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जंतर-मंतर के आंदोलन से डर गई सत्ता? अब प्रदर्शनकारियों को खाना देने वालों पर भी पुलिस का दबाव?

adminBy adminAugust 8, 2026 एलान विशेष No Comments9 Mins Read
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सवाल सिर्फ जंतर-मंतर पर बैठे युवाओं का नहीं है। सवाल उस लोकतंत्र का है, जिसमें किसी आंदोलन का समर्थन करना भी अपराध जैसा बना दिया जाए तो फिर संविधान में मिले नागरिक अधिकारों का मतलब क्या रह जाता है? दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवा प्रदर्शनकारियों का आंदोलन खत्म हुआ, लेकिन उससे जुड़े विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहे।   एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

अब आरोप यह है कि आंदोलनकारियों को खाना, पानी और दूसरी मदद पहुंचाने वाले रेस्तरां और कैफे संचालकों से पुलिस पूछताछ कर रही है और उन पर प्रदर्शन स्थल पर खाना पहुंचाना बंद करने का दबाव बनाया जा रहा है। अगर ये आरोप सही हैं तो यह केवल पुलिस की एक कार्रवाई का मामला नहीं है। यह सीधे-सीधे उस सवाल से जुड़ता है कि क्या भारत में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का समर्थन करना भी अब पुलिस की नजर में संदिग्ध गतिविधि बन गया है?

खाना पहुंचाना कब से अपराध हो गया?

किसी प्रदर्शनकारी को भोजन देना, पानी पिलाना या जरूरत पड़ने पर आश्रय देना आखिर किस कानून के तहत अपराध है? मान लीजिए कोई व्यक्ति किसी आंदोलन के विचारों से सहमत है। वह अपनी जेब से पैसे खर्च करके प्रदर्शनकारियों के लिए खाना भेजता है। उसने किसी पर हमला नहीं किया, सार्वजनिक संपत्ति नहीं तोड़ी, हिंसा नहीं की और न ही कोई अपराध किया।

तो फिर पुलिस उससे यह क्यों पूछे कि तुम किस एनजीओ के लिए काम कर रहे हो? तुम्हें किसने खाना भेजने को कहा? क्या लोकतंत्र में किसी नागरिक को अपने विवेक के अनुसार किसी शांतिपूर्ण आंदोलन का समर्थन करने के लिए किसी राजनीतिक दल, एनजीओ या किसी दूसरे व्यक्ति से अनुमति लेनी होगी? अगर इसका जवाब ‘नहीं’ है, तो फिर सवाल यह है कि इन रेस्तरां संचालकों को पुलिस स्टेशन क्यों बुलाया गया? क्या सरकार आंदोलन खत्म होने के बाद भी आंदोलनकारियों का पीछा कर रही है? सबसे गंभीर सवाल यहां से पैदा होता है।

अगर सरकार या पुलिस ने आंदोलन के दौरान कोई कानून तोड़ा जाना पाया था तो कानून के मुताबिक कार्रवाई की जा सकती थी। लेकिन अगर आंदोलन शांतिपूर्ण था और सरकार की ओर से यह भरोसा दिया गया था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ नई कार्रवाई या नए मुकदमे नहीं किए जाएंगे, तो आंदोलन समाप्त होने के बाद उसके समर्थकों और मददगारों की पहचान करके उन्हें दबाव में लेने का आरोप बेहद गंभीर है।

क्या सरकार आंदोलन को खत्म करना चाहती थी या उसकी याद और उसके समर्थन को भी मिटाना चाहती है? क्योंकि आंदोलनकारी सड़क से चले गए, लेकिन अगर उन्हें खाना देने वाले दुकानदारों तक पुलिस पहुंच रही है, सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का दबाव बन रहा है और डिलीवरी कर्मचारियों को रोके जाने तथा खाना जब्त किए जाने के आरोप सामने आ रहे हैं, तो मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता। यह असहमति को दबाने की संस्कृति का सवाल बन जाता है।

पुलिस जनता की सुरक्षा के लिए है या डर पैदा करने के लिए?

पुलिस का काम अपराध रोकना है, अपराध की जांच करना है और नागरिकों की सुरक्षा करना है। लेकिन अगर किसी रेस्तरां मालिक का आरोप है कि पुलिस ने उसे थाने बुलाकर आंदोलन को खाना देने के बारे में पूछताछ की, तो पुलिस को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि: कौन सा कानून उन्हें ऐसा करने का अधिकार देता है? अगर किसी रेस्तरां ने कोई कानून नहीं तोड़ा, तो उसे किस आधार पर चेतावनी दी गई?

