देश के करोड़ों विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तक केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं होती। किताबों के जरिए ही एक नई पीढ़ी लोकतंत्र, संविधान, नागरिक अधिकारों, चुनाव, सरकार, विपक्ष, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को समझती है। इसलिए जब कक्षा 11 और 12 की राजनीति विज्ञान की किताबें लिखने के लिए बनाई गई नई एनसीईआरटी समिति में भाजपा, आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों से संबंध रखने वाले कई लोगों की मौजूदगी सामने आती है, एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या पाठ्यपुस्तकों का पुनर्लेखन केवल शैक्षिक प्रक्रिया है, या इसके माध्यम से देश की नई पीढ़ी की राजनीतिक सोच को एक विशेष वैचारिक दिशा देने की कोशिश भी हो रही है? एनसीईआरटी ने नई टीम को कक्षा 11 और 12 की राजनीति विज्ञान की पुस्तकों को तैयार करने की जिम्मेदारी दी है।
अधिसूचना में ‘सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव’, ‘भारतीय ज्ञान प्रणालियों’, समावेशन और नई शिक्षण पद्धतियों जैसे विषयों को शामिल करने की बात कही गई है। सिद्धांत रूप में भारतीय ज्ञान, संस्कृति और परंपराओं को शिक्षा का हिस्सा बनाना कोई गलत बात नहीं है। भारत की अपनी बौद्धिक, दार्शनिक और राजनीतिक परंपराओं का अध्ययन होना ही चाहिए। लेकिन असली प्रश्न यह है कि भारतीय ज्ञान और संस्कृति की व्याख्या कौन करेगा और किस दृष्टिकोण से करेगा?
राजनीति विज्ञान कोई निष्पक्ष गणित नहीं
गणित की किताब में दो और दो चार होते हैं, चाहे किताब लिखने वाला किसी भी विचारधारा का हो। लेकिन राजनीति विज्ञान अलग विषय है। यहां लोकतंत्र की परिभाषा, राष्ट्रवाद की अवधारणा, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, नागरिक अधिकार, विरोध प्रदर्शन, अल्पसंख्यकों के अधिकार और राज्य की शक्तियों की व्याख्या महत्वपूर्ण होती है। यही कारण है कि राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक तैयार करने वाले लोगों की वैचारिक पृष्ठभूमि पर सवाल उठते हैं।
यदि समिति में किसी एक राजनीतिक या वैचारिक धारा से जुड़े लोगों की संख्या अधिक हो, तो स्वाभाविक रूप से यह आशंका पैदा होती है कि कहीं पाठ्यपुस्तकें बहुलतावादी और आलोचनात्मक शिक्षा के बजाय एक विशेष राजनीतिक दृष्टिकोण को स्थापित करने का माध्यम तो नहीं बन जाएंगी। समस्या किसी व्यक्ति के आरएसएस, एबीवीपी, भाजपा या किसी अन्य संगठन से जुड़े होने मात्र से नहीं है।
किसी भी नागरिक को अपनी राजनीतिक और वैचारिक पहचान रखने का अधिकार है। असली सवाल यह है कि क्या समिति में पर्याप्त वैचारिक विविधता मौजूद है? यदि अलग-अलग राजनीतिक विचारों, सामाजिक पृष्ठभूमियों और अकादमिक दृष्टिकोणों के विशेषज्ञ शामिल होंगे, तो पाठ्यपुस्तक अधिक संतुलित बनने की संभावना होगी। लेकिन यदि एक विचारधारा का प्रभाव अधिक दिखाई देता है, तो निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे।
‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ या वैचारिक चयन?
