भारतीय हॉकी की पहचान दशकों से नीली जर्सी से जुड़ी रही है। यही नीला रंग मैदान पर भारतीय खिलाड़ियों की पहचान बना, इसी रंग में भारत ने दुनिया के बड़े टूर्नामेंट खेले, ओलंपिक में पदक जीते और विश्व हॉकी में अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन अब 15 अगस्त के मौके पर भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों के लिए भगवा रंग की जर्सी सामने आने के बाद सवाल सिर्फ जर्सी के रंग का नहीं रह गया है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सवाल यह है कि भारतीय खेलों की पहचान तय करने का अधिकार किसका है? और उससे भी बड़ा सवाल-क्या भारत के खेलों को धीरे-धीरे एक खास राजनीतिक-सांस्कृतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है? यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि खुद हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप तिर्की ने जर्सी बदलने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं और यह स्पष्ट किया है कि मामला सिर्फ रंग या डिजाइन का नहीं बल्कि निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया और संस्थागत अधिकार का है।
जर्सी का रंग बदलना समस्या नहीं, सवाल प्रक्रिया का है
यह बात साफ होनी चाहिए कि भगवा रंग अपने आप में कोई अपराध नहीं है। भगवा भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में मौजूद रंग है। देश के झंडे में भी केसरिया रंग है। इसलिए किसी जर्सी में केसरिया रंग का इस्तेमाल अपने आप में गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि, अगर दशकों पुरानी राष्ट्रीय खेल पहचान को अचानक बदला जा रहा है, तो निर्णय कैसे लिया गया? किसने लिया? किससे सलाह ली गई? खिलाड़ियों से पूछा गया या नहीं? हॉकी इंडिया के निर्वाचित बोर्ड को भरोसे में लिया गया या नहीं? क्या इसका कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड है?
और सबसे महत्वपूर्ण-अगर बदलाव इतना सामान्य था तो हॉकी इंडिया के अध्यक्ष को इसके फैसले की प्रक्रिया पर सवाल क्यों उठाने पड़े? यहीं से विवाद गंभीर हो जाता है।
खेल किसी पार्टी, सरकार या विचारधारा की जागीर नहीं
भारतीय टीम जब मैदान में उतरती है तो वह किसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व नहीं करती। उसकी जर्सी पर किसी पार्टी का चुनाव चिन्ह नहीं होता। खिलाड़ी किसी धर्म, जाति या राजनीतिक संगठन के लिए नहीं खेलता। वह भारत के लिए खेलता है। उस टीम में अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, क्षेत्रों और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाले खिलाड़ी होते हैं। इसलिए राष्ट्रीय खेल की पहचान ऐसी होनी चाहिए जिसमें हर भारतीय अपने आपको बराबर का हिस्सा महसूस करे। यही कारण है कि खेल को राजनीतिक रंग देने की किसी भी कोशिश पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आज हॉकी, कल क्रिकेट और फिर पूरा खेल जगत?
सबसे बड़ा डर किसी एक जर्सी के रंग को लेकर नहीं है। डर उस प्रवृत्ति को लेकर है जिसमें खेलों की पहचान धीरे-धीरे राजनीतिक प्रतीकों और विचारधारात्मक रंगों से जोड़ दी जाए। आज हॉकी की जर्सी का रंग बदला। कल अगर क्रिकेट की पहचान बदली जाए तो? फिर फुटबॉल? फिर एथलेटिक्स? फिर ओलंपिक दल? क्या हर राष्ट्रीय टीम को किसी खास सांस्कृतिक या राजनीतिक रंग में ढालने की कोशिश होगी? क्या खेल की पहचान अब प्रदर्शन से तय होगी या रंग से?खिलाड़ी की मानसिक तैयारी का क्या? दिलीप तिर्की का यह सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है कि जर्सी बदलने के संभावित प्रभाव का खिलाड़ियों पर कोई आकलन किया गया या नहीं।
यह सुनने में मामूली बात लग सकती है, लेकिन उच्च स्तरीय खेल में मानसिक तैयारी बेहद महत्वपूर्ण होती है। खिलाड़ी जिस जर्सी में वर्षों से खेलता आया हो, जिसकी एक पहचान बन चुकी हो, उसके अचानक बदलाव को लेकर खिलाड़ियों से सलाह लेना क्या गलत मांग है? विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट से पहले खिलाड़ियों को मैदान पर अपने खेल पर ध्यान देना चाहिए या जर्सी के रंग पर उठे विवादों का जवाब देना चाहिए? क्या खिलाड़ियों की मानसिक एकाग्रता और टूर्नामेंट की तैयारी से ज्यादा महत्वपूर्ण जर्सी का नया रंग हो गया? यह सवाल हॉकी प्रशासन को गंभीरता से लेना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल-फैसला किसने किया? यहां असली मुद्दा सामने आता है। अगर जर्सी बदलने का फैसला पूरी तरह प्रशासनिक और सामान्य ‘ऑपरेशनल’ फैसला था तो उसकी प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। कौन जिम्मेदार था? किस तारीख को प्रस्ताव बना? किसने डिजाइन मंजूर किया? किसने उत्पादन का आदेश दिया? किससे सलाह ली गई? कितने डिजाइन सामने आए? खिलाड़ियों से क्या राय ली गई? क्या कार्यकारी बोर्ड को इसकी जानकारी दी गई? अगर नहीं दी गई तो क्यों? और अगर अध्यक्ष को भी बाद में जानकारी मिली, तो फिर हॉकी इंडिया की निर्वाचित संस्था की भूमिका आखिर क्या रह जाती है?
इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी है। ‘हॉकी इंडिया भारतीय हॉकी का मालिक नहीं’-यह वाक्य क्यों महत्वपूर्ण है? दिलीप तिर्की का यह कहना कि हॉकी इंडिया भारतीय हॉकी का मालिक नहीं बल्कि उसकी विरासत का संरक्षक और न्यासी है, पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक है। क्योंकि राष्ट्रीय खेल किसी संस्था की निजी संपत्ति नहीं होते।
हॉकी सिर्फ हॉकी इंडिया की नहीं है। यह उन खिलाड़ियों की विरासत है जिन्होंने मैदान पर देश के लिए पसीना बहाया। यह उन परिवारों की विरासत है जिन्होंने अपने बच्चों को खेल के लिए तैयार किया। यह उन करोड़ों भारतीयों की विरासत है जो टीम को तिरंगे के साथ मैदान पर देखते हैं। इसलिए सवाल उठना चाहिए-क्या किसी निर्वाचित या प्रशासनिक संस्था को यह अधिकार होना चाहिए कि वह बिना पर्याप्त संस्थागत विमर्श के राष्ट्रीय टीम की दशकों पुरानी पहचान बदल दे?
क्या भगवा सिर्फ रंग है या राजनीतिक संदेश भी?
यही वह सवाल है जिससे बचा नहीं जा सकता। केसरिया रंग भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय ध्वज दोनों में मौजूद है। इसलिए हर केसरिया रंग को राजनीतिक कहना भी उचित नहीं होगा। लेकिन वर्तमान राजनीतिक वातावरण को देखते हुए सवाल यह जरूर पूछा जा सकता है कि- अगर यह सिर्फ डिजाइन का फैसला है तो ठीक यही रंग क्यों? क्या दूसरे रंगों पर भी विचार किया गया था? क्या खिलाड़ियों, पूर्व कप्तानों और खेल विशेषज्ञों की राय ली गई?
क्या इस रंग के चयन के पीछे कोई खेल संबंधी कारण था? क्या जर्सी बदलने का फैसला किसी विशेष राष्ट्रीय अवसर के कारण था या लंबे समय की रणनीति का हिस्सा? और सबसे महत्वपूर्ण ये कि क्या इस निर्णय का कोई लिखित औचित्य मौजूद है? यदि है तो उसे सार्वजनिक करने में परेशानी क्या है?
राष्ट्रीयता का रंग एक ही नहीं होता
यह बात समझनी होगी कि राष्ट्रभक्ति किसी एक रंग की मोहताज नहीं है। तिरंगे में केसरिया है तो सफेद भी है और हरा भी। भारत की राष्ट्रीय पहचान किसी एक धर्म, भाषा, जाति या रंग से नहीं बनती। भारत की पहचान उसकी विविधता से बनती है। इसलिए अगर खेल की जर्सी बदली जाती है तो उसमें किसी एक राजनीतिक-सांस्कृतिक पहचान को उभारने के बजाय पूरे भारत की साझी पहचान दिखाई देनी चाहिए। खिलाड़ी जब मैदान में उतरता है तो उसकी सबसे बड़ी पहचान होती है-वह भारतीय है। न कि वह किस धर्म का है। न वह किस राज्य का है। न वह किस राजनीतिक विचारधारा से सहमत है।
पूर्व कप्तानों और खिलाड़ियों के सवालों को नजरअंदाज क्यों?