अगर खाना पहुंचाना गैरकानूनी था, तो पुलिस उस कानून की जानकारी जनता के सामने क्यों नहीं रखती? और अगर खाना पहुंचाना गैरकानूनी नहीं था, तो फिर पुलिस का दबाव किस उद्देश्य से था? लोकतंत्र में ‘समर्थन’ भी अपराध बन गया तो कल किसकी बारी होगी? आज मामला आंदोलनकारियों को खाना देने वाले रेस्तरां का है।

कल किसी छात्र संगठन को चंदा देने वाला व्यक्ति निशाने पर हो सकता है। परसों किसी आंदोलन के पक्ष में सोशल मीडिया पोस्ट लिखने वाला नागरिक। और फिर शायद किसी विरोध प्रदर्शन में पानी की बोतल बांटने वाला भी। इसलिए यह सवाल केवल सीजेपी या जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों का नहीं है। यह सवाल हर उस भारतीय का है जो संविधान में शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की आजादी को लोकतंत्र की बुनियादी शर्त मानता है।विरोध करने का अधिकार तभी सार्थक है जब नागरिकों को उस विरोध के साथ खड़े होने की भी आजादी हो।

अगर आंदोलन गलत था तो जवाब विचारों से दीजिए, पुलिस से नहीं

सरकार किसी आंदोलन से सहमत नहीं है तो उसके पास जवाब देने के कई लोकतांत्रिक रास्ते हैं। सरकार प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर सकती है। उनके आरोपों का जवाब दे सकती है। उनके सवालों के तथ्य सामने रख सकती है। उनकी मांगों को खारिज करने के कारण बता सकती है। लेकिन अगर जवाब के बजाय पुलिस का दबाव इस्तेमाल किया जाएगा, तो इससे सवाल खत्म नहीं होंगे बल्कि सवाल और ज्यादा मजबूत होंगे। किसी आंदोलन की विचारधारा से असहमति रखना सरकार का अधिकार है। लेकिन नागरिकों को शांतिपूर्ण आंदोलन के समर्थन से रोकना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत हो सकता है।

महिलाओं को धमकियां और डॉक्सिंग-सरकार की जिम्मेदारी कहां है?

इस पूरे मामले का एक और बेहद गंभीर पहलू है। प्रदर्शन में शामिल महिलाओं को कथित तौर पर ऑनलाइन बलात्कार और हत्या की धमकियां दी जा रही हैं। उनकी निजी जानकारियां सार्वजनिक किए जाने और उनके वीडियो-तस्वीरों के जरिए उन्हें निशाना बनाने के आरोप हैं। अगर किसी महिला को सिर्फ इसलिए बलात्कार की धमकी दी जा रही है क्योंकि उसने किसी आंदोलन में हिस्सा लिया, तो यह केवल सोशल मीडिया की गाली नहीं है। यह एक गंभीर आपराधिक धमकी है।

सवाल है-इन धमकियों पर कितनी एफआईआर हुईं? कितने आरोपियों की पहचान हुई? कितनों को गिरफ्तार किया गया? जिन लोगों ने महिलाओं की निजी जानकारी सार्वजनिक की, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? और सबसे बड़ा सवाल-क्या पुलिस की पूरी ताकत उन लोगों को खोजने में लग रही है जो धमकी दे रहे हैं या उन लोगों की पहचान करने में जो आंदोलनकारियों को खाना खिला रहे हैं? अगर एक शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को खाना देने वाला व्यक्ति पुलिस की नजर में आ जाता है, लेकिन उसे बलात्कार और हत्या की धमकी देने वाला व्यक्ति खुलेआम घूमता रहता है, तो यह कानून के शासन पर बेहद गंभीर सवाल खड़ा करता है।

डिलीवरी कर्मचारियों को रोकना और खाना जब्त करना-किसके आदेश पर?

रेस्तरां संचालकों के आरोपों में अगर यह बात सही है कि डिलीवरी पार्टनरों को रोका गया और खाना जब्त किया गया, तो मामला और गंभीर हो जाता है। क्योंकि यहां केवल रेस्तरां मालिक की बात नहीं है। एक डिलीवरी कर्मचारी अपना काम कर रहा है। उसने खाना तैयार नहीं किया। उसने आंदोलन आयोजित नहीं किया। वह केवल ऑर्डर लेकर ग्राहक तक पहुंचाने जा रहा है। तो फिर-उसे क्यों रोका गया? खाना किस कानून के तहत जब्त किया गया? किस अधिकारी के आदेश पर किया गया? क्या इसकी कोई लिखित कार्रवाई हुई?

