क्या बढ़ती नफरत और सत्ताई मौन ने युवाओं को अंधेरी राहों पर धकेला है? नई दिल्ली में हाल ही में हुए धमाकों ने न केवल राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, बल्कि शुरुवाती जांच से जो नाम सामने आए हैं अगर वाक़ई पढ़े लिखे और डॉक्टर मुस्लिम इसमें मुलव्विस हैं तो जहाँ एक ओर समाज के उलेमाओं और बुद्धिजीवियों खुलकर यह कहना होगा कि “जो हिंसा करे, वह मुसलमान नहीं हो सकता।” यह ज़रूरी है कि मज़हबी नेतृत्व अपने मंचों से ऐसे तत्वों की ख़ुली निंदा करे, क्योंकि चुप रहना, अपराधियों को मौन समर्थन देना है।
वहीँ दूसरी ओर देश के बुद्धिजीवियों और सरकार को भी चाहिए कि आतंकवाद की असल जड़ तक पहुंचे क्योंकि जिन लोगों को इन धमाकों के आरोप में गिरफ्तार किया गया है, उनमें कई पढ़े-लिखे, मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले युवक शामिल हैं। सवाल उठता है—जब शिक्षा व्यक्ति को विवेक और सहिष्णुता सिखाने का माध्यम मानी जाती है, तो आखिर ये युवा हिंसा और अंधेपन की राह पर कैसे चल पड़े?
शिक्षित होकर भी कट्टरपंथ की गिरफ्त में
शिक्षा, जब समानता और न्याय की भावना से जुड़ी न हो, तब वह केवल तकनीकी दक्षता बनकर रह जाती है। आज के भारत में, खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के कई युवा अपने चारों ओर असुरक्षा, भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का माहौल महसूस करते हैं। जब रोज़मर्रा के जीवन में अपमान, डर और संदेह का अनुभव लगातार होता है—तो शिक्षा अकेले व्यक्ति को संतुलित नहीं रख पाती। ऐसे माहौल में, कुछ लोग “प्रतिरोध” या “बदला” के नाम पर भटके हुए रास्ते चुन लेते हैं।
क्या जिम्मेदारी केवल व्यक्तियों की है?
यह कहना आसान है कि “आतंक का कोई धर्म नहीं होता”, पर ज़मीन पर यह उतना सरल नहीं। जब किसी विशेष समुदाय को लगातार “दुश्मन”, “घुसपैठिया” या “जिहादी” कहकर पेश किया जाता है, जब नौकरी से लेकर मोहल्ले तक हर जगह पहचान के आधार पर शक किया जाता है, तो उस समाज का एक हिस्सा धीरे-धीरे अपने ही देश से अलग-थलग महसूस करने लगता है। यह अलगाव ही किसी भी चरमपंथ की पहली सीढ़ी होता है।
हिंदुत्व की राजनीति और सरकारी मौन
पिछले कुछ वर्षों में, देश के कई हिस्सों में “हिंदुत्व” की राजनीति ने सार्वजनिक जीवन की भाषा और नैतिकता को ही बदल डाला है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ खुलेआम नफरत फैलाने वाले बयान, आर्थिक बहिष्कार के आह्वान, भीड़ हिंसा, और सांप्रदायिक कानूनों का प्रयोग— ये सब सामान्य कर दिए गए हैं। दुर्भाग्य यह है कि सत्ता में बैठी भाजपा सरकारें इन सब पर या तो चुप रहती हैं, या ऐसे तत्वों को राजनीतिक संरक्षण देती दिखती हैं। इससे यह संदेश जाता है कि नफरत फैलाना “राष्ट्रभक्ति” है और प्रतिरोध “देशद्रोह”।
नफरत की राजनीति के परिणाम
जब समाज का एक वर्ग यह महसूस करने लगे कि न्याय उसके लिए उपलब्ध नहीं है, तब लोकतंत्र का संतुलन टूटने लगता है।अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचार और उनके खिलाफ फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का असर केवल उस समुदाय तक सीमित नहीं रहता—बल्कि पूरी समाज व्यवस्था को अस्थिर कर देता है। ऐसे में कुछ युवा, जो भावनात्मक रूप से टूट चुके होते हैं, चरमपंथी विचारों के प्रति आकर्षित हो जाते हैं। यह न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की त्रासदी है, बल्कि लोकतंत्र की भी हार है।
रास्ता क्या है?
इस समस्या का समाधान केवल सुरक्षा एजेंसियों की सख़्ती में नहीं, बल्कि समाज के भीतर न्याय, सम्मान और समानता की भावना में छिपा है। जरूरत है कि देश की राजनीति नफरत की भाषा से बाहर निकले, मीडिया भड़काऊ एजेंडा छोड़कर सच्चाई बोले, और शिक्षा ऐसी हो जो सोचने, सवाल करने और समझने की ताकत दे। आतंक किसी धर्म या विचारधारा से नहीं, बल्कि अन्याय और अपमान से जन्म लेता है। यदि हम सच में आतंकवाद को खत्म करना चाहते हैं, तो पहले हमें अपने समाज से उस अन्याय और असमानता को मिटाना होगा जो इसे जन्म देती है।
दिल्ली धमाकों के आरोपी केवल व्यक्ति नहीं हैं—वे उस बीमार सामाजिक वातावरण के लक्षण हैं जो देश में बढ़ती नफरत, असमानता और राजनीतिक मौन से उपजा है। यदि सत्ता और समाज दोनों इस सच्चाई को स्वीकार कर सकें, तो शायद भविष्य में कोई और शिक्षित युवक हिंसा की राह न चुने।