एनडीए की जीत और उठते सवाल
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे आए हैं और उनमें एक मजबूत एनडीए जीत दिख रही है। लेकिन कई
विश्लेषकों, विपक्षी पार्टियों और नागरिकों के बीच यह गहरी चिंता है कि इन नतीजों और exit-poll के अनुमानों में
बड़ा फर्क नज़र आरहा है, और इस दूरी को देखते हुए लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
Exit-poll अनुमान vs वास्तविक नतीजे
कई exit-polls ने पहले ही एनडीए को स्पष्ट बहुमत देने का अनुमान लगाया था। लेकिन विपक्ष और विश्लेषक यह तर्क
दे रहे हैं कि नतीजे और अनुमान के बीच “कहानी में कुछ गड़बड़ है”:
उदाहरण के लिए, हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि RJD सहित विपक्ष ने “वोट चोरी” और
गिनती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की संभावना जताई है।
यह नमूना उस व्यापक विश्वास का प्रतीक है कि सिर्फ exit-poll गलत नहीं थे, बल्कि पूरे चुनावी यंत्र में गड़बड़ है।
धोखाधड़ी और ईवीएम में गड़बड़ी
CCTV गैप और स्ट्रांग रूम संदिग्धताएँ
कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़, महागठबंधन ने यह दावा किया है कि गिनती केंद्रों में CCTV बंद हो गए, और
“अनधिकृत” वाहनों को प्रवेश मिला।
EVM त्रुटियाँ और झड़पें
पटना प्रेस से पता चलता है कि मतदान की शुरुआत में कुछ बूथों पर EVM त्रुटियां और स्थानीय झड़पों की खबरें भी
आई हैं। याद रहे कि बिलकुल इसी तरह का मामला महाराष्ट्र विधान सभा चुनावों में भी देखा गया था।
मतदाता सूची में हेरफेर (Voter list manipulation)
विपक्ष ने दावा किया कि SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर
हेरफेर हुआ। 6 मिलियन (60 लाख) नाम हटाए गए हैं। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों का खंडन किया है
और कहा है कि वह निष्पक्ष है।
EVM बैलेट पेपर में नया बदलाव
इसके अलावा, चुनाव आयोग ने EVM बैलेट पेपर में बदलाव किया है: इस बार उनका बैलेट पेपर पर रंगीन फोटो होगा,
जो ओहदे और पारदर्शिता बढ़ाने का एक कदम माना जा रहा है।
महाराष्ट्र चुनाव का उदाहरण और बढ़ती चिंताएँ
जैसा कि महाराष्ट्र में भी चुनावों के बाद कुछ इलाकों में धांधली की खबरें आई थीं — और इससे EVM और चुनावी
पारदर्शिता पर सार्वजनिक अविश्वास बढ़ा था। यह डर बिहार में भी दोहराया जा रहा है: कि यदि गिनती या मशीनों
पर भरोसा नहीं है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की नींव हिल सकती है।
विपक्ष और नागरिक समुदाय अब एक मजबूत मांग उठा रहे हैं कि EVM हटाकर फिर से बैलेट पेपर पर चुनाव हों
ताकि वोट की गिनती में पारदर्शिता बढ़े और लोगों का विश्वास लौटे लेकिन बीजेपी सरकार इसपे राज़ी नहीं है, क्यों ?
लोकतंत्र की रक्षा: चुनौतियाँ और समाधान
यदि लोकतंत्र को बचाना है, तो विपक्ष और राष्ट्रीय स्तर पर India गठबंधन और अन्य दलों को एकजुट होकर EVM के
बजाय पेपर बैलेट की मांग करनी चाहिए।
अगर बीजेपी इसपर राज़ी न हो — ज़ाहिर है अगर वो evm की बदौलत ही सत्ता पर काबिज़ है — तो कभी नहीं चाहेगी कि
बैलेट पेपर से चुनाव हों। लिहाज़ा विपक्ष “चुनाव बहिष्कार” कर दे तब तक जब तक बैलेट पेपर पर चुनाव न हो जाए।
यह एक जोखिम भरी रणनीति हो सकती है लेकिन इसके अलावा कोई रास्ता नज़र नहीं आता लोकतंत्र को बचाने का।
चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की जरूरत
साथ ही चुनाव आयोग (ECI) पर दबाव डाला जाना चाहिए कि वह:
- वर्तमान गिनती की स्वतंत्र समीक्षा कराए।
- CCTV निगरानी, स्ट्रांग रूम सुरक्षा जैसी कमजोरियों को दूर करे।
नागरिक समाज और मीडिया की भूमिका
नागरिकों, विपक्षी दलों और गैर गोदी मीडिया को मिलकर “लोकतंत्र-सुरक्षा अभियानों” (democracy watchdog campaigns)
को चलाना चाहिए ताकि चुनावी पारदर्शिता पर लगातार ध्यान रहे।
निष्कर्ष: भरोसे का संकट
बिहार में exit-poll और वास्तविक नतीजों के बीच का बड़ा अंतर, साथ ही धोखाधड़ी के आरोप, यह संकेत देते हैं कि
लोकतंत्र में भरोसे का संकट है।
यदि यह विश्वास संकट नहीं सुलझा तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर तो हो चुकी हैं अब वो ढह जाएगा। सक्रिय नागरिकों,
विपक्षी दलों और स्वतंत्र संस्थानों को मिलकर इसे मजबूती देनी होगा।
यह समय सिर्फ राजनीतिक जीत-हार का नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रणाली की रक्षा का है। यदि विपक्ष, जनता और
संस्थान साथ न आएं, तो भविष्य में हर चुनाव में इसी तरह की शंकाएं और कथित धांधलियाँ उभर सकती हैं।
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