नई दिल्ली: लोकतंत्र केवल चुनावों और सरकारों के बनने-बदलने का नाम नहीं है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार के साथ-साथ स्वतंत्र मीडिया, सामाजिक संगठन, मानवाधिकार संस्थाएं, धार्मिक एवं शैक्षणिक संस्थान और गैर-सरकारी संगठन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही संस्थाएं समाज के उन हिस्सों तक पहुंचती हैं, जहां अक्सर सरकारी व्यवस्था की पहुंच कमजोर पड़ जाती है। ऐसे में ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ को लेकर उठ रहा विवाद केवल विदेशी चंदे का मामला नहीं, बल्कि नागरिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और सरकार की बढ़ती नियंत्रण शक्ति से जुड़ा बड़ा सवाल है।
12 अगस्त को विपक्ष के तीखे विरोध के बावजूद इस विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेज दिया गया। सरकार का कहना है कि यह कानून किसी समुदाय या अल्पसंख्यक संस्था को निशाना नहीं बनाता और इसका उद्देश्य विदेशी अंशदान के उपयोग को अधिक जवाबदेह और नियंत्रित बनाना है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि प्रस्तावित संशोधन के जरिए उन एनजीओ और संस्थाओं पर शिकंजा कसने की व्यवस्था की जा रही है, जो पहले से ही सरकारी नीतियों के प्रति आलोचनात्मक रुख रखती हैं या सामाजिक और मानवाधिकार के क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
सबसे बड़ा सवाल: संपत्तियों पर नियंत्रण किस हद तक?
इस विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद पहलू वह प्रस्ताव है, जिसमें ऐसे संगठनों की संपत्तियों पर अस्थायी या स्थायी नियंत्रण के लिए एक ‘नामित प्राधिकरण’ बनाने की बात कही गई है, जिनका एफसीआरए लाइसेंस रद्द हो चुका है, वापस किया जा चुका है या उसकी अवधि समाप्त हो गई है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
यहीं से गंभीर सवाल पैदा होता है। किसी संस्था का एफसीआरए लाइसेंस रद्द होने का अर्थ यह है कि वह विदेशी अंशदान प्राप्त करने की पात्रता खो सकती है। लेकिन क्या इसका मतलब यह भी होना चाहिए कि उसकी संपत्तियों के प्रबंधन और निपटारे पर सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकरण का नियंत्रण स्थापित हो जाए?
यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। विदेशी चंदे के दुरुपयोग की जांच करना एक बात है, लेकिन किसी संस्था की पूरी संपत्ति और उसके भविष्य पर नियंत्रण की व्यवस्था दूसरी बात है। यदि इस शक्ति के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट सीमाएं, न्यायिक निगरानी और निष्पक्ष अपील की मजबूत व्यवस्था नहीं होगी, तो इसका दुरुपयोग होने की आशंका स्वाभाविक है।
अल्पसंख्यक संस्थाओं की चिंता क्यों?
सरकार लगातार कह रही है कि विधेयक में किसी भी समुदाय को निशाना बनाने वाला कोई प्रावधान नहीं है। कानून की भाषा में संभव है कि कहीं भी ‘मुस्लिम’, ‘ईसाई’ या किसी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय का नाम न हो। लेकिन विपक्ष और सामाजिक संगठनों की चिंता कानून के शब्दों से अधिक उसके संभावित प्रभाव और लागू किए जाने के तरीके को लेकर है।
भारत में बड़ी संख्या में धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, राहत कार्य, अनाथालय, छात्रवृत्ति और गरीबों की सहायता जैसे क्षेत्रों में काम करती हैं। इनमें ईसाई, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों से जुड़े संगठन भी शामिल हैं। यदि एफसीआरए संबंधी नियम इतने कठोर बना दिए जाएं कि छोटी या मध्यम संस्थाओं के लिए उनका पालन करना कठिन हो जाए, तो इसका असर सबसे पहले इन्हीं सामाजिक संस्थाओं पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि विपक्ष इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं, बल्कि नागरिक समाज और विशेष रूप से अल्पसंख्यक संस्थाओं के अस्तित्व से जुड़े सवाल के रूप में देख रहा है।
आरएसएस और विदेशी चंदे का राजनीतिक सवाल
संसद में कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का मुद्दा उठाते हुए सरकार पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। विपक्ष का तर्क है कि यदि सरकार विदेशी फंडिंग और विदेशी प्रभाव को लेकर इतनी गंभीर है, तो जांच और नियम सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होने चाहिए। यहीं सरकार के सामने समानता और पारदर्शिता की कसौटी खड़ी होती है। कानून का सम्मान तभी बढ़ता है जब जनता को यह विश्वास हो कि उसका इस्तेमाल चुनिंदा संस्थाओं को दबाने और पसंदीदा संगठनों को बचाने के लिए नहीं किया जा रहा।
सवाल किसी एक संगठन के पक्ष या विरोध का नहीं है। सिद्धांत यह होना चाहिए कि जिस नियम के तहत एक संस्था की जांच हो सकती है, उसी नियम और उसी पारदर्शिता के साथ दूसरी संस्था की भी जांच होनी चाहिए। कानून की ताकत उसकी निष्पक्षता से आती है, न कि उसके डर से।
जांच शुरू करने के लिए सरकार की अनुमति: क्या जांच भी राजनीतिक होगी?
