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Home»भारत

आज़ादी का अपमान” या सांप्रदायिक रंग?

adminBy adminAugust 24, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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Bhavnagar Gujarat school play controversy showing burqa as terrorism Independence Day 2025 play sparks outrage over burqa depiction Students dressed in burqa shown as terrorists in Gujarat school Debate over religion, burqa and terrorism portrayal in Indian education
image credit : stock.adobe.com
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गुजरात में स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में बुर्के को आतंकवाद से जोड़ा

स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर स्कूलों में बच्चों के नाटक देशभक्ति, एकता और आज़ादी के जज़्बे को दिखाने का माध्यम होते हैं। लेकिन गुजरात के भावनगर में नगर निगम द्वारा संचालित एक स्कूल ने ऐसा प्रयोग कर दिया, जिसने आज़ादी के उत्सव को विवाद और आलोचना में बदल दिया।

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में छात्राओं को बुर्का पहनकर आतंकवादियों की भूमिका निभाते हुए दिखाया गया। वे हाथों में बंदूकें लिए मंच पर आती हैं और नृत्य करती छात्राओं पर गोलियां चलाती दिखती हैं। यह दृश्य केवल एक नाटक का हिस्सा था, लेकिन जिस अंदाज़ में बुर्के को सीधे आतंकवाद से जोड़ा गया – उसने पूरे देश में सवालों और आलोचनाओं की झड़ी लगा दी। हालांकि आज तक कोई भी बुर्के वाली महिला आतंकवादी गतिविधियों में नहीं पाई गईं जबकि हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा हिन्दू युतियों को आतंकी ट्रेनिंग लेते हुए सिर्फ देखा ही नहीं गया बल्कि आतंकी गतिविधियों में लिप्त भी पाया गया है।

 बड़ा सवाल: आतंकवाद की पोशाक = बुर्का ही क्यों?:- क्या स्कूल प्रशासन यह संदेश देना चाहता था कि आतंकवादियों की पहचान सिर्फ़ मुस्लिम प्रतीकों से होती है?

आतंकवाद की कोई जाति या धर्म नहीं होता, लेकिन इस नाटक ने कहीं न कहीं यही धारणा बनाने की कोशिश की कि “आतंकवाद का मतलब बुर्का”। आलोचकों का कहना है कि बच्चों के ज़ेहन में इस तरह की छवियाँ डालना सीधे-सीधे सांप्रदायिक ज़हर बोना है।

नाटक का बहाना या छुपी हुई सोच? :-प्रधानाचार्य राजेंद्र दवे का बयान आया –

“छात्राओं को बस काले कपड़े पहनने थे, उन्होंने बुर्का पहनने का चुनाव खुद किया। हमारा मकसद किसी समुदाय को ठेस पहुँचाना नहीं था।” लेकिन सवाल उठता है –

क्या एक स्कूल प्रशासन इतना अनजान और मासूम हो सकता है कि उसे समझ न आए कि आज के माहौल में “बुर्का = आतंकी” दिखाना कितना संवेदनशील मुद्दा है?

क्या यह वाकई बच्चों की “पसंद” थी, या इसके पीछे कोई पूर्व-निर्धारित संदेश छिपा था?

समाज में गहरी चोट:- सोशल मीडिया पर कई लोगों ने कहा कि इस तरह के नाटक आने वाली पीढ़ी को धर्म के आधार पर बाँटने का हथियार बनेंगे। आलोचकों का कहना है कि यह नाटक देशभक्ति से ज़्यादा नफ़रत का पाठ पढ़ा गया। अगर आतंकवादियों की पोशाक बनानी थी तो काले कपड़े, नकली बंदूकें या मास्क काफ़ी थे – फिर बुर्के की ज़रूरत क्यों पड़ी?

प्रशासन की सफाई और जांच:- भावनगर नगर निगम के अधिकारी मुंजाल बलदानिया ने कहा:“वीडियो की जांच चल रही है। स्कूल प्रिंसिपल और शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस भेजा जाएगा। जांच पूरी होने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।” लेकिन क्या यह मामला सिर्फ़ नोटिस और औपचारिक जांच तक सिमट जाएगा? या फिर देश को यह मान लेना चाहिए कि अब देशभक्ति के नाम पर सांप्रदायिक संदेशों का मंचन सामान्य होता जा रहा है?

आज़ादी का जश्न या नफ़रत का प्रदर्शन?:- स्वतंत्रता दिवस वो दिन है, जब हम धर्म और मज़हब से ऊपर उठकर अपने देश के लिए एकजुट होते हैं। लेकिन भावनगर का यह दृश्य बता रहा है कि आज़ादी का मंच भी अब राजनीतिक और सांप्रदायिक रंगों से अछूता नहीं रहा। अगर बच्चों के दिमाग में ही यह भर दिया जाए कि “बुर्का मतलब आतंकवाद” – तो आने वाले कल में हम किस तरह के नागरिक तैयार कर रहे हैं?

असली खतरा:- यह घटना सिर्फ़ एक स्कूल का मामला नहीं, बल्कि यह एक सांप्रदायिक मानसिकता का आईना है। आतंकवाद से सबसे ज़्यादा मुस्लिम समुदाय खुद पीड़ित रहा है। लेकिन उन्हें ही आतंकी का चेहरा बनाकर पेश करना गहरी नफ़रत का खेल है।

स्वतंत्रता दिवस पर यह नाटक हमें याद दिलाता है कि अगर शिक्षा के मंदिर में ही बच्चों को “धर्म के आधार पर आतंकवादी” दिखाया जाएगा, तो आज़ादी की असली आत्मा कहाँ बचेगी? असली सवाल यही है: क्या अब देशभक्ति का मतलब भी एक मज़हब को नीचा दिखाना हो गया है? गुजरात के सामाजिक और मुस्लिम संगठनों  को चाहिए वो स्कूल प्रशासन के खिलाफ क़ानूनी करवाई करवाए। अगर भाजपा सरकार करवाई नहीं करती तो अदालत जाए।

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