Close Menu
Elaan NewsElaan News
  • Elaan Calender App
  • एलान के बारे में
  • विदेश
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • एलान विशेष
  • लेख / विचार
Letest

विदेश में ‘एकता’ का संदेश, देश में नफ़रत की राजनीति पर खामोशी

September 5, 2026

आरएसएस पर अमेरिका में बवाल: आखिर नफ़रत और जातिवाद की राजनीति से देश कब आज़ाद होगा?

August 28, 2026

वक्फ बोर्ड में बढ़ती धांधलियां… वक्फ की असली मंशा पर निजी हित भारी

August 28, 2026
Facebook X (Twitter) Instagram
Trending
  • विदेश में ‘एकता’ का संदेश, देश में नफ़रत की राजनीति पर खामोशी
  • आरएसएस पर अमेरिका में बवाल: आखिर नफ़रत और जातिवाद की राजनीति से देश कब आज़ाद होगा?
  • वक्फ बोर्ड में बढ़ती धांधलियां… वक्फ की असली मंशा पर निजी हित भारी
  • 10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?
  • मोहन भागवत का विदेश दौरा और आरएसएस पर अंतरराष्ट्रीय सवाल
  • तीन आदिवासी बच्चियों की मौत और ‘विकास’ का दावा: जब बिस्तर तक न मिले तो कैसा विकास?
  • विदेशी चंदे के नाम पर नियंत्रण या नागरिक संस्थाओं पर नई शिकंजाकशी?
  • क्या पैगंबर मुहम्मद (स.) केवल मुसलमानों के हैं?
Facebook Instagram YouTube
Elaan NewsElaan News
Subscribe
Sunday, September 6
  • Elaan के बारे में
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • विदेश
  • Elaan विशेष
  • लेख विचार
  • ई-पेपर
  • कैलेंडर App
  • Video
  • हिन्दी
    • English
    • हिन्दी
    • اردو
Elaan NewsElaan News
Home»भारत

नॉर्वे में पीएम मोदी से पूछा गया एक सवाल ऐतिहासिक क्यों बन गया?

adminBy adminMay 22, 2026 भारत No Comments5 Mins Read
Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email WhatsApp Copy Link
Share
Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email WhatsApp

भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान कभी उसकी जीवंत और सवाल पूछने वाली प्रेस मानी जाती थी। सत्ता से असहमति, सरकार से जवाबदेही और जनता के सवालों को उठाना ही मीडिया का मूल धर्म था। लेकिन आज हालात इस मोड़ पर पहुंच चुके हैं कि जब विदेश की धरती पर कोई पत्रकार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से केवल इतना पूछ लेता है कि “आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवाल क्यों नहीं लेते?”, तो वह सवाल पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन जाता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

यह सिर्फ एक पत्रकार का सवाल नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और मीडिया की वर्तमान स्थिति पर उठता हुआ वैश्विक प्रश्न था। नॉर्वे की पत्रकार हेगे लेउंग का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि वह उस सच्चाई को सामने लाता है, जिसे भारत में धीरे-धीरे सामान्य बना दिया गया है। प्रधानमंत्री का मीडिया से दूरी बनाना। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने लगभग 14 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन इस पूरे दौर में उन्होंने भारत में एक भी खुली और स्वतंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, जहां पत्रकार बिना तय स्क्रिप्ट के सीधे सवाल पूछ सकें।

लोकतंत्र में प्रेस कॉन्फ्रेंस केवल सूचना देने का माध्यम नहीं होती, बल्कि सत्ता की जवाबदेही का सबसे अहम मंच होती है। जब कोई प्रधानमंत्री लगातार उससे बचता है, तो यह केवल व्यक्तिगत शैली नहीं रह जाती, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति पर असर डालती है। विडंबना यह है कि मोदी अपने भाषणों में भारत को “दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र” बताते हैं, लेकिन उसी लोकतंत्र का सबसे जरूरी स्तंभ-स्वतंत्र प्रेस लगातार कमजोर होता दिखाई देता है।

