अरब के महल, खामोशी में डूबे हुए हैं।

Arab Countries Silence on Gaza Bombay High Court Gaza Case Gaza Solidarity in India Indian Citizens Support Palestine Israel Palestine Conflict 2025 Mumbai Azad Maidan Protest P Sainath on Gaza Mumbai Protest Swara Bhaskar Gaza Protest Mumbai
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