हर साल सावन आता है, कांवड़ यात्रा शुरू होती है और उसके साथ ही एक बार फिर वही सवाल सामने खड़ा हो जाता है कि क्या धार्मिक आस्था के नाम पर सड़क पर किसी को भी डराने, धमकाने, तोड़फोड़ करने या आम नागरिकों की जिंदगी मुश्किल बनाने का अधिकार मिल जाता है? उत्तर प्रदेश के लखनऊ की हालिया घटना ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। पुलिस के मुताबिक एक स्कूल वैन ने अचानक ब्रेक लगाया और पीछे चल रही मोटरसाइकिल कांवड़ियों से टकरा गई। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
इसके बाद कुछ युवकों ने कथित तौर पर स्कूल वैन के शीशे और साइड मिरर तोड़ दिए। पुलिस का कहना है कि वैन में कई नाबालिग बच्चे मौजूद थे और सौभाग्य से किसी बच्चे को चोट नहीं आई। पुलिस ने पथराव की खबरों से इनकार किया है। इसलिए घटना के इस हिस्से को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के बजाय पुलिस की जांच और सीसीटीवी के आधार पर अंतिम तथ्य सामने आने का इंतजार किया जाना चाहिए। लेकिन एक बात पर सवाल उठना जरूरी है कि अगर वैन में बच्चे थे और मामूली सड़क दुर्घटना के बाद उस पर हमला हुआ, तो आखिर सड़क पर धर्म के नाम पर इतना गुस्सा क्यों?
आस्था अपनी जगह, कानून अपनी जगह
कांवड़ यात्रा धार्मिक आस्था का विषय है। लाखों लोग श्रद्धा से यात्रा करते हैं, कठिन रास्ते तय करते हैं और भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। इस आस्था का सम्मान होना चाहिए। लेकिन आस्था का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि कानून को किनारे कर दिया जाए। अगर किसी वाहन से दुर्घटना हो जाए तो कानून मौजूद है। अगर चालक की गलती हो तो पुलिस है। अगर किसी को नुकसान हुआ है तो शिकायत और मुकदमे का रास्ता है। लेकिन सड़क पर उतरकर वाहन के शीशे तोड़ना, चालक को धमकाना या किसी व्यक्ति को घेरना-क्या इसे धार्मिक आस्था का हिस्सा कहा जा सकता है?
हर साल कांवड़ यात्रा के साथ विवाद क्यों जुड़ जाते हैं?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले वर्षों में भी कांवड़ यात्रा के दौरान सड़क पर हंगामा, तोड़फोड़, मारपीट और वाहनों को नुकसान पहुंचाने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। हर वायरल वीडियो को सच मान लेना भी उचित नहीं है। वीडियो की सत्यता और संदर्भ की जांच जरूरी है। लेकिन जब बार-बार ऐसी तस्वीरें और शिकायतें सामने आती हैं, तो प्रशासन से यह पूछना भी जरूरी हो जाता है कि क्या सरकार ने कभी गंभीरता से अध्ययन किया कि हर साल ऐसी घटनाओं की नौबत क्यों आती है?
क्या यात्रा के दौरान कानून-व्यवस्था के लिए अलग से स्पष्ट नियम हैं?
क्या नियम तोड़ने वालों पर उसी तेजी से कार्रवाई होती है जिस तेजी से आम नागरिक पर कार्रवाई होती है? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या धार्मिक जुलूस के नाम पर भीड़ को कानून से ऊपर समझे जाने की कोई छूट है?
पिछले साल होटल और ढाबों की पहचान पर भी विवाद खड़ा हुआ था
कांवड़ यात्रा के दौरान पिछले साल उत्तर प्रदेश में सड़क किनारे होटल, ढाबों और दुकानों पर मालिकों तथा कर्मचारियों की पहचान सार्वजनिक करने और उनसे जुड़े निर्देशों को लेकर भी बड़ा विवाद हुआ था। उस दौरान कुछ जगहों से मुस्लिम कर्मचारियों और दुकानदारों के साथ कथित मारपीट और दुर्व्यवहार के वीडियो तथा शिकायतें भी सामने आई थीं। इनमें से हर मामले की स्वतंत्र जांच जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि किसी होटल या ढाबे के मालिक का धर्म किसी ग्राहक की सुरक्षा, खाने की गुणवत्ता या कानून-व्यवस्था से कैसे जुड़ गया?
