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भागवत का दावा और संघ का इतिहास: तिरंगे के प्रति दोहरी कहानी

क्या RSS ने हमेशा तिरंगे का सम्मान किया? मोहन भागवत के दावे बनाम ऐतिहासिक रिकॉर्ड का पूरा सच.
adminBy adminNovember 14, 2025 भारत No Comments3 Mins Read
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मोहन भागवत ने हाल ही में यह दावा किया कि संघ ने स्थापना के बाद से “राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा)” का सम्मान, संरक्षण और सशक्त समर्थन किया है। लेकिन इस दावे के सामने कई ऐतिहासिक दस्तावेज, संगठन की आदतें और सार्वजनिक बयानों की श्रृंखला ऐसी है जो इस दावे को चुनौती देती है।

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image source: shutterstock.com

संघ का तिरंगे के प्रति व्यवहार और इतिहास

तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज घोषित करने के बाद भी, संघ अपने मुख्यालय (नागपुर) में लंबे समय तक तिरंगा फहराने का क्रम नियमित रूप से नहीं अपनाया। उदाहरण के लिए, यह कहा गया कि तिरंगा लगभग 52 वर्ष तक संघ के मुख्यालय पर फहराया नहीं गया था। संघ की मुखपत्र Organiser ने 14 अगस्त 1947 में तिरंगे को लेकर कटु टिप्पणी की थी: “तीन शब्द अपने आप में एक बुराई है, और तीन रंगों वाला ध्वज निश्चित रूप से एक बहुत ही खराब मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न करेगा”।

एक अन्य उदाहरण: राजस्थान के मंत्री द्वारा यह कथन कि संघ “हमेशा राष्ट्रीय ध्वज एवं राष्ट्रीय गान के विरोधी रहा है।” संघ प्रमुख भागवत ने कथित रूप से कहा है कि “भगवा ध्वज हमारी “तत्त्व” की प्रतीक है” (सिर्फ राष्ट्रीय ध्वज नहीं)। संघ के पुराने वक्तव्यों में यह निहित रहा है कि उन्होंने तिरंगे को “अपने परंपरागत हिंदू ध्वज – भगवा” का विकल्प माना।

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image source: navbharatlive.com

दावे बनाम वास्तविकता

भागवत का दावा कि “संघ ने हमेशा तिरंगे का संरक्षण किया” — यह इतिहास-दस्तावेजों से मेल नहीं खाता। उदाहरण के तौर पर, नागपुर मुख्यालय पर तिरंगा लंबे समय तक नियमित रूप से फहराया नहीं गया। संघ द्वारा तिरंगे को लेकर अभिव्यक्त आलोचनाएँ और भगवा ध्वज को प्राथमिकता देना इस तथ्य के विपरीत है कि “हमने शुरू से तिरंगे को सम्मान दिया है।” हालाँकि हाल के वर्षों में संघ ने कुछ सार्वजनिक कार्यक्रमों में तिरंगा अपनाया है (उदाहरण के तौर पर सोशल मीडिया प्रोफाइल में) — लेकिन यह “हमेशा से” वाला दायित्व जाहिर नहीं करता।

हाल के बयान-प्रकरण

2025 में केरल के एक भाजपा नेता एन. सिवाराजन ने कहा कि “राष्ट्रीय ध्वज को भगवा ध्वज से बदल दिया जाना चाहिए”। यह बयान संकेत करता है कि संघ-संबंधित लोग अभी भी भगवा ध्वज को महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में देखते हैं — जो “हमेशा तिरंगे का सम्मान किया है” वाले दावे से सीधे टकराता है। दूसरे शब्दों में, व्यवहार और वक्तव्य दोनों ही इस बात की ओर इशारा करते हैं कि संघ ने एक समय तक तिरंगे को प्राथमिकता नहीं दी थी, बल्कि भगवा ध्वज को प्रमुख माना था।

इस विश्लेषण के आधार पर यह पाया जा सकता है कि- संघ का दावा कि “उन्होंने हमेशा तिरंगे का सम्मान किया” — इतिहास एवं व्यवहार के अनुरूप नहीं दिखता। संघ के पुराने वक्तव्यों, व्यवहार और आज तक चल रही प्रतीक-प्रथाओं से यह संकेत मिलता है कि उन्होंने भगवा ध्वज को एक प्रमुख प्रतीक के रूप में स्वीकार किया है और तिरंगे को अपने शुरुआती वर्षों में प्राथमिक रूप से अपनाया नहीं था।

यह कहना कि संघ ने “स्वेच्छा से” राष्ट्र-ध्वज को स्वीकार किया है — कम-से-कम संघ के दस्तावेज़ीय इतिहास के अनुसार — सापेक्ष है, न कि अविवादित तथ्य। इसलिए भागवत का यह कथन कि “संघ ने हमेशा तिरंगे का सम्मान और संरक्षण किया” — विश्लेषक दृष्टि से देखा जाए तो भ्रामक या बहुत विस्तार में सत्य नहीं कहा जा सकता।

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