पिछले कुछ वर्षों में ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ को शिक्षा में शामिल करने पर जोर बढ़ा है। इसमें प्राचीन भारतीय दर्शन, विज्ञान, साहित्य, गणित, राजनीति और सामाजिक विचारों को स्थान देने की बात कही जाती है। यह पहल उपयोगी हो सकती है। आखिर भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय तक औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रभावित रही है और भारतीय बौद्धिक परंपराओं को उचित स्थान मिलना चाहिए। लेकिन यहां एक बड़ा खतरा भी है। भारतीय ज्ञान प्रणाली का अर्थ केवल एक धर्म, एक संस्कृति या एक राजनीतिक विचारधारा की परंपरा नहीं हो सकता।
भारत की बौद्धिक विरासत में बुद्ध, महावीर, कबीर, गुरु नानक, बसवेश्वर, सूफी संत, भक्ति आंदोलन, आदिवासी ज्ञान परंपराएं, दलित चिंतन, डॉ. भीमराव आंबेडकर, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद और असंख्य सामाजिक-राजनीतिक धाराएं शामिल हैं। यदि ‘भारतीय ज्ञान’ के नाम पर केवल एक विशेष सांस्कृतिक या धार्मिक दृष्टिकोण को प्रमुखता दी जाती है और बाकी परंपराओं को हाशिये पर धकेल दिया जाता है, तो यह शिक्षा का भारतीयकरण नहीं बल्कि ज्ञान का वैचारिक चयन होगा।
क्या संविधान की आत्मा कमजोर होगी?
राजनीति विज्ञान की किताबों का सबसे महत्वपूर्ण आधार भारतीय संविधान होना चाहिए। संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के अधिकारों और राज्य की सीमाओं को भी तय करता है। नई पुस्तकों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि— धर्मनिरपेक्षता को किस तरह समझाया जाता है? अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कितना महत्व दिया जाता है?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध के अधिकार को किस दृष्टि से पढ़ाया जाता है?
संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों की चर्चा कितनी ईमानदारी से होती है?
लोकतंत्र में विपक्ष और असहमति की भूमिका को किस रूप में पेश किया जाता है?
जाति व्यवस्था, सामाजिक भेदभाव और आरक्षण जैसे मुद्दों को कितना स्थान मिलता है?
राजनीति विज्ञान का उद्देश्य विद्यार्थियों को सरकार की प्रशंसा करना सिखाना नहीं होना चाहिए। उसका उद्देश्य उन्हें सरकार से सवाल करना, संविधान को समझना और स्वतंत्र रूप से सोचना सिखाना होना चाहिए। यदि किताबें छात्रों को केवल यह बताएं कि राष्ट्र क्या है, लेकिन यह न बताएं कि नागरिक को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार भी है, तो वह लोकतांत्रिक शिक्षा अधूरी होगी।
शिक्षा संस्थानों का रंग बदलने का आरोप
देश में पिछले कुछ वर्षों से पाठ्यक्रमों, विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थाओं में बदलाव को लेकर लगातार विवाद होते रहे हैं। इतिहास के अध्यायों में परिवर्तन, कुछ हिस्सों को हटाना, नामों और घटनाओं की नई व्याख्या तथा प्राचीन भारत और सांस्कृतिक विरासत पर अधिक जोर—इन सभी को लेकर समर्थकों और आलोचकों के बीच तीखी बहस रही है। सरकार और उसके समर्थकों का तर्क है कि लंबे समय से शिक्षा व्यवस्था में एक विशेष औपनिवेशिक और वामपंथी दृष्टिकोण हावी रहा, जिसे अब संतुलित किया जा रहा है।
लेकिन आलोचकों का सवाल है—क्या पुराने पक्षपात को दूर करने के नाम पर नया पक्षपात स्थापित किया जा रहा है? शिक्षा में सुधार का मतलब एक विचारधारा को हटाकर दूसरी विचारधारा को स्थापित करना नहीं होना चाहिए। असली सुधार वह होगा जिसमें विद्यार्थी अलग-अलग विचारों को पढ़े, उनकी तुलना करे और फिर अपना निष्कर्ष स्वयं निकाले।