अगर किसी होटल में मिलावट हो रही है तो कार्रवाई कीजिए। अगर कोई खाद्य नियम तोड़ रहा है तो लाइसेंस रद्द कीजिए। अगर कोई अपराध कर रहा है तो मुकदमा चलाइए। लेकिन किसी नागरिक की धार्मिक पहचान को उसकी दुकान या रोजगार के साथ जोड़कर संदेह पैदा करना क्या उचित है? क्या सड़क पर उतरते ही कानून बदल जाता है? यहां एक बहुत बुनियादी सवाल है। भारत में सड़क किसकी है? सिर्फ कांवड़ियों की? या हर नागरिक की? उसी सड़क पर स्कूल की वैन भी चलेगी। एम्बुलेंस भी चलेगी।
मजदूर भी जाएगा। दुकानदार भी जाएगा। मरीज भी जाएगा। बच्चे भी जाएंगे। दफ्तर जाने वाला कर्मचारी भी जाएगा। तो फिर किसी धार्मिक यात्रा के कारण बाकी नागरिकों के अधिकार कितनी दूर तक सीमित किए जा सकते हैं? अगर प्रशासन कहता है कि भारी भीड़ के कारण रास्ते बंद करने पड़ेंगे, तो यह यातायात प्रबंधन हो सकता है। लेकिन अगर रास्ते इस तरह बंद हों कि आम जनता का जीवन ठप हो जाए और फिर हिंसा या तोड़फोड़ की शिकायतों पर भीड़ के सामने प्रशासन कमजोर दिखाई दे, तो यह कानून-व्यवस्था का गंभीर सवाल बन जाता है।
अब तो स्कूल के बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं
सबसे गंभीर बात यह है कि कांवड़ यात्रा के कारण उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कई इलाकों में स्कूल-कॉलेजों को कई दिनों तक बंद रखने के आदेश दिए जा रहे हैं। प्रशासन के पास इसके लिए सुरक्षा और यातायात संबंधी कारण हो सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या समाधान यही है कि बच्चों को स्कूल से घर बैठा दिया जाए?
अगर हर साल प्रशासन को पहले से पता है कि कांवड़ यात्रा के दौरान इतने बड़े पैमाने पर यातायात और भीड़ होगी, तो क्या बेहतर ट्रैफिक प्लान, वैकल्पिक मार्ग, अलग कॉरिडोर और पर्याप्त पुलिस व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती? बच्चे स्कूल क्यों न जाएं? उनकी पढ़ाई क्यों प्रभावित हो? किसी धार्मिक आयोजन की व्यवस्था का बोझ आखिर शिक्षा हासिल करने वाले बच्चों पर क्यों पड़े?
योगी सरकार से सबसे बड़ा सवाल
उत्तर प्रदेश की सरकार को धार्मिक आस्था का सम्मान करना चाहिए, लेकिन कानून की सर्वोच्चता उससे भी ऊपर होनी चाहिए। अगर कुछ लोग यात्रा के दौरान नियम तोड़ते हैं तो सरकार को यह संदेश देना चाहिए कि कांवड़ लेकर चलना आपका अधिकार है, लेकिन किसी दूसरे नागरिक को डराना आपका अधिकार नहीं। धार्मिक नारा लगाना आपका अधिकार है, लेकिन किसी वाहन को तोड़ना अधिकार नहीं। यात्रा करना आपका अधिकार है, लेकिन किसी बच्चे, मरीज, दुकानदार या राहगीर को परेशान करना अधिकार नहीं। और अगर कोई अपराध करता है तो उसकी पहचान कांवड़िया होने से नहीं, अपराधी होने से होगी। यही कानून का राज है।
क्या सरकार भीड़ से डरती है?
सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि जब प्रशासन को पहले से मालूम है कि कांवड़ यात्रा के दौरान किन इलाकों में लाखों लोगों की आवाजाही होगी, तब व्यवस्था ऐसी क्यों नहीं बनाई जाती कि धार्मिक यात्रा भी शांतिपूर्वक चले और आम नागरिकों का जीवन भी बाधित न हो? अगर रास्ते बंद करने पड़ते हैं, स्कूल बंद करने पड़ते हैं, ट्रेन स्टेशनों के गेट बंद करने पड़ते हैं और आम जनता को कई दिनों तक असुविधा झेलनी पड़ती है, तो सरकार को यह भी बताना चाहिए कि क्या यह व्यवस्था की मजबूरी है या व्यवस्था की विफलता? क्यों हर साल वही समस्या दोहराई जाती है?
क्यों पहले से स्थायी समाधान नहीं निकाला जाता? क्यों धार्मिक यात्रा के नाम पर प्रशासन का पूरा तंत्र आम जनता को समायोजित करने के बजाय आम जनता की जिंदगी को यात्रा के हिसाब से बदल देता है? एक और खतरनाक सवाल कि क्या धर्म के नाम पर भीड़ को छूट मिल सकती है? यह सवाल किसी एक धर्म के खिलाफ नहीं है। यह सिद्धांत हर धर्म पर समान रूप से लागू होना चाहिए। अगर कोई मुस्लिम हो या हिंदू या फिर सिख, ईसाई या किसी भी दूसरे समुदाय का जुलूस कानून तोड़ता है तो कार्रवाई होनी चाहिए। कानून को धर्म देखकर अपना चेहरा नहीं बदलना चाहिए। यही धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।
क्या कोई धर्म दूसरों को तकलीफ देने की इजाजत देता है?