नॉर्वे जैसे देशों में पत्रकारों का सीधे प्रधानमंत्री से सवाल पूछना सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। वहां प्रेस सरकार की प्रशंसा करने के लिए नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगने के लिए मौजूद होती है। लेकिन भारत में आज स्थिति उलट चुकी है। यहां मुख्यधारा का बड़ा हिस्सा सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका प्रचारक बनता जा रहा है। पिछले एक दशक में भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे “गोदी मीडिया” जैसे शब्दों से पहचाना जाने लगा।

प्राइम टाइम बहसों में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्या या प्रेस स्वतंत्रता जैसे मुद्दों की जगह धार्मिक ध्रुवीकरण, मुसलमानों के खिलाफ बहस और विपक्ष को देशविरोधी साबित करने वाले नैरेटिव हावी हो गए। पत्रकारिता का केंद्र जनता से हटकर सत्ता की छवि प्रबंधन बनता चला गया। यही कारण है कि आज भारत में पत्रकारिता का महत्व और विश्वसनीयता दोनों संकट में दिखाई देते हैं।

‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का लगातार नीचे जाना केवल एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक गिरावट का संकेत है। जब नॉर्वे की पत्रकार ने यह याद दिलाया कि उनका देश प्रेस स्वतंत्रता में पहले स्थान पर है और भारत 157वें स्थान पर, तो यह तुलना केवल आंकड़ों की नहीं थी; यह दो लोकतांत्रिक संस्कृतियों के बीच का फर्क था।

एक तरफ वह व्यवस्था जहां पत्रकार सत्ता से सवाल पूछने को अपना अधिकार और जिम्मेदारी मानते हैं, और दूसरी तरफ वह माहौल जहां आलोचनात्मक सवाल पूछने वाले पत्रकारों को “राष्ट्रविरोधी”, “विदेशी एजेंट” या “षड्यंत्रकारी” कहकर ट्रोल किया जाता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पत्रकार के सवाल का जवाब देने के बजाय भारतीय प्रतिनिधियों ने विषय बदलने की कोशिश की।

मानवाधिकार, प्रेस स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर पूछे गए सवालों के जवाब में कोविड, वैक्सीन और योग की चर्चा शुरू कर दी गई। यह आज की भारतीय सत्ता शैली का परिचित तरीका बन चुका है-कठिन सवालों का सीधा जवाब देने के बजाय राष्ट्रवाद, उपलब्धियों और भावनात्मक मुद्दों की आड़ लेना। और यही वह बिंदु है जहां भारतीय मीडिया की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

यदि देश का मीडिया वास्तव में स्वतंत्र और मजबूत होता, तो किसी विदेशी पत्रकार को यह सवाल पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। भारतीय पत्रकार खुद प्रधानमंत्री से यह पूछते कि वे प्रेस कॉन्फ्रेंस से क्यों बचते हैं? क्यों कठिन सवालों के लिए मंच नहीं खोलते? क्यों इंटरव्यू केवल मित्रवत एंकरों तक सीमित रहते हैं? लेकिन आज अधिकांश बड़े मीडिया संस्थानों में सत्ता से टकराने का साहस कम होता जा रहा है। सत्ता के करीब रहने की होड़ ने पत्रकारिता के मूल चरित्र को नुकसान पहुंचाया है।

इसका सबसे खतरनाक असर जनता पर पड़ता है। जब मीडिया सवाल पूछना छोड़ देता है, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रचारतंत्र में बदलने लगता है। जनता तक अधूरी, पक्षपाती और नियंत्रित सूचनाएं पहुंचती हैं। असली मुद्दे गायब होने लगते हैं और उनकी जगह भावनात्मक ध्रुवीकरण ले लेता है। यही कारण है कि आज भारत में मीडिया का महत्व केवल तकनीकी रूप से नहीं, नैतिक रूप से भी कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। लोकतंत्र केवल चुनावों से जीवित नहीं रहता।

वह सवाल पूछने की संस्कृति से जीवित रहता है। और जब सत्ता सवालों से असहज होने लगे, पत्रकार डरने लगें और मीडिया संस्थान सरकार के आलोचक के बजाय उसके रक्षक बन जाएं, तब लोकतंत्र का ढांचा भले खड़ा दिखाई दे, उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है। नॉर्वे में पूछा गया वह एक सवाल इसलिए ऐतिहासिक बन गया, क्योंकि उसने भारत के भीतर दब चुकी उस आवाज़ को दुनिया के सामने रख दिया, क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अब सवाल पूछना भी असुविधाजनक हो चुका है?