अगर कई पूर्व भारतीय कप्तान, ओलंपिक पदक विजेता और विश्व कप विजेता खिलाड़ी भी इस बदलाव के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं, तो इसे केवल सोशल मीडिया की बहस कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। इन खिलाड़ियों ने वह जर्सी पहनी है। उन्होंने उस जर्सी में देश का प्रतिनिधित्व किया है। उन्होंने जीत और हार दोनों देखी हैं। इसलिए उनकी राय का सम्मान होना चाहिए। अगर बदलाव सही है तो तर्क के साथ समझाइए। अगर प्रक्रिया सही है तो दस्तावेज सामने रखिए। अगर खिलाड़ियों से सलाह ली गई है तो उसकी जानकारी दीजिए। और अगर बोर्ड की अनुमति आवश्यक नहीं थी तो संबंधित नियम सार्वजनिक कीजिए।
खेल को राजनीति से बचाना क्यों जरूरी है?
खेल की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह लोगों को जोड़ता है। स्टेडियम में बैठा हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई-सब एक ही टीम के लिए तालियां बजाते हैं। किसी खिलाड़ी की जीत पर पूरा देश खुश होता है। यही खेल की ताकत है। लेकिन अगर खेलों की पहचान को राजनीतिक प्रतीकों के साथ जोड़ने की कोशिश बढ़ती गई तो वह एकता कमजोर हो सकती है। खेल को राष्ट्रवाद चाहिए, लेकिन राजनीतिक रंग नहीं। खिलाड़ियों को देशभक्ति चाहिए, लेकिन विचारधारा का बोझ नहीं। राष्ट्रीय टीम को तिरंगा चाहिए, लेकिन किसी राजनीतिक दल की छाया नहीं।
अब कुछ सवालों से भागना नहीं चाहिए
हॉकी इंडिया और संबंधित अधिकारियों को देश के सामने स्पष्ट जवाब देना चाहिए—
1. जर्सी बदलने का फैसला किसने लिया?
2. इस फैसले की आधिकारिक तारीख क्या है?
3. क्या हॉकी इंडिया के निर्वाचित कार्यकारी बोर्ड को इसकी जानकारी दी गई?
4. क्या खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ से सलाह ली गई?
5. क्या पूर्व खिलाड़ियों या कप्तानों की राय ली गई?
6. नीली जर्सी को हटाने का खेल संबंधी कारण क्या है?
7. भगवा रंग चुनने के पीछे आधिकारिक तर्क क्या है?
8. क्या दूसरे रंगों और डिजाइनों पर भी विचार किया गया था?
9. जर्सी डिजाइन, निर्माण और आपूर्ति का ठेका किस प्रक्रिया से दिया गया?
10. क्या पूरी निर्णय प्रक्रिया का दस्तावेजी रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाएगा?
और सबसे महत्वपूर्ण-क्या भारत की राष्ट्रीय हॉकी टीम की पहचान बदलने के फैसले में किसी राजनीतिक या वैचारिक विचार का कोई प्रभाव था? अगर नहीं था तो इसे साफ-साफ बताइए। अगर था तो देश को यह जानने का अधिकार है कि राष्ट्रीय खेलों के फैसलों में राजनीति की भूमिका आखिर कहां तक पहुंच गई है।
अंतिम सवाल: जर्सी बदलिए, लेकिन खेल को मत बदलिए
जर्सी बदलना कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं है। समय के साथ डिजाइन बदलते हैं। रंगों में बदलाव होते हैं। नई पीढ़ी के लिए नई पहचान बनाई जाती है। लेकिन राष्ट्रीय खेल की पहचान बदलने का फैसला पारदर्शी, संस्थागत और खिलाड़ियों की राय के साथ होना चाहिए। क्योंकि यह किसी कंपनी की टी-शर्ट नहीं है। यह उस टीम की जर्सी है जिस पर ‘INDIA’ लिखा होता है।
इसलिए सवाल भगवा रंग से नफरत का नहीं है। सवाल यह है कि क्या खेल को किसी राजनीतिक पहचान का माध्यम बनाया जा रहा है? अगर जवाब ‘नहीं’ है तो पारदर्शिता से साबित कीजिए। और अगर जवाब ‘हां’ है, तो देश को यह सवाल पूछने का पूरा अधिकार है—जिस खेल ने भारत को दुनिया के सामने गौरवान्वित किया, उसे राजनीति का रंग देने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? हॉकी का रंग कोई भी हो सकता है, लेकिन भारतीय खेलों की आत्मा सिर्फ एक होनी चाहिए- तिरंगा।
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