विधेयक में जांच शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव भी गंभीर बहस की मांग करता है। यदि किसी संस्था के खिलाफ जांच शुरू करने या न करने का अधिकार पूरी तरह कार्यपालिका के नियंत्रण में होगा, तो यह सवाल उठेगा कि क्या जांच का निर्णय केवल तथ्यों और सबूतों के आधार पर होगा या राजनीतिक प्राथमिकताओं का भी उस पर असर पड़ेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जांच एजेंसियों और नियामक संस्थाओं के पास अधिकार होना आवश्यक है, लेकिन उनके अधिकारों के साथ जवाबदेही और स्वतंत्रता भी उतनी ही जरूरी है। वरना कानून धीरे-धीरे प्रशासनिक सुधार के बजाय राजनीतिक नियंत्रण का औजार बन सकता है।
जेपीसी को भेजना अंत नहीं, असली परीक्षा अब शुरू
विधेयक को जेपीसी के पास भेजे जाने को सरकार विपक्ष की मांग पूरी करने के रूप में पेश कर सकती है, लेकिन समिति के सामने असली परीक्षा अब शुरू होगी। क्या जेपीसी केवल सरकार के प्रस्ताव पर औपचारिक मुहर लगाएगी, या वास्तव में एनजीओ, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, कानूनी विशेषज्ञों और प्रभावित पक्षों की राय सुनेगी?
विपक्ष का विरोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस विधेयक को पहले भी टालना पड़ा था। केरल विधानसभा चुनावों से पहले इसे आगे न बढ़ाए जाने और ईसाई संगठनों की चिंताओं के सामने आने से यह साफ हुआ कि सरकार भी इस विषय की राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता से परिचित है। जेपीसी को चाहिए कि वह केवल संसद के भीतर राजनीतिक बहस तक सीमित न रहे, बल्कि उन संस्थाओं की वास्तविक चिंताओं को भी सुने जिनके कामकाज और संपत्तियों पर इस कानून का सीधा असर पड़ सकता है।
सुरक्षा जरूरी है, लेकिन स्वतंत्रता भी
विदेशी फंडिंग का नियमन आवश्यक है। किसी भी देश को यह अधिकार है कि वह यह सुनिश्चित करे कि विदेशी धन का उपयोग अवैध गतिविधियों, हिंसा, राजनीतिक अस्थिरता या व्यक्तिगत लाभ के लिए न हो। पारदर्शिता, हिसाब-किताब और जवाबदेही से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि नियमन और नियंत्रण के बीच की सीमा कहां समाप्त होती है? यदि नियम इतने कठोर हो जाएं कि स्वतंत्र सामाजिक संस्थाएं काम ही न कर सकें, यदि लाइसेंस रद्द होने के बाद संपत्तियों पर नियंत्रण का खतरा मंडराने लगे, यदि जांच की प्रक्रिया सरकार की अनुमति पर निर्भर हो और यदि कानून के इस्तेमाल को लेकर निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठते रहें, तो यह व्यवस्था नागरिक समाज को मजबूत करने के बजाय कमजोर कर सकती है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करने वाला हर संगठन राष्ट्रविरोधी नहीं होता। मानवाधिकार का सवाल उठाने वाला हर एनजीओ देश का दुश्मन नहीं होता। और अल्पसंख्यकों के बीच काम करने वाली हर संस्था संदिग्ध नहीं होती।
एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 की असली परीक्षा इसी बात में है कि क्या यह वास्तव में विदेशी अंशदान में पारदर्शिता लाने का कानून बनेगा, या फिर उसके जरिए उन संस्थाओं पर नियंत्रण बढ़ेगा जो सत्ता से असहमति रखने की हिम्मत करती हैं।जेपीसी के सामने अब जिम्मेदारी है कि वह इस विधेयक के हर प्रावधान की गहराई से समीक्षा करे। क्योंकि कानून केवल सरकार की सुविधा के लिए नहीं बनते—वे नागरिकों और संस्थाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए भी बनाए जाते हैं। विदेशी चंदे पर निगरानी जरूरी है, लेकिन निगरानी के नाम पर नागरिक समाज की आवाज़ को खामोश कर देना लोकतंत्र के हित में नहीं हो सकता।
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