क्या जब्त किए गए सामान की सूची बनाई गई? इन सवालों का जवाब दिल्ली पुलिस को देना चाहिए। सरकार को डर किस बात का है? यह सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। अगर सरकार को लगता है कि आंदोलन के पीछे गलत तथ्य हैं, तो वह तथ्यों के साथ जनता के सामने आए। अगर आंदोलनकारियों की मांगें गलत हैं, तो उनका खंडन करे। अगर उनके आरोप झूठे हैं, तो दस्तावेज और आंकड़े जारी करे।

लेकिन अगर सरकार को अपने जवाब पर भरोसा है, तो उसे खाना पहुंचाने वाले रेस्तरां से डरने की जरूरत क्यों पड़ रही है? एक रेस्तरां में बनने वाला खाना किसी सरकार को नहीं गिरा सकता। एक पानी की बोतल सत्ता को नहीं हिला सकती। एक कैफे की सोशल मीडिया पोस्ट किसी सरकार के लिए खतरा नहीं होनी चाहिए। खतरा तब पैदा होता है जब सत्ता को लगता है कि जनता की आवाज उसके खिलाफ माहौल बना रही है। और यहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा होती है।

क्या सत्ता आलोचना सहने की क्षमता खो रही है?

लोकतंत्र की खूबसूरती यह नहीं है कि सभी लोग सरकार की तारीफ करें। लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि सरकार के खिलाफ बोलने वाले भी सुरक्षित रहें। सरकार के समर्थकों को जितना अधिकार है, सरकार के आलोचकों को भी उतना ही अधिकार होना चाहिए। अगर पुलिस किसी आंदोलनकारी को खाना देने वाले व्यापारी को डराती है, तो कल कोई दूसरा व्यापारी किसी दूसरे आंदोलन की मदद करने से पहले दस बार सोचेगा। और यही लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है। जब कानून नागरिक को अपराध करने से नहीं, बल्कि अपनी आवाज उठाने से डराने लगे।

अब दिल्ली पुलिस और सरकार को जवाब देना चाहिए

इस पूरे मामले में भावनाओं से ज्यादा जरूरी हैं ठोस जवाब। दिल्ली पुलिस को बताना चाहिए:

1. क्या रेस्तरां और कैफे मालिकों को पुलिस ने थाने बुलाया?

2. अगर बुलाया तो किस कानूनी प्रावधान के तहत?

3. क्या उनसे प्रदर्शनकारियों को खाना देने के बारे में पूछताछ की गई?

4. क्या किसी रेस्तरां को खाना पहुंचाना बंद करने के लिए कहा गया?

5. क्या किसी डिलीवरी कर्मचारी को रोका गया?

6. क्या किसी खाद्य सामग्री को जब्त किया गया?

7. अगर हां, तो किस कानून के तहत?

8. क्या आंदोलन के समर्थन में सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का दबाव डाला गया?

9. प्रदर्शनकारी महिलाओं को मिल रही बलात्कार और हत्या की धमकियों पर कितनी कार्रवाई हुई?

10. अगर सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर नई कार्रवाई न करने का आश्वासन दिया था, तो उसके बाद समर्थकों पर कार्रवाई क्यों हो रही है?

आखिर में सबसे बड़ा सवाल:- सरकारें आती-जाती रहती हैं। मंत्री बदलते हैं। पुलिस अधिकारी बदलते हैं। लेकिन संविधान और लोकतंत्र किसी एक सरकार की संपत्ति नहीं हैं।

आज अगर किसी आंदोलनकारी को खाना देने वाले व्यापारी को डराया जाता है, तो यह केवल उस व्यापारी की आजादी का सवाल नहीं है। यह सवाल है कि क्या हम ऐसा भारत बनाना चाहते हैं जहां नागरिक सरकार के खिलाफ बोलने से पहले यह सोचें कि कहीं पुलिस उनके दरवाजे तक न पहुंच जाए? अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक अधिकार है, तो उस प्रदर्शनकारी को पानी देना, खाना देना या उसके साथ खड़ा होना भी नागरिक स्वतंत्रता के दायरे में होना चाहिए-जब तक कोई कानून नहीं टूटता।

सरकार को आलोचना से लड़ना है तो तर्क से लड़े। आरोपों का जवाब देना है तो तथ्यों से दे। आंदोलन को रोकना है तो संवाद से रोके। लेकिन अगर पुलिस के जरिए डर पैदा किया जाएगा, समर्थकों को निशाना बनाया जाएगा और असहमति की आवाज के आसपास खड़े लोगों को भी दबाने की कोशिश होगी, तो सवाल उठेंगे। क्या सत्ता जनता से डरने लगी है? और अगर एक लोकतांत्रिक सरकार अपने नागरिकों की आवाज से डरने लगे, तो फिर असली संकट आंदोलनकारियों का नहीं-लोकतंत्र का होता है।

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