मोहम्मद अखलाक की बिसाहड़ा लिंचिंग (2015) की सालगिरह दरअसल सिर्फ एक दुखद घटना नहीं है, बल्कि हमारे लोकतंत्र की चिंताजनक प्रवृत्तियों का लगातार रीप्ले का प्रमाण बन गई है। अब, करीब एक दशक बाद, यूपी सरकार ने उन दस आरोपियों के खिलाफ मामले वापस लेने की मांग की है जिन पर हत्या, चोट पहुँचाने, धमकी और अपमान जैसे संगीन आरोप थे। यह वही राज्य है जहाँ ‘गौरक्षा’ के नाम पर हिंसा का एक नेटवर्क धीरे-धीरे अपनी पकड़ बना रहा है।
एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
source : huffingtonpost.com
न्याय की मांग या राजनीति का खेल?
28 सितंबर, 2015 को दादरी, गौतम बुद्ध नगर के बिसाहड़ा गांव में भीड़ ने मो. अखलाक पर यह संदेह जताया कि उन्होंने अपने फ्रिज़ में गोमांस रखा है और बेरहमी से उनकी पीट-पीटकर हत्या कर दी। पुलिस ने कुल 18 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें नाबालिग भी शामिल थे। जिन पर IPC की धारा 302 (हत्या), 307, 323, 504, 506 जैसी गंभीर धाराओं में आरोप लगे।
लेकिन अब सरकारी वकील ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के अंतर्गत मुकदमा वापस लेने की मांग की है। यानी, अभियोजन पक्ष खुद कह रहा है कि ये मामले वापस लिए जाएँ। अगर यह मामला वापस हो जाता है, तो यह न सिर्फ व्यक्तिगत अभियुक्तों की राहत होगी, बल्कि एक संकेत होगा कि गौरक्षा के नाम पर हिंसा करने वालों के खिलाफ कानून की मार कमज़ोर पड़ रही है।
योगी आदित्यनाथ और ‘अपेक्षित मुआफ़ी’ की परिक्रमा
यह कोई isolated घटना नहीं है। योगी सरकार की छवि “अपराधों पर कड़ा रुख़” लेने वाली और उनकी वास्तविक नीतियों में अक्सर एक गहरा असमानान्तर नजर आता है।
मुकदमे वापस लेने का कानून
दिसंबर 2017 में, यूपी विधानसभा ने Uttar Pradesh Criminal Law (Composition of Offences and Abatement of Trials) (Amendment) Act, 2017 पास किया, जिससे लगभग 20,000 मुकदमे राजनीतिक कारणों से “गंभीर नहीं” माने जाने वाले आरोपों में वापस लिए जाने के इसी कानून के तहत, योगी पर 1995 में दर्ज एक मामला निषेधाज्ञा उल्लंघन (section 188 IPC) वापस ले लिया गया था। इस कदम को विपक्ष और अन्य आवाज़ों ने “राजनीतिक माफ़ी” का असली चेहरा कहा।
अपील और सफ़ाई
योगी आदित्यनाथ ने बार-बार कहा है कि उन पर लगे अधिकांश मुकदमे “राजनीतिक प्रेरित” थे। लेकिन आलोचक तर्क देते हैं कि यह सिर्फ व्यक्तिगत सफ़ाई नहीं है, यह एक संरचनात्मक रिवर्स मैकेनिज्म है, जो राजनीतिक नेताओं को अपराधों की जवाबदेही से बचने का रास्ता दे सकता है।
विपक्ष का डर और लोकतांत्रिक चेतावनी
यूपी कानून मंत्री ने कहा था कि सभी मामले वापस नहीं लिए जाएंगे, केवल “राजनीतिक कारणों से दर्ज” आरोप हटाए जाएंगे। लेकिन इस नीति के पीछे के लॉजिक्स और उसका दायरा खुलासा नहीं हुआ है, और ऐसे में आम नागरिकों का भरोसा टूटना स्वाभाविक है।
लिंचिंग और चुनिंदा अमनौतिकता “जंगल राज” की राह?
जब एक ऐसी घटना हो, जहां भीड़ अपने हाथ में न्याय ले लेती है और फिर वह भीड़ कानूनी मामलों में पीछा किए जाने की बजाय मुकदमें वापस होने की मांग कर सकती है तो यह केवल अलगाव में हुआ अतिशयोक्ति नहीं रह जाता। यह लोकतंत्र की कमजोर कड़ी बन जाता है।
गौरक्षा-हिंसा नेटवर्क
मो. अखलाक की हत्या सिर्फ एक किस्सा नहीं, बल्कि गौरक्षा के नाम पर हिंसा के बड़े ट्रेंड की निशानी है, जिसे राजनीतिक संरक्षण मिलने की आशंका बढ़ रही है। मुकदमे वापस करने की नीति = संदेश: जब राज्य खुद कहे कि ऐसे गंभीर मामले वापस लिए जाएँ, तो आम लोगों को यह डर लग सकता है कि हिंसा के बाद ‘क़ानून की मार’ कम पड़ सकती है।
संविधान और विश्वास पर दबाव
लोकतंत्र में सबसे मजबूत मोहरा यह है कि कोई भी नागरिक हिंसा या हत्याओं के बाद भी कानूनी प्रक्रिया के तहत न्याय की उम्मीद कर सके। जब यह उम्मीद कमज़ोर हो जाए, तब ‘जंगल राज’ की चेतावनी साकार होती नज़र आती है, एक वहम नहीं, संभावित वास्तविकता। हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ सिर्फ आरोप वापस लेना मामला नहीं रहा, बल्कि यह एक राजनीतिक और नैतिक जैवमंडल बनता जा रहा है। अगर यह प्रवृत्ति जारी रही, तो: न्याय व्यवस्था पर भरोसा गिर सकता है।
भविष्य में भीड़ हिंसा अनियंत्रित हो सकती है, जिसे कानूनी प्रक्रिया द्वारा नियंत्रित करने का मतलब खो दिया जाएगा। “गौरक्षा” जैसे नारों के नाम पर किए गए अपराधों को राजनीतिक संरक्षण का बहाना मिल सकता है। इसीलिए, यह समय है कि हम “जंगल राज” का न केवल भय देखें, बल्कि उसे रोकने की रणनीति बनाएं। सवाल उठाने, जाँच की मांग करने और लोकतंत्र की रक्षा करने का कर्तव्य हम सभी का है ताकि हमारी न्यायपालिका, हमारी सरकार और हमारे समाज में यह संदेश साफ़ हो जाए कि कोई भी हिंसा, चाहे धर्म के नाम पर हो या नहीं, कानून से बच नहीं सकती।
Also Read
अगर विपक्ष ने ये क़दम उठाया तो चुनावी धांदलियां रुक सकती हैं
image sources