बिहार चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की evm में धांदलियों के बाद प्रचंड जीत के ठीक बाद, असम के स्वास्थ्य मंत्री अशोक सिंघल द्वारा पोस्ट की गई फूलगोभी के खेत की एक तस्वीर ने भारतीय राजनीति की दिशा, भाषा और जिम्मेदारियों पर एक बार फिर कड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
यह कोई मासूम कृषि-चित्र नहीं था; यह 1989 के भागलपुर मुस्लिम नरसंहार के सबसे भयावह प्रतीक की सीधी ओर इशारा करता है, जहाँ 110 से अधिक मुस्लिम ग्रामीणों को मारकर उसी खेत में दफना दिया गया था, और ऊपर गोभी के पौधे बो दिए गए थे। जब कोई ट्रोल अकाउंट ऐसा ‘मीम’ पोस्ट करे, तो यह एक बात है। लेकिन जब एक राज्य का मंत्री, संवैधानिक शपथ लेकर, चुनावी जीत के जश्न में नरसंहार की सांकेतिक महिमा गढ़े तो यह सिर्फ विवाद नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की बुनियादी नैतिकता पर हमला बन जाता है।
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क्या यह सिर्फ पोस्ट है या आधिकारिक स्वीकृति का ऐलान?
अशोक सिंघल भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं, कोई गुमनाम ऑनलाइन ट्रैड नहीं। ऐसे में उनका यह पोस्ट सिर्फ “व्यक्तिगत विचार” नहीं माना जा सकता। सवाल यह उठता है: क्या भाजपा अब उन प्रतीकों को भी अपनाने जा रही है जो अब तक सिर्फ ऑनलाइन कट्टरवाद की भाषा थी ? ‘गोभी की खेती’ का अर्थ मुसलमानों की कब्रों पर बोई गई घृणा से है।
फूलगोभी वाला मीम, हिंदुत्व ट्रैड-कल्चर में मुसलमानों के संहार का अप्रत्यक्ष नारा माना जाता है। यह भाषा जिसे कभी भाजपा आधिकारिक रूप से अपनाने से बचती थी अब सीधे सत्ता प्रतिष्ठान के मंत्री की पोस्ट का हिस्सा है। यह परिवर्तन मामूली नहीं है; यह हिंदुत्व राजनीति के भीतर असहमति पैदा करने वाली एक नई, अधिक उग्र धारा का प्रवेश है और वह भी मुख्यधारा में।
ट्रैड-कल्चर: ऑनलाइन कट्टरवाद का मुख्यधाराकरण
ट्रैड्स” इंटरनेट पर उभरी एक हिंदुत्ववादी कट्टर धारा खुद को “सभ्यता का योद्धा” मानती है। उनकी भाषा बेहद हिंसक होती है: मुसलमानों को “गोभी” के रूप में दिखाना, दलितों को “कॉकरोच” बताना। “क़ब्र”, “फांसी”, “क्लीन-अप”, “बाग़ की निराई” जैसे सांकेतिक शब्दों में जनसंहार की भाषा। बलात्कार पीड़ितों पर पेशाब करते मीम्स। और पेपे द फ्रॉग जैसे पश्चिमी नियो-नाज़ी प्रतीकों का भगवाकरण। यह हिंसक विजुअल-कल्चर अब तक भाजपा के औपचारिक प्रचार से बाहर रहता था।
अब मामला उलटा हो गया है: बीते एक साल में भाजपा के आधिकारिक अकाउंट्स ने पेपे द फ्रॉग। अल्पसंख्यकों को “लूट”, “अतिक्रमण”, “खतरा” बताने वाली ग्राफिक्स। बुर्का पहनी महिलाओं को उपहासात्मक प्रतीकों में बदलना जैसी सामग्री साझा की है। 2022 में गुजरात भाजपा ने दाढ़ी-टोपी पहने लोगों को फांसी पर टांगा दिखाते मीम साझा किया था। अब 2024–25 में यह ट्रेंड और खुलकर दिखने लगा है।
सवाल सिर्फ नैतिक नहीं कानूनी भी है
असम मंत्री की पोस्ट जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) 1951 की दो धाराओं के प्रत्यक्ष उल्लंघन में आती है। धारा 123(3A): धर्म के आधार पर घृणा/शत्रुता फैलाकर चुनाव को प्रभावित करना, भ्रष्ट आचरण। धारा 125: धर्म के आधार पर शत्रुता भड़काने पर तीन वर्ष की सजा या जुर्माना।
अगर यह पोस्ट किसी विपक्षी नेता ने किया होता, तो संभवतः FIR और टीवी चैनलों पर 24×7 ट्रायल शुरू होता। लेकिन जब सत्ता पक्ष का मंत्री ऐसा करे और कोई कार्रवाई न हो तो यह कानून की समानता पर प्रश्नचिह्न है।
क्या यह संयोग है कि यह पोस्ट ‘जीत’ के बाद किया गया? लोकतंत्र में जीत जश्न देती है लेकिन जीत के नाम पर अल्पसंख्यकों को ‘खेत में दफनाने’ का रूपक? यह सिर्फ असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि एक संकेत है: सत्ता का एक हिस्सा अब हिंसक सांकेतिकता को वैध राजनीतिक भाषा मानने लगा है। यह एक ऐसे भारत की ओर इशारा है जहाँ चुनाव जीतना “अधिकार” और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान “कमज़ोरी” माना जाने लगे।
भागलपुर से लेकर आज तक इतिहास की कब्रों का इस्तेमाल राजनीति में
भागलपुर दंगा आज भी भारत के सबसे भयावह सामूहिक नरसंहारों में से एक है। 900 से अधिक मुसलमान मारे गए। 110 को एक साथ दफनाकर खेत में गोभी बोई गई। बच्चे तक नहीं बचे। इस नरसंहार की याद को “मीम”, “मज़ाक”, “सांकेतिक जीत” बनाना सामाजिक क्रूरता की पराकाष्ठा है। यह उस ऐतिहासिक घाव पर नमक नहीं, खुला तेज़ाब है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या यह सब प्रधानमंत्री की जानकारी के बिना है? टीएमसी सांसद साकेत गोखले के शब्दों में: “यह कोई ट्रोल नहीं, असम का मंत्री है। इसका मतलब है कि यह प्रधानमंत्री कार्यालय की मंजूरी से हुआ।” यह आरोप कितने सही हैं, यह तो जांच का विषय है। लेकिन एक तथ्य साफ है: भाजपा ने अब तक इस पोस्ट की निंदा नहीं की। और राजनीति में खामोशी भी एक बयान होता है। “गोभी की खेती” पोस्ट सिर्फ एक तस्वीर नहीं, चुनावी हिंदुत्व की नई शब्दावली है।
यह वह शब्दावली है जो: इतिहास के नरसंहारों को मीम बनाती है। अल्पसंख्यकों को उपमानों में बदल देती है। हिंसा को सांस्कृतिक चुटकुले के रूप में पेश करती है। और फिर राज्य के मंत्री उस भाषा को ‘आधिकारिक’ बना देते हैं। भारत का लोकतंत्र सिर्फ वोटों से नहीं टूटता, बल्कि राजनीतिक भाषा की गिरावट से टूटता है। आज भारतीय राजनीति उसी चौराहे पर खड़ी है। अगर नरसंहार को संकेतात्मक जश्न का प्रतीक बना दिया जाए, तो अगला सवाल यह नहीं बचेगा कि यह भाषा कहां तक जाएगी बल्कि यह होगा कि हम कहाँ जाकर रुकेंगे?
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