Read Next :

न कोई गवाह, न कोई सबूत क्या तकनीकी और फॉरेंसिक जांच से तौसीफ़ रज़ा के क़ातिलों को ढूंढ पाएगी पुलिस ?

Share. Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email WhatsApp Copy Link
admin
  • Website

Keep Reading

विदेश में ‘एकता’ का संदेश, देश में नफ़रत की राजनीति पर खामोशी

10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?

मोहन भागवत का विदेश दौरा और आरएसएस पर अंतरराष्ट्रीय सवाल

विदेशी चंदे के नाम पर नियंत्रण या नागरिक संस्थाओं पर नई शिकंजाकशी?

प्रेस क्लब में ‘मोदी चालीसा’: पत्रकारिता के मंच पर व्यक्तिपूजा का सवाल

कांवड़ के नाम पर कानून का राज कमजोर क्यों पड़ रहा है?

Add A Comment
Leave A Reply Cancel Reply

Latest Post
  • विदेश में ‘एकता’ का संदेश, देश में नफ़रत की राजनीति पर खामोशी
  • आरएसएस पर अमेरिका में बवाल: आखिर नफ़रत और जातिवाद की राजनीति से देश कब आज़ाद होगा?
  • वक्फ बोर्ड में बढ़ती धांधलियां… वक्फ की असली मंशा पर निजी हित भारी
  • 10 हज़ार ‘गो मित्र’ और चुनावी राजनीति- रोजगार का मॉडल या आस्था के सहारे नई सियासत?
  • मोहन भागवत का विदेश दौरा और आरएसएस पर अंतरराष्ट्रीय सवाल
Categories
  • Uncategorized
  • एलान विशेष
  • धर्म
  • भारत
  • महाराष्ट्र
  • लातुर
  • लेख विचार
  • विदेश
  • विशेष
Instagram

elaannews

📺 | हमारी खबर आपका हौसला
⚡️
▶️ | NEWS & UPDATES
⚡️
📩 | elaannews1@gmail.com
⚡️

Full Video On Youtube And Facebook Check Out Like Full Video On Youtube And Facebook Check Out Like Comment And Share Video.#elaannews #breakingnews #Latur #laturcity #laturnews
“जेल में मुझ पर ज़हर का प्रयोग हुआ।” - संजय राऊत - “जेल में मुझ पर ज़हर का प्रयोग हुआ।” - संजय राऊत - सांसद, शिवसेना (UBT)#elaannews #breakingnews #maharashta #sanjayraut #bjp
नकली साँप दिखाते हुए गुणरत्न सदावर्ते ने मराठा आंद नकली साँप दिखाते हुए गुणरत्न सदावर्ते ने मराठा आंदोलनकारी मनोज जरांगे पर निशाना साधा। इस दौरान ‘डोला रे डोला’ कहते हुए सदावर्ते ने जरांगे को लेकर तीखी टिप्पणी की। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है।#elaannews #breakingnews #maharashta #marathaaarkshan #manojjarangepatil
संतोष पंडित जैसे बेहद क्रूर, हिंसक और नरभक्षी अंडर संतोष पंडित जैसे बेहद क्रूर, हिंसक और नरभक्षी अंडरवर्ल्ड डॉन को तत्काल गिरफ्तार करने के लिए कर्तव्यनिष्ठ गृहमंत्री फडणवीस और उनके बेहद कर्तव्यनिष्ठ व चपल पुलिस अधिकारियों का हार्दिक अभिनंदन। छोटे-मोटे ड्रग्स माफिया, बलात्कारियों और कोयता गैंग पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है..!- सुषमा अंधारे - प्रवक्ता, शिवसेना (UBT)#elaannews #breakingnews #maharashta #devendrafadanvis #santoshpandit
Follow on Instagram
Facebook X (Twitter) Pinterest Vimeo WhatsApp TikTok Instagram

News

  • महाराष्ट्र
  • भारत
  • विदेश
  • एलान विशेष
  • लेख विचार
  • धर्म

Subscribe to Updates

Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.

© 2024 Your Elaan News | Developed By Durranitech
  • Privacy Policy
  • Terms
  • Accessibility