उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी पर प्रस्तावित बुलडोज़र कार्रवाई को मुरादाबाद मंडलायुक्त की अदालत ने फिलहाल रोक लगा दी है। इससे हजारों छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को अस्थायी राहत मिली है। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब सिर्फ अदालत नहीं, बल्कि पूरा देश चाहता है। क्या किसी शिक्षण संस्थान में अगर निर्माण संबंधी अनियमितता पाई जाती है, तो उसका पहला इलाज बुलडोज़र होना चाहिए? या कानून के दायरे में रहकर ऐसा रास्ता निकाला जाना चाहिए जिससे शिक्षा भी बची रहे और कानून का सम्मान भी बना रहे?
यह सिर्फ आज़म ख़ान का मामला नहीं
इस विवाद को कई लोग सिर्फ समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान से जोड़कर देख रहे हैं। लेकिन क्या सचमुच यह मामला सिर्फ किसी एक व्यक्ति का है? आज इस विश्वविद्यालय में लगभग तीन हज़ार छात्र पढ़ रहे हैं। सैकड़ों शिक्षक और कर्मचारी यहाँ काम करते हैं। यहाँ पैरामेडिकल, फार्मेसी, नर्सिंग और कानून जैसे पेशेवर पाठ्यक्रम चल रहे हैं। अगर किसी इमारत पर बुलडोज़र चलता है, तो सिर्फ़ दीवारें नहीं गिरतीं। उसके साथ छात्रों के सपने, कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी और शिक्षा का पूरा ढांचा भी प्रभावित होता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
देश की संपत्ति को बचाना भी सरकार की जिम्मेदारी है
एक बात पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। यह विश्वविद्यालय किसी एक व्यक्ति के घर की निजी इमारत नहीं है, जहाँ सिर्फ उसका परिवार रहता हो। यह एक शिक्षण संस्थान है, जहाँ देश के नागरिक पढ़ते हैं। अगर इसे बनाने में करोड़ों रुपये खर्च हुए हैं, तो वह पैसा, श्रम, संसाधन और समय अब देश की संपत्ति का हिस्सा बन चुके हैं। आज वहाँ जो प्रयोगशालाएँ हैं, पुस्तकालय हैं, कक्षाएँ हैं और शैक्षणिक ढाँचा है, उसका लाभ छात्रों को मिल रहा है। अगर पूरा ढांचा तोड़ दिया जाता है, तो नुकसान केवल संस्थान का नहीं होगा बल्कि नुकसान देश का होगा।
अगर नियम टूटे हैं तो कानून लागू हो, लेकिन शिक्षा क्यों टूटे?
अगर प्रशासन का कहना है कि निर्माण स्वीकृत नक्शे के बिना हुआ, तो इस दावे की कानूनी जांच होनी चाहिए।अगर वास्तव में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। जुर्माना लगाया जा सकता है। नियमितीकरण की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। जहाँ संभव हो, तकनीकी सुधार कराए जा सकते हैं। लेकिन हर मामले का पहला समाधान बुलडोज़र ही क्यों दिखाई देता है? कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं होता, बल्कि सार्वजनिक हित की रक्षा करना भी होता है।
अगर बनाने वालों से विवाद है, तो संस्थान क्यों भुगते?
मान लीजिए कि सरकार या प्रशासन को इस विश्वविद्यालय के संस्थापकों या प्रबंधन के खिलाफ गंभीर आपत्तियाँ हैं। तो क्या उसका समाधान यह है कि पूरा शैक्षणिक ढांचा ही खत्म कर दिया जाए? अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी है, तो कानून उसके खिलाफ कार्रवाई करे। लेकिन जो संस्थान हजारों छात्रों की पढ़ाई का केंद्र बन चुका है, उसके भविष्य का फैसला भी छात्रों और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
अगर सरकार को लगता है कि वर्तमान प्रबंधन उपयुक्त नहीं है, तो कानून के अनुसार दूसरे प्रशासनिक विकल्प भी मौजूद हैं। जहाँ कानून अनुमति देता हो, वहाँ सरकार निगरानी बढ़ा सकती है, नया प्रशासक नियुक्त कर सकती है या अन्य वैधानिक व्यवस्था अपना सकती है। मगर सबसे पहले यह सोचना होगा कि शिक्षा बचे कैसे।
बुलडोज़र से ज्यादा ताकतवर है कानून
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत अदालतें और कानून हैं। इसीलिए यह महत्वपूर्ण है कि मंडलायुक्त की अदालत ने अंतिम निर्णय तक कार्रवाई पर रोक लगाई है। साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका उचित अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा दायर होनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और अंतिम निर्णय बाकी है। ऐसे में सभी पक्षों को कानून के रास्ते पर चलना चाहिए।
छात्रों को सज़ा क्यों मिले?
सबसे बड़ा प्रश्न उन छात्रों का है जिन्होंने किसी राजनीतिक विवाद के लिए विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं लिया। उन्होंने यहाँ पढ़ने के लिए प्रवेश लिया। अगर इमारतें गिरती हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं का होगा। उनकी पढ़ाई प्रभावित होगी। उनकी डिग्री, उनका भविष्य और उनका करियर प्रभावित होगा। क्या किसी प्रशासनिक विवाद की कीमत छात्रों को चुकानी चाहिए?
देश को क्या संदेश जाएगा?
भारत दुनिया को यह बताना चाहता है कि वह शिक्षा, अनुसंधान और ज्ञान का केंद्र बनना चाहता है। ऐसे समय में यदि बड़े शैक्षणिक संस्थानों के भविष्य पर बुलडोज़र की बहस हावी हो जाए, तो इससे अच्छा संदेश नहीं जाएगा। हर अवैध निर्माण को वैध घोषित करना समाधान नहीं है। लेकिन हर विवाद का समाधान ध्वस्तीकरण भी नहीं हो सकता।
आख़िर रास्ता क्या है?
अगर विश्वविद्यालय में वास्तव में निर्माण संबंधी अनियमितताएँ हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच हो। अगर नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो। लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि छात्रों की पढ़ाई, कर्मचारियों का रोजगार और समाज की शैक्षणिक संपत्ति सुरक्षित रहे। क्योंकि विश्वविद्यालय किसी एक नेता, किसी एक पार्टी या किसी एक समुदाय का नहीं होता। जब उसमें देश के बच्चे पढ़ते हैं, तब वह पूरे समाज की साझा धरोहर बन जाता है।
अंतिम सवाल
आज सवाल सिर्फ जौहर यूनिवर्सिटी का नहीं है। सवाल यह है कि जब किसी शैक्षणिक संस्थान पर विवाद खड़ा हो, तो क्या हमारा पहला जवाब बुलडोज़र होना चाहिए? योगीजी आप एक संवैधानिक पद पे बैठे हो, इसे ध्यान में रखते हुए फैसले करो, और सत्ता संविधान से चलाओ अपनी हटधर्मी से नहीं। या फिर ऐसा समाधान खोजा जाए जिसमें कानून भी जीते, न्याय भी मिले और शिक्षा भी बची रहे? क्योंकि इमारतें दोबारा बनाई जा सकती हैं। लेकिन अगर हजारों छात्रों का भविष्य बिखर गया, तो उसकी भरपाई करना कहीं अधिक कठिन होगा।
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