विद्यार्थियों को नागरिक बनाना है, समर्थक नहीं
किसी भी लोकतंत्र की शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना होना चाहिए जो सत्ता से डरती न हो, बल्कि उसे समझती और जरूरत पड़ने पर उससे सवाल भी करती हो। आज जो छात्र कक्षा 11 और 12 में राजनीति विज्ञान पढ़ रहे हैं, वही कल मतदाता, वकील, पत्रकार, शिक्षक, अधिकारी और राजनीतिक कार्यकर्ता बनेंगे। यदि उन्हें केवल एक विशेष प्रकार का राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और संस्कृति पढ़ाई जाएगी, तो उनकी राजनीतिक समझ भी सीमित हो सकती है।
विद्यालय का काम किसी पार्टी या संगठन के लिए समर्थक तैयार करना नहीं है। विद्यालय का काम जागरूक नागरिक तैयार करना है। इसलिए एनसीईआरटी की नई समिति के सामने बड़ी जिम्मेदारी है। उसे यह साबित करना होगा कि सदस्यों की व्यक्तिगत वैचारिक पृष्ठभूमि का असर पाठ्यपुस्तकों की निष्पक्षता पर नहीं पड़ेगा।
पारदर्शिता ही भरोसे का रास्ता
नई किताबों को लेकर विवाद से बचने का सबसे अच्छा तरीका पारदर्शिता है। एनसीईआरटी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पाठ्यपुस्तकों का मसौदा व्यापक अकादमिक समीक्षा से गुजरे। अलग-अलग विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों, इतिहासकारों, राजनीतिक वैज्ञानिकों, शिक्षकों और सामाजिक समूहों की राय ली जाए।
यह भी जरूरी है कि किसी भी महत्वपूर्ण विषय को केवल राजनीतिक सुविधा के आधार पर हटाया या बदला न जाए। भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में उपलब्धियां भी हैं और असफलताएं भी। संविधान भी है और उसके उल्लंघन के उदाहरण भी। सामाजिक सुधार भी हैं और सामाजिक अन्याय की लंबी परंपरा भी। विद्यार्थियों को पूरा सच जानने का अधिकार है—सिर्फ वह सच नहीं जो किसी सरकार या विचारधारा को सुविधाजनक लगे।
आखिर में सवाल आने वाली पीढ़ी का है
एनसीईआरटी की राजनीति विज्ञान की नई किताबें केवल पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं होंगी। वे आने वाले वर्षों में करोड़ों विद्यार्थियों की लोकतंत्र और संविधान के प्रति समझ को प्रभावित करेंगी। इसलिए सवाल किसी व्यक्ति के एबीवीपी, आरएसएस या भाजपा से संबंध रखने भर का नहीं है। असली सवाल है—क्या समिति भारत की पूरी बौद्धिक और सामाजिक विविधता को प्रतिनिधित्व देती है? क्या किताबों में असहमति के लिए जगह होगी? क्या सरकार की आलोचना को लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा बताया जाएगा? क्या अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और अन्य कमजोर वर्गों की आवाज को बराबरी से स्थान मिलेगा?
यदि नई किताबें छात्रों को ज्यादा जानकारी, ज्यादा दृष्टिकोण और स्वतंत्र सोच की क्षमता देती हैं, तो बदलाव का स्वागत होना चाहिए। लेकिन अगर ‘भारतीयकरण’ और ‘सांस्कृतिक जड़ों’ के नाम पर शिक्षा को एक खास राजनीतिक विचारधारा का माध्यम बनाया जाता है, तो यह केवल पाठ्यपुस्तकों का बदलाव नहीं होगा—यह आने वाली पीढ़ी की राजनीतिक चेतना को बदलने की कोशिश होगी। और लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा वही दिन होता है, जब विद्यार्थियों को सवाल पूछना नहीं, बल्कि पहले से तय जवाब मानना सिखाया जाने लगे।
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