यह सवाल धार्मिक नेताओं से भी पूछा जाना चाहिए। क्या किसी धर्म की आस्था सड़क पर दूसरे इंसान को डराने की इजाजत देती है? क्या भगवान की भक्ति किसी वाहन का शीशा तोड़ने की अनुमति देती है? क्या धार्मिक यात्रा किसी स्कूल वैन में बैठे मासूम बच्चों को भयभीत करने की अनुमति देती है? क्या भगवान का नाम लेने से किसी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार मिल जाता है? नहीं।
किसी भी धर्म की वास्तविक शिक्षा इंसानियत, संयम और दूसरे इंसान के अधिकारों का सम्मान करने से अलग नहीं हो सकती। अगर आपकी पूजा से किसी दूसरे इंसान का जीवन खतरे में पड़ रहा है, अगर आपकी धार्मिक यात्रा से किसी बच्चे को डर लग रहा है, अगर आपकी भीड़ किसी गरीब दुकानदार को पीट रही है, तो सवाल उस व्यक्ति की आस्था पर नहीं बल्कि उस आस्था के नाम पर किए जा रहे व्यवहार पर उठेगा।
धर्म का सम्मान भी हो और नागरिक का अधिकार भी
समाधान कांवड़ यात्रा रोकना नहीं है। समाधान धार्मिक आस्था का अपमान करना भी नहीं है। समाधान है-सख्त लेकिन निष्पक्ष कानून-व्यवस्था। कांवड़ यात्रा हो, गणेश विसर्जन हो, मोहर्रम का जुलूस हो, गुरुपर्व हो या कोई अन्य धार्मिक आयोजन सबके लिए नियम एक होने चाहिए। नमाज़ के लिए नियम अलग और कांवड़ियों के अलग नहीं। मार्ग पहले से तय हों। यातायात की वैकल्पिक व्यवस्था हो। एम्बुलेंस और स्कूल वाहनों के लिए रास्ते सुनिश्चित हों। हिंसा, तोड़फोड़ और धमकी देने वालों पर तत्काल कार्रवाई हो। और सबसे महत्वपूर्ण-पुलिस यह संदेश दे कि धार्मिक पहचान किसी अपराध के लिए सुरक्षा कवच नहीं है।
अब योगी सरकार से ये सवाल जरूरी हैं
क्या सरकार बताएगी कि कांवड़ यात्रा के दौरान कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कितनी कार्रवाई हुई? क्या किसी कांवड़िए के खिलाफ वाहन तोड़ने, मारपीट या धमकी देने के मामलों में उसी तेजी से कार्रवाई होती है जिस तेजी से आम नागरिक के खिलाफ या रोड पे नमाज़ पढ़ने वालों के खिलाफ होती है? क्या स्कूलों को बंद करना स्थायी समाधान है या प्रशासनिक मजबूरी? बच्चों की शिक्षा का नुकसान कौन पूरा करेगा? क्या हर साल करोड़ों लोगों की धार्मिक यात्रा के लिए स्थायी ट्रैफिक कॉरिडोर और वैकल्पिक मार्ग क्यों नहीं बनाए जाते?
अगर सरकार इतनी बड़ी यात्रा की व्यवस्था नहीं कर सकती तो क्या उसका पूरा बोझ आम नागरिकों पर डालना न्यायसंगत है? और सबसे बड़ा सवाल कि अगर कांवड़ यात्रा आस्था का पर्व है, तो उसे देखकर आम नागरिक के मन में श्रद्धा पैदा होनी चाहिए या डर? कांवड़ उठाने वाले हर श्रद्धालु को बदनाम करना गलत होगा। लाखों लोग शांतिपूर्वक यात्रा करते हैं और नियमों का पालन भी करते हैं। लेकिन जो भी व्यक्ति धर्म के नाम पर हिंसा, धमकी या तोड़फोड़ करता है, उसके लिए एक ही पहचान होनी चाहिए—वह अपराधी है।
और सरकार की जिम्मेदारी है कि वह यह फर्क साफ-साफ कायम रखे। आस्था का रास्ता किसी दूसरे के अधिकारों पर नहीं चल सकता। धर्म इंसान को ऊंचा उठाने के लिए है, दूसरे इंसान को कुचलने के लिए नहीं। भक्ति इंसान में संयम पैदा करे, उन्माद नहीं। यात्रा श्रद्धा का प्रतीक बने, दहशत का नहीं। और सरकार का काम किसी धार्मिक भीड़ के सामने झुकना नहीं, बल्कि हर नागरिक के अधिकारों की बराबर रक्षा करना है।
अगर एक स्कूल वैन में बैठे बच्चों को देखकर भी भीड़ का गुस्सा नहीं रुकता, अगर दुकानदार अपनी पहचान को लेकर डरने लगे, अगर सड़क पर निकलने से आम आदमी घबराने लगे और अंततः प्रशासन स्कूल बंद करके समस्या का समाधान खोजे-तो फिर सवाल सिर्फ कांवड़ यात्रा का नहीं है। सवाल यह है कि क्या कानून का राज भीड़ के आगे कमजोर पड़ रहा है? और अगर ऐसा है, तो योगी सरकार को जवाब देना होगा।
सरकार सड़क पर आस्था की रक्षा कर रही है या कानून की? क्योंकि लोकतंत्र में सड़क किसी धर्म की नहीं होती। सड़क जनता की होती है। और उस सड़क पर चलने वाले हर बच्चे, हर महिला, हर बुजुर्ग, हर दुकानदार और हर नागरिक की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है।
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