भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान कभी उसकी जीवंत और सवाल पूछने वाली प्रेस मानी जाती थी। सत्ता से असहमति, सरकार से जवाबदेही और जनता के सवालों को उठाना ही मीडिया का मूल धर्म था। लेकिन आज हालात इस मोड़ पर पहुंच चुके हैं कि जब विदेश की धरती पर कोई पत्रकार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से केवल इतना पूछ लेता है कि “आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवाल क्यों नहीं लेते?”, तो वह सवाल पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन जाता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
यह सिर्फ एक पत्रकार का सवाल नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और मीडिया की वर्तमान स्थिति पर उठता हुआ वैश्विक प्रश्न था। नॉर्वे की पत्रकार हेगे लेउंग का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि वह उस सच्चाई को सामने लाता है, जिसे भारत में धीरे-धीरे सामान्य बना दिया गया है। प्रधानमंत्री का मीडिया से दूरी बनाना। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने लगभग 14 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन इस पूरे दौर में उन्होंने भारत में एक भी खुली और स्वतंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, जहां पत्रकार बिना तय स्क्रिप्ट के सीधे सवाल पूछ सकें।
लोकतंत्र में प्रेस कॉन्फ्रेंस केवल सूचना देने का माध्यम नहीं होती, बल्कि सत्ता की जवाबदेही का सबसे अहम मंच होती है। जब कोई प्रधानमंत्री लगातार उससे बचता है, तो यह केवल व्यक्तिगत शैली नहीं रह जाती, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति पर असर डालती है। विडंबना यह है कि मोदी अपने भाषणों में भारत को “दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र” बताते हैं, लेकिन उसी लोकतंत्र का सबसे जरूरी स्तंभ-स्वतंत्र प्रेस लगातार कमजोर होता दिखाई देता है।
नॉर्वे जैसे देशों में पत्रकारों का सीधे प्रधानमंत्री से सवाल पूछना सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। वहां प्रेस सरकार की प्रशंसा करने के लिए नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगने के लिए मौजूद होती है। लेकिन भारत में आज स्थिति उलट चुकी है। यहां मुख्यधारा का बड़ा हिस्सा सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका प्रचारक बनता जा रहा है। पिछले एक दशक में भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे “गोदी मीडिया” जैसे शब्दों से पहचाना जाने लगा।
प्राइम टाइम बहसों में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्या या प्रेस स्वतंत्रता जैसे मुद्दों की जगह धार्मिक ध्रुवीकरण, मुसलमानों के खिलाफ बहस और विपक्ष को देशविरोधी साबित करने वाले नैरेटिव हावी हो गए। पत्रकारिता का केंद्र जनता से हटकर सत्ता की छवि प्रबंधन बनता चला गया। यही कारण है कि आज भारत में पत्रकारिता का महत्व और विश्वसनीयता दोनों संकट में दिखाई देते हैं।
‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का लगातार नीचे जाना केवल एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक गिरावट का संकेत है। जब नॉर्वे की पत्रकार ने यह याद दिलाया कि उनका देश प्रेस स्वतंत्रता में पहले स्थान पर है और भारत 157वें स्थान पर, तो यह तुलना केवल आंकड़ों की नहीं थी; यह दो लोकतांत्रिक संस्कृतियों के बीच का फर्क था।
एक तरफ वह व्यवस्था जहां पत्रकार सत्ता से सवाल पूछने को अपना अधिकार और जिम्मेदारी मानते हैं, और दूसरी तरफ वह माहौल जहां आलोचनात्मक सवाल पूछने वाले पत्रकारों को “राष्ट्रविरोधी”, “विदेशी एजेंट” या “षड्यंत्रकारी” कहकर ट्रोल किया जाता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पत्रकार के सवाल का जवाब देने के बजाय भारतीय प्रतिनिधियों ने विषय बदलने की कोशिश की।
मानवाधिकार, प्रेस स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर पूछे गए सवालों के जवाब में कोविड, वैक्सीन और योग की चर्चा शुरू कर दी गई। यह आज की भारतीय सत्ता शैली का परिचित तरीका बन चुका है-कठिन सवालों का सीधा जवाब देने के बजाय राष्ट्रवाद, उपलब्धियों और भावनात्मक मुद्दों की आड़ लेना। और यही वह बिंदु है जहां भारतीय मीडिया की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
यदि देश का मीडिया वास्तव में स्वतंत्र और मजबूत होता, तो किसी विदेशी पत्रकार को यह सवाल पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। भारतीय पत्रकार खुद प्रधानमंत्री से यह पूछते कि वे प्रेस कॉन्फ्रेंस से क्यों बचते हैं? क्यों कठिन सवालों के लिए मंच नहीं खोलते? क्यों इंटरव्यू केवल मित्रवत एंकरों तक सीमित रहते हैं? लेकिन आज अधिकांश बड़े मीडिया संस्थानों में सत्ता से टकराने का साहस कम होता जा रहा है। सत्ता के करीब रहने की होड़ ने पत्रकारिता के मूल चरित्र को नुकसान पहुंचाया है।
इसका सबसे खतरनाक असर जनता पर पड़ता है। जब मीडिया सवाल पूछना छोड़ देता है, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रचारतंत्र में बदलने लगता है। जनता तक अधूरी, पक्षपाती और नियंत्रित सूचनाएं पहुंचती हैं। असली मुद्दे गायब होने लगते हैं और उनकी जगह भावनात्मक ध्रुवीकरण ले लेता है। यही कारण है कि आज भारत में मीडिया का महत्व केवल तकनीकी रूप से नहीं, नैतिक रूप से भी कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। लोकतंत्र केवल चुनावों से जीवित नहीं रहता।
वह सवाल पूछने की संस्कृति से जीवित रहता है। और जब सत्ता सवालों से असहज होने लगे, पत्रकार डरने लगें और मीडिया संस्थान सरकार के आलोचक के बजाय उसके रक्षक बन जाएं, तब लोकतंत्र का ढांचा भले खड़ा दिखाई दे, उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है। नॉर्वे में पूछा गया वह एक सवाल इसलिए ऐतिहासिक बन गया, क्योंकि उसने भारत के भीतर दब चुकी उस आवाज़ को दुनिया के सामने रख दिया, क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अब सवाल पूछना भी असुविधाजनक हो चुका है?
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